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श्रीनगर गढ़वाल: 23 अप्रैल को पेशावर कांड के नायक वीर चन्द्रसिंह गढवाली पर जयभारत सेवा समिति श्रीनगर द्वारा डालमिया धर्मशाला में कवि सम्मेलन और विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी का संचालन विनोद मैठाणी द्वारा सभी कवियों एवं मुख्य आतिथि का परिचय एवं स्वागत किया गया। मुख्य अतिथि श्री खण्डूडी जी द्वारा गढवाली जी के चित्र पर माल्यार्पण किया गया।

वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली (25दिसम्बर, 1891 – 01 अक्टूबर 1979) को भारतीय इतिहास में पेशावर कांड के नायक के रूप में याद किया जाता है। 23 अप्रैल 1930 को हवलदार मेजर चन्द्र सिंह गढवाली के नेतृत्व में रॉयल गढवाल राइफल्स के जवानों ने भारत की आजादी के लिये लड़ने वाले निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से मना कर दिया था। बिना गोली चले, बिना बम फटे पेशावर में इतना बड़ा धमाका हो गया कि एकाएक अंग्रेज भी हक्के-बक्के रह गये, उन्हें अपने पैरों तले जमीन खिसकती हुई सी महसूस होने लगी।

यह घटना अँग्रेजी हुकूमत को स्तब्ध करने वाली थी। इस घटना ने गढ़वाली सैनिकों और खास कर उनके अगुवा चंद्र सिंह गढ़वाली को न केवल आजादी की लड़ाई का बल्कि हिन्दू-मुस्लिम एकता के नायक के तौर पर स्थापित कर दिया था। पेशावर विद्रोह के तत्काल बाद चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों को गिरफ्तार करके एबटाबाद के पास काकुल मिलेट्री छावनी में बंदी बनाकर रखा गया था।

अंग्रेजों ने पेशावर में पठानों पर गोली चलाने के लिए गढ़वाली पलटन का चुनाव, हिन्दू-मुस्लिम विभाजन की खाई को और चौड़ा करने के लिए किया था. चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों ने अपनी नौकरी और प्राणों को संकट में डाल कर सांप्रदायिक सौहार्द की अभूतपूर्व मिसाल कायम कर दी. सांप्रदायिक उन्माद की राजनीति के फलने-फूलने के दौर में कॉमरेड चंद्र सिंह गढ़वाली वो प्रकाश स्तम्भ हैं, जो अपना सब कुछ दांव पर लगा कर भी सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा-जमनी तहजीब को बुलंद करने की राह हमको दिखाते हैं।

पेशावर कांड को याद करते हुए डालमिया धर्मशाला में कवि सम्मेलन आयोजित किया गया. कवि सम्मेलन का मंच संचालन प्रकाश चमोली ने किया. इस वासर पर वयोवृद्ध कवि श्री खण्डूडी- न छोड़ा न छोडा यूँ डाँडी काठ्यों तें….….., श्रीमती गंगा असनोडा थपलियाल, जयकृष्ण पैन्यूली, देवेन्द्र उनियाल, संदीप रावत धन धन छन वो वीर सीपै…….., शम्भू प्रसाद द्वारा कार्तिक स्वामी पर कविता पथ किया गया। विमल बहुगुणा, प्रेमदत्त नौटियाल, कुमारी आस्था द्वारा गढवाली जी का जीवन परिचय, कुमारी अनुकृति ने कविता प्रस्तुत की गई।

वक्ता के रूप में अनिल स्वामी, मदनमोहन नौटियाल, प्रभाकर बाबुलकर,  पी वी डोभाल, राजेन्द्र रतूड़ी, प्रेमदत्त नौटियाल, मानव बिष्ट, बीरेन्द्र रतूडी, दिनेश असवाल, विजेन्द्र नेगी, मुकेश काला तथा महेश गिरि आदि रहे।