देवभूमि संवाद | पौड़ी गढ़वाल

उत्तराखंड के कालजयी लोकगायक, गीतकार, नाटककार एवं गढ़वाली लोकसंगीत के पुरोधा स्वर्गीय जीत सिंह नेगी की स्मृतियों को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके पैतृक गांव अयाळ (पैडलस्यूं), जनपद पौड़ी गढ़वाल में स्मृति द्वार का निर्माण किया जाएगा। प्रशासन द्वारा इसके लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली गई है और शीघ्र ही निर्माण कार्य शुरू होने की उम्मीद है।

ग्राम प्रधान रोशनी देवी ने बताया कि जीत सिंह नेगी की स्मृति में गांव में स्मृति द्वार बनाए जाने की मांग लंबे समय से की जा रही थी। उनका कहना है कि स्मृति द्वार बनने से नई पीढ़ी को उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और जीत सिंह नेगी के योगदान को जानने-समझने की प्रेरणा मिलेगी। यह पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का विषय है।

व्लॉग के बाद तेज हुई पहल

हाल ही में प्रसिद्ध व्लॉगर एवं समाजसेवी सुभाष कुकरेती द्वारा अयाळ गांव पर तैयार किए गए एक व्लॉग के बाद यह विषय व्यापक स्तर पर लोगों के संज्ञान में आया। इसके बाद ग्राम प्रधान और क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों ने सरकार एवं प्रशासन के समक्ष स्मृति द्वार निर्माण की मांग रखी। प्रशासन ने इस पर सकारात्मक पहल करते हुए टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली है।

शताब्दी वर्ष में होंगे कई आयोजन

उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के संयोजक दिनेश ध्यानी ने बताया कि संगठन वर्ष 2027 में स्वर्गीय जीत सिंह नेगी की जन्म शताब्दी को बड़े स्तर पर मनाने की तैयारी कर रहा है। वर्षभर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

उन्होंने बताया कि स्मृति द्वार का निर्माण पूरा होने के बाद अयाळ गांव में भी एक विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है। इसके अलावा दिल्ली में प्रस्तावित शताब्दी समारोह में नेगी जी के गीतों की प्रस्तुति, नाटकों का मंचन, संगोष्ठियां तथा उनके सांस्कृतिक योगदान पर विशेष चर्चा होगी। उन्होंने उत्तराखंड सरकार एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से भी इस ऐतिहासिक अवसर पर व्यापक कार्यक्रम आयोजित करने की अपील की।

गढ़वाली लोकसंगीत के पहले ग्रामोफोन कलाकार

2 फरवरी 1927 को पौड़ी गढ़वाल के अयाळ गांव में जन्मे जीत सिंह नेगी उत्तराखंड के पहले लोकगायक थे, जिनके 6 गढ़वाली लोकगीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड वर्ष 1949 में यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी द्वारा जारी किया गया। उन्होंने मुंबई की नेशनल ग्रामोफोन कंपनी में उप संगीत निर्देशक के रूप में भी काम किया। नेगी जी ने गढ़वाली लोकसंगीत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे 1940 के दशक में ही गढ़वाली भाषा और भावनाओं को आवाज देने वाले पहले व्यक्ति थे और स्वतंत्रता के बाद के काल में देहरादून में एक गढ़वाली संस्था बन गए।

उन्होंने दो हिंदी फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में भी कार्य किया और संगीत, रंगमंच तथा लोकसंस्कृति के संरक्षण में अपना पूरा जीवन समर्पित किया। उनका निधन 21 जून 2020 को देहरादून स्थित उनके आवास पर हुआ था।

गीत, नाटक और संस्कृति को दी नई पहचान

जीत सिंह नेगी ने गढ़वाली रंगमंच और लोकसंगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनका नाटक ‘भरी भूल’ पहली बार 1952 में मुंबई के दामोदर हॉल में गढ़वाल भ्रातृ मंडल के कार्यक्रम में मंचित किया गया था। नाटक तुरंत हिट हो गया और इसने न केवल मुंबई से आए प्रवासी गढ़वालियों के मन को झकझोर दिया, बल्कि पूरे भारत में प्रवासी गढ़वालियों को अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नाटक के महत्व के बारे में जागरूक किया। संवाद हिंदी और गढ़वाली में हैं और यही इसकी अनूठी विशेषता थी। उनके प्रमुख नाटकों में ‘भरी भूल’, ‘मलेथा की कूल’, ‘जीतू बागडवाल’, ‘रामी’ और ‘राजू पोस्टमैन’ शामिल हैं। उनके लोकप्रिय गीत “तू होली ऊँची डाँड्यू मां, वीरा घसियारी का भेष मां” को भारतीय जनगणना सर्वेक्षण विभाग ने वर्ष 1961 में सर्वप्रिय लोकगीत के रूप में उल्लेखित किया था।

उनका पहला गढ़वाली गीत 1954 में आकाशवाणी से प्रसारित हुआ था। उनके नाटक और गीत 600 से अधिक बार प्रसारित हुए, जो किसी भी क्षेत्रीय भाषा के कलाकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। रेडियो गीत-नाटिका ‘जीतू बागडवाल’ और ‘मलेथा की कू’ भी आकाशवाणी से 50 से अधिक बार प्रसारित हुए। रामी का हिंदी संस्करण दिल्ली दूरदर्शन द्वारा प्रसारित किया गया था। उनके रचनात्मक कार्यों ने गढ़वाली भाषा, लोकगीत, लोकनृत्य और पर्वतीय संस्कृति को नई पहचान दिलाई।

प्रसिद्ध लोकगायक जीत सिंह नेगी को लीजेंडरी सिंगर’ सम्मान से नवाजा गया, इसके साथ ही ‘यंग उत्तराखंड लाइफ टाइम अचीवमेंट’ सम्मान से लोकगायक चंद्र सिंह राही को नवाजा गया। यही नहीं जीत सिंह नेगी के गीतों को संस्कृति विभाग ने पुस्तक के रूप में संकलित किया है। यह उनके लिए किसी खास सम्मान से कम नहीं है। म्यारा गीत नाम की इस पुस्तक में नेगी के 1950 व 60 के दशक में गाए गीत शामिल किए गए हैं। अपने समय में ये गीत गढ़वाल व कुमाऊं क्षेत्र में काफी लोकप्रिय थे। लिहाजा इन गीतों को उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर भी माना जाता है।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

गढ़वाली लोकसंगीत के इतिहास में जीत सिंह नेगी का योगदान अतुलनीय माना जाता है। उन्हें गढ़वाली गीत-संगीत का अग्रदूत और प्रेरणास्रोत माना जाता है। उनके सम्मान में बनने वाला स्मृति द्वार न केवल उनकी विरासत को सहेजने का माध्यम बनेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का भी महत्वपूर्ण प्रयास होगा।