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युवा साहित्यकार रवि डबराल का सद् प्रकाशित उपन्यास लालच वासना लत को अद्धोपांत पढ़ने पर आभास हुआ कि वर्तमान परिवेश में नए लेखक, नए कलेवर और तीखे तेवर के साथ अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। रवि डबराल मूलतः उत्तराखंड के टिहरी जिले से वास्ता रखते हैं और उनका हाल निवास सिंगापुर है। यही वजह है कि उन्होंने देवभूमि उत्तराखंड को केंद्र में रखकर प्रस्तुत उपन्यास की विषय वस्तु का चयन किया है। हिंसा पर अहिंसा की जीत को दर्शाता यह उपन्यास केवल समस्याओं को उठाता ही नहीं है बल्कि सिलसिलेवार समाधान भी प्रस्तुत करता है। योग और आध्यात्मिक चेतना के जरिए विषम परिस्थितियों में भी उपन्यास का नायक खोजी पत्रकार सूरज अपने आपको कब्र से बाहर निकालकर मौत को मात देकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहाद छेड़ता है।

पुलिस, पॉलिटीशियन, मीडिया, माफिया और ड्रग्स माफिया के सिंडिकेट को जब न्याय के मंदिर में बैठे पुजारियों की शह मिलने लगती है तो लेखकीय दायित्व और भी बढ़ जाता है। अपने लेखकीय धर्म का निर्वाह करते हुए रवि आदर्श को स्थापित करने में यथार्थ की अवहेलना नहीं करते हैं। उपन्यास का मुख्य पात्र सूरज जोकि एक न्यूज़ चैनल में खोजी पत्रकार है वह भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम देता है लेकिन माफिया तंत्र किस हद तक जाकर सूरज जैसे ईमानदार पत्रकार को प्रताड़ित करते हैं इसकी बेहतर बानगी उपन्यास में देखने को मिलती है। भला हो युवा अधिवक्ता गुलशन नारंग का जो पैसे की हवस में नहीं पड़कर इंसाफ की लड़ाई में सूरज का साथ देता है। सूरज का भाई विजय किस तरह से रिश्वत देकर पुलिस प्रशासन में ओहदा पाता है और विजय की चारित्रिक दुर्बलताओं का चित्रण भी बखूबी किया गया है। सत्ताधारी दल के नेता, मीडिया हाउस के मालिक,  भ्रष्ट पुलिस अधिकारी, ड्रग्स माफियाओं के काले कारनामों को उजागार करने में साहित्यकार रवि डबराल ने बड़ी सूझबूझ से कलम चलाई है। इन सफेदपोश लोगों के काले कारनामों को उजागर करने में खोजी पत्रकार सूरज सफेदपोश लोगों की रखैलों से लेकर विषकन्या सुमन कुलकर्णी की थाह लेने में गुरेज नहीं करता है।

भारत की आत्मा गांवों में बसती है और गांवों के विकास से ही देश का सर्वांगीण विकास संभव है इस मूल मंत्र के निहितार्थ प्रस्तुत उपन्यास में मात्र ग्राम्य विकास की परिकल्पना ही नहीं की गई है बल्कि खेती किसानी की बेहतरी के लिए रोडमैप भी दिया गया है। सैनिकों की दुश्वारियों को गिनाने की कोशिश भी लेखक ने की है। कहना गलत नहीं होगा कि एक साथ कई समस्याओं के चित्रण के बावजूद लेखकीय भटकाव से बचकर निकलने में रवि डबराल ने बड़ी चतुराई से सफलता हासिल की है। शब्दों के जरिए चमत्कार पैदा करने में लेखक दक्ष हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उपन्यास के लेखक ने हिंदी फिल्में खूब देखी हैं और शायद यही वजह है कि उपन्यास में कहीं कहीं पर नाटकीयता का पुट भी नज़र आता है। “लालच वासना लत” पर भविष्य में चलचित्र निर्माण की संभावनाओं को खारिज नहीं किया जा सकता है। बहरहाल उपन्यास के तौर पर लालच वासना लत एक पठनीय उपन्यास है।

पुस्तक : लालच वासना लत

लेखक : रवि डबराल

प्रकाशक : नोशन प्रेस डाँट काम

पृष्ठ : 353

मूल्य : 335 रुपये मात्र

समीक्षक : प्रदीप कुमार वेदवाल