UGC ACT 2026: पिछले कुछ दिनों से देशभर में उच्च शिक्षा से जुड़े यूजीसी के नए नियमों (UGC Act 2026) का मुद्दा गरमाया हुआ है। यूजीसी के इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई। बुद्धवार को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है और कहा है तब तक 2012 वाले नियम ही लागू रहेंगे। कोर्ट ने कहा कि इसमें जाति संबंधी नियम स्पष्ट नहीं है। विशेषज्ञ को भाषा और स्पष्ट करने को कहा गया है। फिलहाल यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों में 2012 के पुराने रेगुलेशंस ही लागू रहेंगे। अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
आईये सबसे पहले जानते हैं कि UGC क्या है? इसका गठन कब और क्यों हुआ? इसकी भूमिका क्या है? और नया नियम क्यों विवाद की वजह बना हुआ है? क्योंकि देश के करोड़ों छात्रों का भविष्य सीधे तौर पर यूजीसी के फैसलों से जुड़ा होता है।
यूजीसी क्या है ?
दरअसल UGC यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिशन (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के तहत एक वैधानिक संगठन है। यूजीसी का मुख्य काम देश में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा को व्यवस्थित करना, उसका समन्वय करना और गुणवत्ता बनाए रखना है। यह आयोग विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ाई, परीक्षा और रिसर्च के मानक तय करता है। साथ ही योग्य उच्च शिक्षण संस्थानों को अनुदान (ग्रांट) देने की जिम्मेदारी भी इसी के पास होती है। इसके अलावा यूजीसी, केंद्र और राज्य सरकारों को उच्च शिक्षा के विकास से जुड़े मुद्दों पर सलाह भी देता है।
यूजीसी केवल संस्थानों को नियंत्रित नहीं करता, बल्कि छात्रों के हितों की सुरक्षा भी इसकी अहम जिम्मेदारी है। यह सुनिश्चित करता है कि छात्र जिस संस्थान से पढ़ाई कर रहे हैं, उसकी डिग्री भविष्य में मान्य रहे। इसके अलावा, यूजीसी की ये भी जिम्मेदारियां होती हैं:
- एंटी-रैगिंग नियम लागू करता है।
- समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए नीतियां बनाता है।
- स्टूडेंट इंडक्शन प्रोग्राम और करियर गाइडेंस को बढ़ावा देता है।
- प्लेसमेंट, एलुमनी नेटवर्क और रोजगार से जुड़ी नीतियां तय करता है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत मल्टीडिसिप्लिनरी एजुकेशन और इंटर्नशिप फ्रेमवर्क लागू
यूजीसी का गठन कब हुआ था?
भारत में उच्च शिक्षा की परंपरा बहुत पुरानी है। नालंदा, तक्षिला और विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों में एशिया के कई देशों से छात्र पढ़ने आते थे। ब्रिटिश काल में भी शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव हुए। एल्फिंस्टन, मैकाले और वुड जैसे अधिकारियों ने आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नींव रखी। आजादी से पहले ही भारत में एक केंद्रीय उच्च शिक्षा नियामक संस्था की जरूरत महसूस की जाने लगी थी।
- 1944 में तैयार की गई सार्जेंट रिपोर्ट में पहली बार विश्वविद्यालय अनुदान समिति बनाने की सिफारिश की गई।
- 1945 में यूजीसी का प्रारंभिक गठन अलीगढ़, बनारस और दिल्ली विश्वविद्यालयों के लिए किया गया।
- 1947 में इसे सभी विश्वविद्यालयों से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी मिली।
- 1948 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग बना।
- 28 दिसंबर 1953 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने यूजीसी का औपचारिक उद्घाटन किया।
- बाद में नवंबर, 1956 में यूजीसी अधिनियम, 1956 के तहत इसे कानूनी दर्जा मिला और यह एक स्थायी वैधानिक संस्था बन गई।
- यूजीसी के कार्यालय दिल्ली में तीन स्थानों पर स्थित हैं।
यूजीसी के पुराने 2012 के नियम में क्या है?
