श्रीनगर: हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय, चौरास परिसर स्थित एकेडमिक एक्टिविटी सेंटर में हिंदी विभाग की ओर से “हिमवंत कवि चन्द्रकुँवर बर्त्वाल की साहित्यिक विरासत” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन कवि चन्द्रकुँवर बर्त्वाल की जयंती के उपलक्ष्य में किया गया।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो. मोहन पंवार (विभागाध्यक्ष भूगोल एवं संकायाध्यक्ष-भर्ती एवं प्रोन्नति, गढ़वाल विश्वविद्यालय) ने कहा कि विश्वविद्यालय में शीघ्र ही चन्द्रकुँवर बर्त्वाल शोध पीठ की स्थापना की जाएगी।
मुख्य वक्ता प्रो. नवीन चंद्र लोहानी, कुलपति (उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी) ने चन्द्रकुँवर बर्त्वाल को राष्ट्रीय चेतना और प्रकृति का सशक्त कवि बताते हुए कहा कि उनकी कविताओं को पाठ्यक्रमों में बड़े स्तर पर शामिल किया जाना चाहिए।
विशिष्ट वक्ता प्रो. मृदुला जुगरान, पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग ने चन्द्रकुँवर को प्रेम-पीड़ा और मृत्यु-बोध का कवि बताया।
गौरव सिंह बर्त्वाल, सचिव (चन्द्रकुँवर बर्त्वाल शोध संस्थान, देहरादून) ने कहा कि कवि की अप्रकाशित रचनाओं को प्रकाशन की दिशा में लाया जा रहा है। वहीं हरीश गुसांई, अध्यक्ष (चन्द्रकुँवर स्मृति शोध संस्थान, अगस्त्यमुनि) ने उनकी कविताओं को विद्यालयों के पाठ्यक्रम में व्यापक स्तर पर शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम का संयोजन प्रो. गुड्डी बिष्ट पंवार (विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग) ने किया। संगोष्ठी में मनु पंवार, अनुसूया प्रसाद मलासी, दीपक बेंजवाल, डॉ. मानवेन्द्र बर्त्वाल, डॉ. सृजना राणा, डॉ. शशिबाला, डॉ. सविता मैठाणी, डॉ. गौरीश नंदिनी काला, डॉ. आकाशदीप, रेशमा पंवार, शुभम थपलियाल सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे।
संगोष्ठी में वक्ताओं ने एकमत होकर कहा कि चन्द्रकुँवर बर्त्वाल की काव्य-संपदा साहित्य की धरोहर है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना अत्यंत आवश्यक है।



