सुषमाजुगरान ध्यानी
बीते चार से आठ मई तक दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित दिल्ली इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सात मई को क्षेत्रीय फिल्मों की कैटिगरी में चयनित और पुरस्कृत गढ़वाली फिल्म ‘रैबार’ देखी। किनोस्कोप फिल्म्स के बैनर तले युवा निर्माता निर्देशक शिशिर उनियाल द्वारा लिखित और निर्देशित इस फिल्म को देखने के बाद यह कहने में संकोच नहीं कि गांव में रहने वाले एक युवा पोस्टमैन पुष्कर और उसके पिता के आपसी संबंधों को बहुत ही संजीदगी से उकेरती ‘रैबार’ फिल्म महोत्सव का हिस्सा बनने और पुरस्कृत होने के सर्वथा योग्य थी। सीमित पात्रों के अभिनय से सजी यह फिल्म मूल विषय पर केंद्रित रहते हुए उसी के बीच से उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास और समस्याओं की ओर भी ध्यान केंद्रित करती जाती है। मसलन पंचायतों के नाम पर आबंटित सरकारी फंड के तहत गांवों के बीच की ऊबड़-खाबड़ और पथरीली गलियां मोटा-मोटी ही सही, लेकिन सीमेंटेड होती जा रही हैं और कई रास्तों में स्कूटी भी चलती दिख जाती हैं।
पोस्टमैन पुष्कर की स्कूटी भी उसके घर के बाहर खड़ी रहती है और वह उसी से आता-जाता है। मेन रोड पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर ट्रैकर और बोलेरो जैसी निजी गाड़ियों की आवाजाही भी आम बात है। यानी गांवों में भौतिक विकास की एक स्वत:स्फूर्त धारा बहती दिखाई देती है। बिना किसी अतिरिक्त संवाद या घटनाक्रम के फिल्म के बीच में सोचते-समझते यह सब दिखा देना अच्छा निर्देशकीय कौशल है। यही नहीं, यह भी दिखाया गया है कि जिस डाक व्यवस्था और पोस्टमैन को केंद्र में रखकर यह फिल्म लिखी गई है, वहां भी शहरों की तर्ज पर ही काम हो रहे हैं। शुरुआती सीन में ही पोस्टमैन गांव में डाक बांटने जाता है तो एक महिला को स्पीड पोस्ट से आया उसका एटीएम कार्ड पकड़ाता है जबकि पहले मनीआर्डर और चिट्ठियों का बेसब्री से इंतजार रहता था। इसका अर्थ यही है कि कुछ बदलाव सतत विकास का अनिवार्य हिस्सा होते हैं। उसके लिए किसी अतिरिक्त प्रयास की जरूरत नहीं होती या कि न चाहते हुए भी आपको उसे अपनाना पड़ता है।
बहरहाल, बीते साल अक्टूबर में फिल्म के टीजर और गीत-संगीत रिलीज के दौरान फिल्म के निर्माता निर्देशक द्वारा भरोसा जताया गया था कि फिल्म दर्शकों को हंसाने की गारंटी तो नहीं ले सकती है लेकिन रुलाएगी जरूर और फिल्म देखकर यह भरोसा सच साबित हुआ। फिल्म इतनी संवेदनशील है कि न उसमें हंसने की कोई गुंजाइश है और न ही इसकी जरूरत महसूस होती है। दर्शक तो पिता-पुत्र और मां के ममत्व व ऊहापोह के बीच ही चिंतन मनन करता रह जाता है। फिल्म का दिल छूने वाला सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है कि पिता और पुत्र के बीच जो अव्यक्त संवादहीनता है, वह कहीं न कहीं एक-दूसरे के प्रति वात्सल्य, सम्मान और दायित्वबोध का भी बराबर एहसास कराती चलती है। बीमार पिता का स्वार्थ इतना भर है कि पोस्टमैन की छोटी ही सही पर सरकारी नौकरी के साथ वह गांव में रहकर अपना घर बसा उनकी आंखों के सामने रहे, ताकि आर्थिक रूप से उसका भविष्य तो सुरक्षित रहे ही, बुढ़ापे में उनकी देखभाल भी होती रहे। दूसरी ओर बेटे का आक्रोश इस बात को लेकर है कि शहर में बेहतर नौकरी मिलने के अवसर के बावजूद पिता ने उसे कभी मोटिवेट नहीं किया और वह दायित्वबोध के चलते माता-पिता की देखभाल के नाम पर एक कमतर नौकरी करने को मजबूर है।
