jeet singh negi birth Centenary Series

सुषमा जुगराण ध्यानी

आज से पचास-पचहत्तर-सौ साल पहले गढ़वाली लोक साहित्य के नाम पर जो भी अमूल्य और अद्वितीय रचा गया, वह लोक की जुबान पर तो हाथों हाथ हमेशा के लिए चढ़ता चला गया, लेकिन उनमें से अधिसंख्य रचयिताओं या लेखकों की पहचान समाज में लगभग गुम ही रही। इसके पीछे विषम भौगोलिक परिस्थितियों के साथ ही प्रचार-प्रचार माध्यमों की कमी तो मुख्य कारण था ही, लेकिन उस दौर के रचनाकारों के मन में भी अपनी पहचान को लेकर कोई बड़ी अपेक्षा, आकांक्षा या लालसा नहीं रही, अन्यथा वे किसी न किसी रूप में इसे बनाये रखने का यत्न जरूर करते।

गढ़वाली बोली-भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के शलाका पुरुष या पुरोधा गीतकार-संगीतकार और साहित्य सेवी जीत सिंह नेगी हमारे लोकसाहित्य की ऐसी ही थाती हैं, जिन्होंने ईश्वर की कृपा से 95 वर्ष की दीर्घायु पाई और किशोरावस्था से ही अपनी विलक्षण सृजनात्मक मेधा का भरपूर उपयोग करते हुए गढ़वाली लोकगीत और संगीत के भंडार को समृद्ध किया, लेकिन अपने स्तर पर अपने को स्थापित करने का कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं किया। जबकि दिल्ली-मुंबई से लेकर सुदूर रंगून तक अपनी गीत-संगीत यात्रा को पल्लवित-पुष्पित करते हुए और रंगमंच के माध्यम से वह गढ़वाल की सामाजिक- सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान दिलाते रहे।

इस क्रम में अपनी सांगीतिक यात्रा के कई-कई रिकार्ड भी उन्होंने अपने नाम दर्ज किये। उन्होंने पहाड़ के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश के साथ ही वहां के स्त्री-पुरुष के अंतर्मन की संवेदनाओं को मधुर गीत-संगीत और नाटकों के माध्यम से बेहद खूबसूरती से अभिव्यक्त किया। इस रूप में वहां के समाज को वह इतना अद्वितीय सौंप गए कि आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ा आदर्श बन गये। विडम्बना यह रही कि उनसे प्रेरित होकर आगे एक से बढ़कर एक गीतकार-संगीतकार ख्याति अर्जित करते रहे, लेकिन जीवन के उत्तरार्द्ध में परिवार के साथ देहरादून में रह रहे जीत सिंह जी की सुध न किसी सरकार ने ली और न ही संस्कृति के कथित संरक्षक अनेकानेक समाजसेवी संगठनों ने। बहरहाल दिल्ली के उत्तराखंड लोक-भाषा साहित्य मंच द्वारा जीत सिंह नेगी जी जन्मशती के निमित्त 2026 में वर्ष भर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित विमर्श का संकल्प लिया है, जो एक सराहनीय पहल है।

उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच दिल्ली के मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी ने बताया कि दिल्ली के अलावा उत्तराखंड के चुनिंदा शहरों में भी जीत सिंह जी की स्मृति में वर्ष भर आयोजन होते रहेंगे और अंत में एक वृहत् आयोजन के साथ उनकी शताब्दी यात्रा संपन्न होगी। बीते एक फरवरी को डीपीएमआई से इसका शुभारंभ हो चुका है। श्री ध्यानी ने बताया कि स्वर्गीय जीत सिंह नेगी जी की शताब्दी पर हम सबको व साथ ही सरकार और सांस्कृतिक संगठनों व लोगों को आगे आना चाहिए। ताकि समाज में नेगी जी के काम और व्यक्तित्व की जानकारी सबको मिले।