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने 17 सितंबर 2012 को भारत के सभी हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स में समानता को बढ़ावा देने और भेदभाव को रोकने के लिए नियम बनाए थे। 2012 के नियम खासतौर पर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) स्टूडेंट्स के लिए बनाए गए थे, इसमें ओबीसी को नहीं जोड़ा गया था। यूजीसी एक्ट 2026 में ओबीसी को भी जोड़ा गया है। एससी-एसटी छात्रों के खिलाफ जाति-भेदभाव के अलावा ये नियम अन्य आधारों जैसे धर्म, भाषा, जातीय, लिंग और दिव्यांगता पर भी लागू होते हैं, लेकिन सिर्फ सलाह के तौर पर-अनिवार्य नहीं।
UGC Act 2026: यूजीसी का नया ‘कानून’ क्या है?
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026 लागू किया। इसे ‘इक्विटी एक्ट 2026’ भी कहा जा रहा है। यह साल 2012 से चले आ रहे पुराने रेगुलेशंस को रिप्लेस करेगा। नए ‘कानून’ में दावा किया गया है कि यह उच्च शिक्षा में समानता लाएगा और धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान, दिव्यांगता आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकेगा। इसमें कहा गया है कि हर संस्थान में एक इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (EOC) बनाया जाएगा, जो भेदभाव की शिकायतों को संभालेगा और कमजोर वर्ग का सपोर्ट करेगा। ये नियम यूनिवर्सिटी और कॉलेजों को इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर, इक्विटी कमेटी, शिकायत निवारण सिस्टम और 24-7 हेल्पलाइन बनाने के लिए कहते हैं, ताकि शेड्यूल कास्ट (SC), शेड्यूल ट्राइब (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों की शिकायतों का समाधान किया जा सके।
UGC नए नियमों का विरोध क्यों किया जा रहा?
यूजीसी रेगुलेशन, 2026 को लेकर पूरे देश में आक्रोश फैल गया। UGC के इन नए नियमों के खिलाफ सोशल मीडिया पर #UGCRollback और #ShameOnUGC जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। नए नियम को लेकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान समेत देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं। बरेली के ADM अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने इस मुद्दे को और सुर्खियों में ला दिया। जातिगत-भेदभाव को रोकने के लिए लाए गए यूजीसी के नए ‘कानून’ को एकतरफा बताया जा रहा है। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अंलकार अग्निहोत्री ने इसे ‘काला कानून’ बताते हुए अपने पद से इस्तीफा तक दे दिया है। वहीं सवर्ण जाति संगठनों ने आंदोलन तेज करने की धमकी दी है।
यूजीसी के नए कानून के विरोध कई वजहों से किया जा रहा है। कुछ लोगों को मानना है कि इस कानून का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है, क्योंकि शिकायत करने वाले को कोई सबूत नहीं देना। जिसे एक बाद दोषी मान लिया जाएगा, उसे खुद को निर्दोष साबित करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। कुछ लोगों का कहना है कि यह सिर्फ छात्रों तक सिमित नहीं है, टीचर और स्टाफ भी इसके दायर में आते हैं, जिसका गलत फायदा उठाया जा सकता है। जनरल कैटेगरी के लोगों का मानना है कि यह जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट्स के खिलाफ है और उनके साथ होने वाले भेदभाव को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। विरोध करने वाले लोग नियमों में इस तरह की खामियां बता रहे हैं.
