प्रोफेसर प्रदीप कुमार वेदवाल
गढ़वाल लोकसभा सीट से मेरी बालपन से ही रुचि रही है। अस्सी के दशक के शुरुवाती वर्षों में मैं हेमवती नंदन बहुगुणा के “तराजू” चुनाव चिन्ह वाले पोस्टर अपने जंगले वाले मकान और छज्जा वाले मकान पर आटे की लोई बनाकर चिपकाया करता था। 1984 और 1989 में लोकसभा चुनावों के दौरान में गढ़वाल से बाहर रहा लेकिन पहले कांग्रेसी सांसद के रूप में चंद्रमोहन सिंह नेगी की चमक और फिर जनता दल के सांसद के तौर पर चंद्रमोहन सिंह नेगी की धमक आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है।
90 के दशक की शुरुवात में जब देशभर में राम लहर चली तो उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जिले भी राम लहर के असर से अछूते नहीं रहे। टिहरी लोकसभा सीट पर महाराजा मानवेंद्र शाह, गढ़वाल लोकसभा सीट से सेवानिवृत्त मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी, अल्मोड़ा-पिथौरागढ से जीवन शर्मा, नैनीताल से बलराज पासी और हरिद्वार सुरक्षित सीट से हरपाल साथी न केवल सांसद का चुनाव जीते बल्कि नाममात्र के भाजपाई संगठन और गिनतीभर के कार्यकर्त्तांओं के बल पर इस चमत्कारिक जीत के साथ उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जिलों में भारतीय जनता पार्टी की नींव को मजबूती देने लगे।
नब्बे के दशक में जब उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी एक रुपये का सदस्य बना रही थी तो हमारे निकटवर्ती नैथाना गांव के कक्कू नैथानी को सदस्य बनाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी। मैंने भी तब ताव में आकर कहा कि अगर आपसे नहीं बन पा रहे हैं सदस्य तो मुझे दीजिए रसीद बुक। गिनती की कुल दस पर्चियां कटनी शेष रह गई थी लेकिन मेरा भ्रम तब टूटा जब मैं अपने को अपने लूला चाचा (स्वर्गीय नरेंद्र कुमार वेदवाल) को मिलाकर कुल दो सदस्य ही बना पाया। उन दौर में गढ़वाल लोकसभा सीट में मनोहर कांत ध्यानी, मोहन सिंह गांववासी, हरक सिंह रावत, रमेश पोखरियाल निशंक आदि कुछ गिने-चुने नेता और नाममात्र के कार्यकर्ता हुआ करते थे।
1991 में सेवानिवृत्त मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी जब गढ़वाल लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के सांसद चुनकर आए तो फिर उन्होनें अपनी योग्यता और कार्यकुशलता से अपार लोकप्रियता हासिल की। बात चाहे लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी के मुख्य सचेतक के दायित्व की हो या फिर अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में लोकप्रिय सड़क एवं परिवहन राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार की हो फिर चाहे लोकपाल बिल के हिमायती उत्तराखंड के खण्डूडी हैं जरूरी जैसे अनुशासनप्रिय उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की हो। हर दायित्व में मेजर जनरल खण्डूड़ी के कार्यकाल को स्वर्णिमकाल के तौर पर याद किया जाता है।
जैसा कि मैंने पहले बताया भी है कि गढ़वाल लोकसभा में मेरी बालपन से ही रुचि रही है इसलिए एच.एन. बहुगुणा से लेकर सी.एम.एस. नेगी को देखने भर से मन में संतोष होता था कि मैंने अपनी पसंदीदा गढ़वाल लोकसभा सीट के सांसद को देख,सुन लिया है। लेकिन जब बी.सी. खण्डूड़ी सांसद बने तो पहले एक छात्र नेता के रूप में और बाद में एक पत्रकार के तौर पर सांसद और केंद्रीय मंत्री खण्डूडी से अनेकों बार मिलना-मिलाना, तर्क-विर्तक, वाद-विवाद करने के अवसर मिले।
मुझे आज भी याद है 3 मार्च 1993 का वो दिन जब हम दिल्ली के पंचकुंइया रोड स्थित गढ़वाल भवन में अखिल भारतीय उत्तरांचल विद्यार्थी परिषद का वार्षिक उत्सव मना रहे थे। गढ़वाल सांसद खण्डूड़ी, टिहरी सांसद मानवेंद्र शाह और दिल्ली में मंडावली विधानसभा से नवनिर्वाचित विधायक मुरारी सिंह पंवार को हमने आमंत्रित किया था। सांसद मानवेंद्र शाह और विधायक मुरारी सिंह पंवार तो अपनी व्यस्तता के चलते आ नहीं पाए। गढ़वाल सांसद खण्डूड़ी नियत समय पर आ गए। तब तक हम लोग दर्री बिछाने और कुर्सी लगाने में ही व्यस्त थे कि सांसद खण्डूडी ने कहा कि वो समय के पाबंद हैं और आपके आयोजन में अभी एक से डेढ घंटे की देरी है इसलिए मैं जा रहा हूं। उस वक्त सांसद खण्डूड़ी का यूं वापस लौट जाना हम सबको बहुत अखरा था। लेकिन एक हफ्ते बाद जब मैं अपनी नाराज़गी जताने उनके आवास पर गया तो मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी ने टाइम मैनेजमेंट की जो बुनियादी बातें मुझे समझाई वो बातें मुझे आज भी बहुत बल देती हैं।
मुझे याद आते हैं वो दिन जब दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में भारतीय जनता पार्टी के उत्तरांचल प्रकोष्ठ से जुड़े श्यामलाल मजेडा और ओम प्रकाश भट्ट आदि ने तीन दिवसीय आयोजन (संभवत कौथिग) किया था। दूसरे दिन मुझे भी उस दौर के लोकप्रिय कवियों महेश तिवाड़ी और अन्य के साथ कविता पाठ करना था। तब कवि कैलाश धस्माना अमृतसर से तबादला होकर दिल्ली आए ही थे कि उन्होंने मेरे से कहा कि वो सेना में कार्यरत हैं और उनकी इच्छा है कि वो सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल और गढ़वाल के लोकप्रिय सांसद खण्डूड़ी जी के सम्मुख अपना गढ़वाली कविता पाठ करें। मैंने जब ओम प्रकाश भट्ट से इस विषय में बात की तो उन्होंने कहा कि कवियों की सूची में कैलाश धस्माना का नाम नहीं है इसलिए वो कविता पाठ नहीं कर सकते हैं। मैंने जब कहा कि चलिए मेरी जगह पर कैलाश धस्माना से कविता पाठ करवा लीजिए तो श्यामलाल मजेडा ने स्वीकृति दे दी। कैलाश धस्माना ने जब कविता के माध्यम से सांसद खण्डूडी से सवाल किया कि “वोट देकि भ्यजी नेता लोकसभा अर विधानसभा का बीच लेकिन दुख कि बात याच भयों कि अबि तक उत्तराखंड क्यो नी छ?”