बस इसी कुंठा में जीते हुए उसकी विवाह के प्रति भी कोई रुचि नहीं रह जाती है क्योंकि उसका मानना है कि हमारे यहां पारिवारिक संबंधों का यह मकड़जाल तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऐसे ही दोहराया जाता रहा है। इसी के समानांतर कहानी की एक धारा बरसों पहले एक पिता द्वारा अपने बेटे से माफीनामे के रूप में लिखी गई बिना पते वाली एक चिट्ठी के इर्द-गिर्द घूमने लगती है। और फिर यह चिट्ठी या कहें रैबार ही पूरी कहानी के केंद्र में आ जाती है। दरअसल जिस पोस्ट आफिस में पुष्कर पोस्टमैन है, वह दूसरी जगह शिफ्ट हो रहा है। इस बीच डाक्यूमेंट्स की सार संभाल के बीच पुष्कर के हाथ कई साल पहले लिखी गई एक चिट्ठी लगती है जिसमें बाहर चिट्ठी लिखने वाले का नाम तो अंकित था लेकिन वह किसे भेजी जानी थी, उसका पता दर्ज नहीं था। इस कारण वह पोस्ट ही नहीं हो पाई। चिट्ठी को अपने गंतव्य तक पहुंचना ही चाहिए, इस कर्तव्यबोध के साथ पहले पुष्कर भेजने वाले को आस-पास ही ढूंढता है। बगल गांव के एक सज्जन से पता चला कि चिट्ठी लिखने वाले की तो कुछ साल पहले मृत्यु हो गई थी और उसका बेटा पहले ही घर छोड़कर जा चुका था। यही नहीं बेटा न बहन की शादी पर घर आया और न मां के मरने पर। पुष्कर बिना पढ़े हुए उस चिट्ठी को उसके ताला लगे घर में दरवाजे के भीतर सरका आया लेकिन उद्विग्न था कि पिता ने बेटे के लिए न जाने क्या जरूरी रैबार (संदेश) लिखा होगा। दोस्त के कहने पर कि उसे चिट्ठी पढ़ लेनी चाहिए थी, पुष्कर किसी तरह चिठ्ठी को वापस खींच लेता है। लेकिन उसे पढ़कर वह और भी उद्विग्न हो जाता है। कारण, चिट्ठी में पिता बेटे से अपने किये की माफी मांग रहा है।
बस यहीं से वह ठान लेता है कि चाहे कुछ हो जाए लेकिन वह चिट्ठी को उसके बेटे तक पहुंचाकर ही रहेगा और पता करेगा कि आखिर पिता का गुनाह क्या था? पुष्कर के मन में यह भाव भी है कि उसके पिता भी कहीं न कहीं उसके करियर में बाधक रहे हैं लेकिन उन्हें तो इसका कोई मलाल या अपराध बोध नहीं फिर इन बाप बेटे के बीच आखिर क्या मन मुटाव रहा होगा कि वह घर छोड़कर गया तो लौटकर ही नहीं आया। और पिता को भी बिना पते की चिट्ठी लिख माफी मांगनी पड़ी। पोस्टमास्टर पुष्कर की उद्विग्नता समझ पहले तो उसे इसे भूलने के लिए कहता है लेकिन उसके हठ के आगे हार मान देहरादून में रह रही उसकी बहन का फोन नं और पता लाकर देता है। लेकिन बहन है कि अपने भाई के बारे में कुछ भी कहना-सुनना नहीं चाहती। फिर बहन के पति के माध्यम से ही उसे दिल्ली में उसका ठिकाना पता लगता है तो वह वहां पहुंच चिट्ठी बेटे के सुपुर्द कर चैन की सांस लेता है। तब उसे पता चलता है कि कैसे पिता की शराब की लत ने पूरे परिवार की खुशहाली छीन ली थी। लेकिन चिठ्ठी में पिता के पश्चाताप ने बेटे के मन में भरी कटुता क्षण भर में दूर दी और वह फूट-फूट कर रोने लगा।
इसी बिंदु पर वापस लौटकर पुष्कर मन में ठान लेता है कि वह किसी तरह अपने माता-पिता की सहमति से अपना करियर संवारने दिल्ली चला जाएगा अन्यथा वह भी जिस तरह यहां घुट घुटकर जी रहा है तो कहीं ऐसी ही नौबत न आ जाए कि माता-पिता को पता ही न चले कि वह कहां रह रहा है और उनका एक रैबार (संदेश) तक उसके पास न पहुंच सके। माता-पिता भी उसके मन की ऊहापोह को समझते हुए उसे आशीर्वाद के साथ विदा कर देते हैं। यहां तक कि पिता अपनी जमा धनराशि भी उसे देते हैं कि अनजान शहर में पैसों की जरूरत पड़ती है। बस स्टाप पर इस एक दृश्य के साथ फिल्म समाप्त हो जाती है कि शहर में रह रहा एक बेटा अपने परिवार के साथ गांव आ रहा है और गांव का दूसरा बेटा भविष्य संवारने दिल्ली रवाना हो रहा है।