- भेदभाव की परिभाषा एकतरफा बताई जा रही है, नियमों में SC/ST/OBC, महिलाएं और दिव्यांग को भेदभाव से पीड़ित लोगों के दायरे में रखा गया है। जबकि जनरल कैटेगरी को पीड़ित नहीं माना गया, सिर्फ आरोपी माना जा सकता है।
- झूठी शिकायत पर सजा का प्रावधान नहीं, फर्जी या गलत शिकायत करने वालों पर कोई जुर्माना या कार्रवाई तय नहीं है। 24 घंटे में कार्रवाई का नियम गलत इस्तेमाल की आशंका बढ़ाता है।
- इक्विटी कमेटी में जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व नहीं, EOC और इक्विटी कमेटी में जनरल कैटेगरी का कोई सदस्य जरूरी नहीं। इससे कमेटी के फैसले एकतरफा होने का डर है।
- कॉलेज सजा के डर से सही फैसला नहीं ले पाएंगे, नियम तोड़ने पर ग्रांट रोकने और मान्यता रद्द करने का प्रावधान है। डर के कारण कॉलेज मेरिट के आधार पर निर्णय नहीं ले पाएंगे।
- UGC एक्ट 1956 के दायरे से बाहर होने का आरोप, विरोध करने वालों का कहना है कि UGC एक्ट अकादमिक मानकों तक सीमित है। एक्ट में जातीय भेदभाव या उत्पीड़न पर सीधे नियम बनाने की बात नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, कोर्ट ने लगाई रोक
यूजीसी विनियम से जुड़ा मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिका दायर की गई। बुद्धवार को सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक नए नियमों पर रोक लगा दी और कहा कि तब तक 2012 वाले नियम ही लागू रहेंगे। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि नए नियम अस्पष्ट हैं। कोर्ट के कहा कि नए यूजीसी नियमों का दुरुपयोग हो सकता है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और यूजीसी के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। अब इस मामले पर अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
केंद्र को नोटिस जारी, 19 मार्च को अगली सुनवाई
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि नए नियम अस्पष्ट हैं। कोर्ट के कहा कि नए यूजीसी नियमों का दुरुपयोग हो सकता है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और यूजीसी के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। अब इस मामले पर अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
केंद्र और यूजीसी से जवाब मांगा
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इन रिट याचिकाओं की सुनवाई की। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि हमें जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए या हम पीछे जा रह हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे। जिन्हें सुरक्षा चाहिए, उनके लिए व्यवस्था होनी चाहिए। इसी के साथ उन्होंने केंद्र और यूजीसी से जवाब मांगा है। साथ ही कहा है कि एक विशेष कमेटी भी बनाई जा सकती है। इसी के साथ नए नियमों की भाषा को स्पष्ट करने के लिए विशेषज्ञों की जरूरत पर भी जोर दिया।
याचिकाकर्ता विनीत जिंदल ने बताई अपनी दलीलें
वहीं याचिकाकर्ता विनीत जिंदल ने कहा, ‘आज, सीजेआई ने हमारी दलीलों की सराहना की। हमें कहना होगा कि यह हमारे लिए बहुत बड़ी जीत है। जैसा कि हम खास तौर पर तीन मुद्दों के बारे में बात कर रहे थे, एक है सेक्शन 3C जो जातिगत भेदभाव के बारे में बात करता है और उस खास सेक्शन में, सामान्य जाति को बाहर रखा गया है और बाकी सभी जातियों को शामिल किया गया है। तो, यह खास सेक्शन यह संदेश दे रहा है कि SC, ST और OBC के साथ सामान्य जाति द्वारा भेदभाव किया जा रहा है।’
उन्होंने आगे कहा कि यह सीजेआई के सामने हमारी दलील थी और उन्होंने हमारी दलील की सराहना की और खास तौर पर कहा कि हम जो कह रहे हैं वह सही है और अगर ऐसे सेक्शन हैं, तो यह निश्चित रूप से सामान्य जाति के लिए बहुत कठोर और भेदभावपूर्ण होगा और इसमें संशोधन किया जाना चाहिए। दूसरा हिस्सा इक्विटी कमेटी के संबंध में है जो इन नए UGC सेक्शन के सेक्शन 18 के तहत बनाई गई है। इन खास नियमों में सामान्य समुदाय के लिए कोई खास प्रतिनिधित्व नहीं बताया गया है। CJI ने भी हमारी इस दलील को माना और सुझाव दिया कि एक खास कमेटी बनाई जानी चाहिए, जिसमें शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हों, जिन्हें इस खास विषय का ज्ञान हो और अब यह मामला 19 मार्च के लिए सूचीबद्ध है और उम्मीद है कि कुछ अच्छा होगा।



