नई दिल्ली: भारत को ऋतुओं का देश कहा जाता है और इन सभी ऋतुओं में बसंत का स्थान सर्वोपरि माना गया है। शास्त्रों में इसे ‘ऋतुराज’ की संज्ञा दी गई है। माघ शुक्ल पंचमी को मनाया जाने वाला बसंत पंचमी पर्व प्रकृति के नव-श्रृंगार, प्रेम, उल्लास और ज्ञान का प्रतीक है।
बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही प्रकृति में अद्भुत परिवर्तन दिखाई देने लगता है। वृक्षों पर नई कोपलें, खेतों में लहलहाती पीली सरसों, आम्र-मंजरियों की सुगंध और मंद समीर वातावरण को आनंदमय बना देती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती ने स्वयं पीली चुनरी ओढ़ ली हो।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन विद्या, बुद्धि और संगीत की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इस अवसर पर विद्यालयों, शिक्षण संस्थानों और घरों में सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु माँ सरस्वती के समक्ष मंत्रोच्चार कर ज्ञान, विवेक और आत्मबल की कामना करते हैं।
शुभ मुहूर्त (वर्ष 2026):
ज्योतिष शास्त्र में बसंत पंचमी को अबूझ मुहूर्त माना गया है, अर्थात इस दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती। वर्ष 2026 में यह पर्व 23 जनवरी को मनाया जाएगा। पूजा का विशेष शुभ समय प्रातः 7:15 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक रहेगा।
पीत वर्ण का महत्व: सुख और समृद्धि
बसन्त पंचमी के दिन पीले रंग का विशेष महत्व होता है। पीले वस्त्र धारण करना, हल्दी का तिलक लगाना और पीले व्यंजनों का सेवन शुभ माना जाता है। पीला रंग ऊर्जा, उत्साह और समृद्धि का प्रतीक है।
बसंत पंचमी का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी उल्लेखनीय है। इसी दिन प्रगतिवादी काव्यधारा के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म हुआ था। साथ ही यह पर्व वीर बालक हकीकत राय के बलिदान की स्मृति भी कराता है। महाकवि कालिदास ने इसे ‘ऋतु उत्सव’ कहा है, जबकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे ‘मादक उत्सवों का काल’ बताया है।
वास्तव में, बसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में नवचेतना, प्रेम, सौंदर्य और ज्ञान के संचार का उत्सव है। यह पर्व हमें ज्ञानार्जन के साथ-साथ प्रकृति के संरक्षण और सकारात्मक जीवन दृष्टि अपनाने का संदेश देता है।
डॉ. अखिलेश चन्द्र चमोला