इस कड़ी का दूसरा आयोजन 22 मार्च, 2026 को दिल्ली के मयूर पब्लिक स्कूल में आयोजित हुआ, जिसमें मैं भी उपस्थित थी। दो भागों में बंटे कार्यक्रम (व्यक्तित्व कृतित्व पर चर्चा और गीत गायन) में जीत सिंह जी के रचनाकर्म पर चर्चा के साथ आखिरी में पूरी शाम उनके मधुर गीतों के नाम समर्पित हो गई, जिसका श्रोताओं ने भरपूर आनंद लिया। उनके सर्वाधिक लोकप्रिय गीत ‘तू होलि बीरा… ‘ और ‘घास काटि कि प्यारी छैला…’ को दो-दो तीन गायकों ने गाया और सभी ने भरपूर सराहना पाई। यह जीत सिंह नेगी के लोक के साथ जुड़े खूबसूरत मनोभावों की अभिव्यक्ति ही है कि उनके गीतों को जितनी बार सुना जाए, श्रोता उतने ही आनंद के सागर में डूबते चले जाते हैं। एक अकादमिक आयोजन के बीच कर्णप्रिय गीतों की यह प्रस्तुति अप्रासंगिक नहीं लगी, बल्कि स्वागत योग्य थी, क्योंकि जीत सिंह जी ने मूल रूप से गीत संगीत के माध्यम से ही अपने समाज और संस्कृति को अभिव्यक्त करने का बीड़ा उठाया था, इसलिए आज की पीढ़ी को उनसे भी परिचित होना जरूरी है।

सोचिए, भाषण वाले मंच पर केवल ढोलक, तबला और हारमोनियम के साथ जब पूरा कार्यक्रम अनायास ही गीत संगीत पर केंद्रित हो गया और सब आनंदित हो गये तो उनके गीतों की वह सांगीतिक प्रस्तुति कितनी कर्णप्रिय और शानदार होगी जो पूरे वाद्य यंत्रों और गायकों के सुरों से सजी होगी।

संयोग से कार्यक्रम में उत्तराखंड के जाने-माने संगीतकार और समाज सेवी राजेन्द्र चौहान भी उपस्थित थे और उन्होंने जीत सिंह जी को गुरुजी नाम से संबोधित करते हुए उनसे जुड़ी यादें साझा कीं। यह कितना सुखद होगा कि जन्मशती के निमित्त राजेंद्र जी गुरु दक्षिणा के रूप में अपने गुरु जी (जीत सिंह नेगी जी) के गीतों की एक यादगार प्रस्तुति आयोजित कर दें।

कार्यक्रम का सबसे स्मरणीय पहलू था उत्तराखंड साहित्य मंच द्वारा जीत सिंह जी की बड़ी पुत्री और छोटी पुत्री के पति को सम्मानित करना। सभागार में बैठे सुधीजन चाहते थे कि उनकी पुत्री अपने पिता से जुड़ी यादें साझा करें लेकिन आग्रह के बावजूद वह कुछ नहीं बोल पाईं। हां, छोटी बहन के पति ने मंच का आभार जताते हुए अपने ससुर जी से जुड़ी महत्वपूर्ण यादों को साझा किया और उनकी रचनाओं के संदर्भ में टिहरी के तत्कालीन सांसद राजा मानवेंद्र शाह से अपनी खास मुलाकात का जिक्र भी किया।

मयूर पब्लिक स्कूल के चेयरमैन, गढ़वाली, कुमाऊनी, जौनसारी भाषा अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष मनवर सिंह रावत ने कहा कि स्वर्गीय जीत सिंह नेगी जी की शताब्दी समारोह श्रृंखला का आयोजन करके उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच दिल्ली ने अनुकरणीय पहल शुरू की है। मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी की यह पहल जरूर सफल होगी।