तब सांसद खण्डूड़ी ने कहा कि हमारे फौजी भाई ने जो सवाल उठाया है उसका एक ही जबाव है और वो है हमारी एकता और उत्तराखंड राज्य के लिए निर्णायक आंदोलन। जब-जब भी मैंने सड़क और संसद में मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी को उत्तराखंड राज्य के पक्ष में बोलते सुना तो भले ही वो उत्तराखंड की जगह उत्तरांचल बोलते रहते थे लिए राज्य निर्माण के लिए उनकी प्रतिबद्धता सदैव ही असंदिग्ध रही है।
1996 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जिलों में एक नारा खूब चला था कि “राज्य नहीं तो चुनाव नहीं”। सच में यह नारा असरकारक भी रहा और, तब गढ़वाल लोकसभा सीट से तिवारी कांग्रेस के सतपाल महाराज और नैनीताल सीट से नारायण दत्त तिवारी लोकसभा पहुंचे थे। तब सबसे पहले हारने के बाद मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी का इंटरव्यू लेने वाले दिल्ली के पत्रकारों में पहला पत्रकार में ही था। यह बात मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी अन्य पत्रकारों की मौजूदगी में अक्सर मुझे इंगित करके कहा करते थे।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान उत्तराखंड जन मोर्चा ने उत्तराखंड राज्य निर्माण के पक्ष में हस्ताक्षर अभियान चलाया था। तब पौड़ी जिले के कल्जीखाल ब्लाक में मैंने हस्ताक्षर कराने के लिए इक्कीस सौ फार्म भिजवाए थे। तब बलूनी गांव के सेवानिवृत्त सूबेदार दयाराम बलूनी ने गढ़वाल सांसद मेजर जनरल खण्डूड़ी से राज्य निर्माण के पक्ष में उत्तराखंड जनमोर्चा के फार्म पर यह कहकर हस्ताक्षर करवाये थे कि नोएडा से उत्तराखंड के उभरते युवा पत्रकार और उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी प्रदीप कुमार वेदवाल ने कहा है कि हर आम और खास से उत्तराखंड राज्य के पक्ष में हस्ताक्षर करवाने हैं।
केंद्रीय मंत्री बनने के बाद भी मंत्री भुवन चंद्र खण्डूड़ी इस बात को अक्सर बातचीत के दौरान सुनाया करते थे। वो बताते थे कि उन्होंने सूबेदार दयाराम बलूनी को समझाया कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में उनकी भाजपा सरकार उत्तरांचल राज्य के निर्माण के लिए विधेयक लाई है। वो स्वयं लोकसभा में उत्तरांचल राज्य के पक्ष में पैरवी कर रहे हैं। तब मंत्री खण्डूडी बताया करते थे कि इस पर सूबेदार बलूनी का एक ही जवाब होता था कि उत्तराखंड जन मोर्चा के इस फार्म पर आपके हस्ताक्षर चाहिए।
2004 के लोकसभा चुनाव में एन.डी.ए. की सरकार सत्ता से बेदखल हो गई और यू.पी.ए. की सरकार सत्ता में आई। उस दौर में भी मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूडी गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे। जब उन्होंने परिवहन भवन से अपना मंत्रालय खाली किया तो उत्तराखंड से संबंधित बहुत सी पुस्तकें मुझे इस उम्मीद के साथ भेंट की कि मैं इन पुस्तकों को मनोयोग से पढ़ूंगा। यह बात अलग है कि जीवन की आपाधापी में अभी भी उन पुस्तकों में से कुछ पुस्तकें पढ़ नहीं सका हूं।
भुवन चंद्र खण्डूड़ी मेरी नज़र में एक ऐसे राजनेता रहे हैं जो दिल और दिमाग से नेक और ईमानदार थे। आज भुवन चंद्र खण्डूड़ी जी के निधन पर उनसे व्यक्तित्व एवं कृतित्व से जुड़ी अनेकों बातें याद आ रही हैं। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।



