नई दिल्ली: कुमाऊनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से कुमाऊनी भाषा साहित्य एवं सांस्कृतिक समिति (पंजी.) द्वारा 1 फरवरी 2026 को दिल्ली स्थित गढ़वाल भवन में कुमाऊनी भाषा संगोष्ठी एवं कवि सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में कुमाऊनी भाषा से जुड़े सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर गंभीर और सार्थक विमर्श हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुरेंद्र रावत ने की, जबकि समिति के महासचिव राजू पाण्डेय ने कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावी संचालन किया। समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह हाल्सी ने अपने संबोधन में समिति के उद्देश्यों, गतिविधियों और भावी योजनाओं की जानकारी देते हुए कहा कि संस्था का मुख्य लक्ष्य कुमाऊनी भाषा और संस्कृति को पुष्पित एवं पल्लवित करना है। उन्होंने बताया कि समिति आगामी चार वर्षों में 400 नए लेखकों और साहित्यकारों को जोड़ने का लक्ष्य लेकर कार्य कर रही है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तराखंड सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता चंद्र शेखर रावत रहे। इस अवसर पर उन्होंने आमंत्रित कवियों और वक्ताओं को सम्मान पत्र प्रदान किए। समारोह के दौरान कुमाऊनी भाषा सीखने हेतु तैयार की गई प्रवेशिका “तुतुरी” का लोकार्पण भी किया गया।

सुरेंद्र सिंह हाल्सी ने बताया कि समिति पिछले दो वर्षों से कुमाऊनी पत्रिका “दुदबोली” का नियमित प्रकाशन कर रही है, जिसका संपादन वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी द्वारा किया जा रहा है।

संगोष्ठी में कुमाऊनी भाषा एवं साहित्य, लोक-संस्कृति, पारंपरिक त्योहार, लोक-जागर, सामाजिक सरोकार, कुमाऊनी फिल्मों की विकास यात्रा, योग एवं धर्म से जुड़े कुमाऊनी लोकबोध जैसे विषयों पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। कवि सम्मेलन में कवियों ने काव्य-पाठ के माध्यम से कुमाऊनी भाषा की संवेदनाओं, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में स्वर्गीय गोपाल बाबू गोस्वामी एवं स्वर्गीय जीत सिंह नेगी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

इस अवसर पर पूर्ण चंद्र कांडपाल, रमेश हितैषी, फिल्मकार संजय जोशी, वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी, योग गुरु रमेश कांडपाल, संगीतकार राजेंद्र चौहान, पूर्व राज्य मंत्री धीरेंद्र प्रताप सहित अनेक साहित्यकार, कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।

समिति के स्लोगन “काव्य में कुमाऊं, स्वर में संस्कृति” के अनुरूप आयोजित यह कार्यक्रम कुमाऊनी भाषा और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक सशक्त और सार्थक पहल सिद्ध हुआ।