कुल मिलाकर फिल्म अंत तक बांधे रखती है। केन्द्रीय पात्र पुष्कर के अलावा पिता के रूप में जाने-माने अभिनेता और निर्देशक श्रीश डोभाल की उपस्थिति ने फिल्म को अलग गरिमा प्रदान की है। शिशिर जैसे युवा निर्देशक को इस पर गर्व होना चाहिए कि उनकी फिल्म में श्रीश डोभाल जैसे अनुभवी निर्देशक और अभिनेता ने शानदार अभिनय किया है। ऐसे ही गढ़वाली रंगमंच के जाने-माने निर्देशक और अभिनेता हरि सेमवाल की थोड़ी देर की उपस्थिति भी उल्लेखनीय है। मंझी हुई अभिनेत्री सुमन गौड़ की संवाद अदायगी और सहज सरल भाषा तो अलग छाप छोड़ती ही है। कह सकते हैं कि फिल्म में रटे रटाए पात्रों की जगह नये चेहरे दिखे हैं। यह विस्तार जरूरी है। फिल्म का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यही था कि इसमें मां के रूप में सुमन गौड़ के अलावा बाकी गिनती की महिला पात्रों की उपस्थिति एक-एक दृश्य में ही हुई है। कहानी के हिसाब से नायक के साथ नायिका की कोई जरूरत ही नहीं लगी।
हां, पूरी फिल्म में बाहर दीवार पर पीपलकोटी लिखे पोस्ट आफिस के एक कमरे की भीतरी दीवारों पर इस रूप में बार बार ध्यान केंद्रित हो जा रहा था कि उन पर पोस्ट आफिस संदर्भित जानकारी से जुड़े पोस्टरों की जगह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से संबंधित जानकारी वाले पोस्टर लगे थे। इसके दो ही कारण समझ आये- या तो शूटिंग के लिए यह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ही मिल पाया होगा या कि जानते बूझते दिखाया गया है कि गांवों में किराये पर चल रहे एक अदद पोस्ट आफिस जैसे सरकारी दफ्तर कहीं भी कैसे भी चलाये जा सकते हैं।
उत्तराखंड की जिन खूबसूरत वादियों को देखकर आज मैदानी क्षेत्रों के निर्माता निर्देशक भी यहां नजरें गड़ाए बैठे हैं, ‘रैबार’ में उनका अनावश्यक प्रदर्शन कहीं नहीं दिखा। यह इस बात का संकेतक है कि कहानी में दम हो तो लोकेशन भी सेकेंड्री हो जाती है। वैसे भी यह इस रूप में सकारात्मक है कि फिल्मी लोकेशन के लिए प्राकृतिक स्थलों का जरूरत से ज्यादा आकर्षण और दोहन कहीं न कहीं यहां के पर्यावरण के लिहाज से चिंतनीय है।
जो भी हो, रैबार देखकर लगा कि अब बम्बईया मसाला फिल्मों की तर्ज पर एक अदद प्रेम कहानी के साथ पहाड़ की खूबसूरत वादियों के बीच गीत-संगीत प्रधान फिल्मों से हटकर भी सोचा जा रहा है। रैबार को देखकर इस बात की खुशी हुई कि इसके निर्देशक और पटकथाकार शिशिर ने अपनी करीब चार साल की मेहनत के बाद ऐसी फिल्म बनाई जो दिल्ली अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव की क्षेत्रीय फिल्मों की कैटिगरी में पहली ही बार में चयनित और पुरस्कृत हो गई। अच्छी बात यह है कि उत्तराखंड के सिनेमा का भविष्य अब उस पीढ़ी के सुपुर्द होने लगा है जो करियर के हिसाब से फिल्म-संदर्भित पढ़ाई कर उसी में अपना भविष्य संवारने की ख्वाहिशमंद है। शिशिर जैसे निर्देशक इस कड़ी के अगुआ हैं। उन्हें और उनकी टीम को बधाई।
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