श्रीनगर गढ़वाल: 19वीं सदी के महान संत और आध्यात्मिक पुनर्जागरण के अग्रदूत श्री रामकृष्ण परमहंस की जयंती 18 फरवरी को श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाई जाएगी। वे महान दार्शनिक और संन्यासी स्वामी विवेकानंद के गुरु थे और भारतीय आध्यात्मिक चेतना को नया आयाम देने वाले संतों में अग्रणी माने जाते हैं।

माँ काली और रामकृष्ण का अलौकिक संबंध

कोलकाता स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर के भव्य मंदिर में जब रामकृष्ण ने पुजारी का पद संभाला, तो उनके लिए पूजा केवल एक विधि-विधान नहीं थी। जहाँ सामान्य जन के लिए प्रतिमा केवल पाषाण (पत्थर) थी, वहीं रामकृष्ण के लिए वह ‘चिन्मयी’ (चेतना से युक्त) साक्षात जगतजननी थीं।

बालक सा निश्छल भाव: उनकी साधना में कोई जटिल कर्मकांड या शास्त्रार्थ का अहंकार नहीं था। उनमें एक अबोध बालक की व्याकुलता थी। वे माँ काली से वैसे ही हठ करते, संवाद करते और रूठते थे, जैसे एक बच्चा अपनी जन्मदात्री माँ से करता है। वे माँ को भोजन कराते, पंखा झलते और घंटों उनसे बातें करते थे।

लोककथाओं और उनके जीवनीकारों के अनुसार, जब उन्हें माँ के साक्षात दर्शन नहीं हुए, तो उनकी व्याकुलता चरम पर पहुँच गई। उन्होंने सोचा, “यदि माँ नहीं मिलीं, तो इस जीवन का क्या मोल?” उन्होंने मंदिर में रखी तलवार (खड्ग) उठा ली। उसी क्षण चेतना का एक महासागर उमड़ा और उन्हें माँ के ज्योतिर्मय स्वरूप का दर्शन हुआ। उस दिन के बाद वे ‘भाव-समाधि’ की अवस्था में रहने लगे।

शक्ति और ब्रह्म की अभिन्नता: रामकृष्ण देव का दर्शन अत्यंत स्पष्ट था। वे कहते थे कि जैसे अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति (जलाने की शक्ति) को अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही निराकार ब्रह्म और उसकी सगुण शक्ति (काली) अभिन्न हैं। काली ही सृष्टि की रचना, पालन और संहार करती हैं।

जितने मत, उतने पथ” का संदेश

रामकृष्ण परमहंस ने केवल हिंदू साधना ही नहीं, बल्कि इस्लाम और ईसाई साधना का भी अभ्यास किया और निष्कर्ष दिया कि ईश्वर तक पहुँचने के मार्ग भिन्न हो सकते हैं, लक्ष्य एक ही है।

उनका प्रसिद्ध सिद्धांत “शिव ज्ञाने जीव सेवा” मानव सेवा को ही ईश्वर-भक्ति मानता है। उन्होंने सिखाया कि मंदिर से बाहर प्रत्येक पीड़ित और जरूरतमंद व्यक्ति में ईश्वर का वास है।

धार्मिक कट्टरता और मानसिक अशांति के दौर में उनका समन्वयवादी दर्शन आज भी मार्गदर्शक माना जाता है। उनके जीवन ने विश्व को विवेकानंद जैसा महान दार्शनिक दिया, जिसने भारतीय आध्यात्मिकता को वैश्विक पहचान दिलाई।

विशेषज्ञों का मानना है कि रामकृष्ण परमहंस की जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी दिन है। सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि समाज सेवा, सहिष्णुता और परहित की भावना को जीवन में उतारा जाए।

डॉ. अखिलेश चन्द्र चमोला

श्रीनगर गढ़वाल