उत्तराखण्ड सरकार के पूर्व राज्यमंत्री व आन्दोलनकारी धीरेन्द्र प्रताप ने कहा कि जीत सिंह नेगी एक व्यक्ति नहीं एक युग का नाम है। स्वर्गीय नेगी जैसा विराट व्यक्तित्व दूर – दूर तक कहीं नजर नहीं आता। सही मायने में ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपने गौरवपूर्ण इतिहास को समझने व सीखने का जरिया हैं। सुप्रसिद्ध संगीतकार राजेन्द्र चौहान ने कहा कि जीत सिंह नेगी जी हमारे गुरु थे। आज का यह आयोजन बहुत महत्वपूर्ण है। नेगी जी जितने बड़े कलाकार उतने ही सरल और सुहृदय व्यक्ति थे। उत्तराखण्ड लोक भाषा साहित्य मंच दिल्ली का सतत प्रयास रहता है कि हमरी भाषा, साहित्य व संस्कृति आगे बढ़े और नई पीढ़ी इससे जुड़े।

गढ़वाली, कुमाऊनी, जौनसारी भाषा अकादमी के पूर्व सचिव संजय गर्ग ने कहा कि स्वर्गीय जीत सिंह नेगी जी पर ऐसे आयोजन लगातार होने चाहिए। इससे नई पीढ़ी को सीखने और समझने का अवसर मिलता है। श्री संजय गर्ग के कार्यकाल में अकादमी में बहुत से आयोजन हुए और समाज में बहुत ही सकारात्मक संदेश गया।

वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी ने कहा कि स्वर्गीय जीत सिंह नेगी ने हमारे लोक के लिए ऐतिहासिक काम किया है। उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच दिल्ली की यह पहल स्वागत योग्य है। आशा है भविष्य में ऐसे विराट आयोजन होते रहेंगे। मंच के कोषाध्यक्ष दर्शन सिंह रावत ने नेगी जी की जीवनी पढ़कर सुनाई। वरिष्ठ साहित्यकार रमेश चन्द्र घिल्डियाल सरस ने भाषा, साहित्य व संस्कृति पर आधार वक्तव्य रखा तथा उत्तराखण्ड जागरण के संपादक सत्येन्द्र सिंह रावत ने जीत सिंह नेगी जी पर अपनी बात रखी।

मयूर पब्लिक स्कूल के चेयरमैन मनवर सिंह रावत, सुप्रसिद्ध लोकगायक सर्वेश्वर बिष्ट, मनोरमा तिवारी भट्ट, ओम ध्यानी, भुवन रावत आदि ने भजन व नेगी जी के गीतों से समा बांध दिया।

अपनी बात करूं तो मैंने भव्य व्यक्तित्व के स्वामी जीत सिंह जी को मंडल मुख्यालय पौड़ी के टेनिस कोर्ट में अपने साजिंदों की पूरी टीम के साथ मधुर गीत संध्या प्रस्तुत करते हुए आठ नौ साल की उस अबोध उम्र में देखा था जब बच्चों को गीत-संगीत की कोई समझ नहीं होती। मुझे यह भी याद नहीं कि उन्होंने कौन-कौन से गीत गाये होगें फिर भी अपनी पूरी टीम के साथ मध्य में हारमोनियम पर उनके भव्य व्यक्तित्व की धुंधली स्मृति मेरे मन में हमेशा के लिए अंकित है। हां, उनके कई लोकगीत बचपन में मां के मुख से सुनते हुए ही कंठस्थ हैं। हालांकि मां को गीतकार का नाम शायद ही ज्ञात रहा हो। यही तो है एक सच्चे लोकगायक होने का सार्टिफिकेट जो निस्वार्थ भाव समाज के लिए लगातार रचता चला जाता है। इस रूप में जीत सिंह जी का आभामंडल बहुत बड़ा था। अंत में जीत सिंह जी को शत-शत नमन और उनके नाम समर्पित सुंदर समागम के लिए उत्तराखंड  लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली का आभार-अभिनंदन।

इस आयोजन में की साहित्यकार, पत्रकार, समाजसेवी व अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे। अंत में वरिष्ठ कवि जयपाल सिंह रावत ने धन्यवाद ज्ञापित किया और सबको साधुवाद दिया। कार्यक्रम का संचालन मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी ने किया।