नई दिल्ली: दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया स्थित मावलंकर ऑडिटोरियम में रविवार (5 अप्रैल 2026) को उत्तराखंड की दिव्यांग प्रतिभाओं के उत्थान एवं कल्याणार्थ “उत्तराखंड दिव्यांग लोक कला उत्सव – हुनर है तो कदर है” कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम में उत्तराखंड की विलक्ष्ण प्रतिभाओं के धनी दिव्यांग कलाकारों ने अपने जूनून, लगन और हुनर से सभागार में उपस्थित दर्शकों को दिखाया कि अगर “हुनर है तो कदर है”।

उत्तराखंड के दूरदराज गांवों में गुमनामी के अंधेरों में जी रहे विलक्ष्ण प्रतिभा के धनी इन दिव्यांगों की कला को पहचानने का श्रेय उत्तराखंड के मशहूर संगीत निर्देशक एवं महाकौथिग के मुख्य संयोजक राजेंद्र चौहान को जाता है. जिन्होंने न सिर्फ इनके अंदर छुपी कला को पहचाना बल्कि इनकी कला को तराश कर इन्हें इतने बड़े मंच पर अपनी की विलक्षण प्रतिभा दिखाने का अवसर प्रदान भी किया। राजेंद्र चौहान विगत 6-7 वर्षों से हर साल इन दिव्यांग प्रतिभाओं को दिल्ली-एनसीआर में कम से कम एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित करते आ रहे हैं.

इसीक्रम में रविवार को दर्शकों से खचाखच भरे मावलंकर ऑडिटोरियम में मंच संचालिका राखी बिष्ट ने उत्तराखंड से आई करीब 16 दिव्यांग प्रतिभाओं का परिचय कराते हुए बताया कि किस तरह दैवीय कष्ट मिलने के बावजूद भी ये दिव्यांग आज अपने हुनर और हैसलों के दम पर आपके सामने हैं। दिव्यांग प्रतिभाओं में कुटुलमंडी गाँव, गूमखाल, पौड़ी गढ़वाल के निर्मल कुमार अनुरागी, मुकेश कुमार अनुरागी और अंजलि कुमारी, तीनों भाई बहन जन्म से नेत्रहीन हैं। जो गरीबी और गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। इनमे से एक भाई मुकेश और्केष्ट्रा बजाता है जबकि निर्मल और अंजलि दोनों गाने गाते हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत एक खुबसूरत लोकगीत धरती य उत्तराखंड की माटी या मेरा पहाड़ की कतगा रौन्त्याली लगदा… से हुई. जिसे निर्मल कुमार, अंजलि, सुधीर ग्वाड़ि तथा स्वर कोकिला कल्पना चौहान ने गाया. उसके बाद एक कुमाउनी लोक गीत भुर भुरू उज्याव हैगो, बजी मुरूली सुर सुर… की शानदार प्रस्तुति दी .

इसके अलावा एक अन्य कलाकार पौड़ी गढ़वाल के पं. सुधीर ग्वाड़ी थे जिनके दोनों हाथ एक 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन की चपेट में आने से कट गए थे। सुधीर अपना सारा काम पैरों से करते हैं। यहाँ तक कि वह मोबाइल में फेसबुक, व्हाट्सएप और चिट्ठी भी पैर से ही लिखते हैं। सुधीर ग्वाड़ी ने स्वर्गीय चन्द्र सिंह राही का बहुत पुराना लोक गीत ‘जरा ठण्डु चला द्याय, जरा मठू चलादी, मेरी चदरी छुटगि पिछ्नै जरा मठू चलादी’ सुनाया।

वहीँ अल्मोड़ा के एक गाँव से आये पनी राम जो जन्म से नेत्रहीन हैं। उन्होंने भी एक सुन्दर लोक गीत सुनाया।

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहे सुन्दर लाल उर्फ़ कमांडर जिनके दोनों पैर नहीं होने के बावजूद भी वह बहुत शानदार डांस करते हैं। उन्होंने एक मशहूर गीत “गढ़वाल मा बाग लग्युं, बाग कि च डैरा, मेरा फ्वां बाग़ रे..” पर शानदार नृत्य कर दर्शकों को झकजोर दिया। कमांडर नाम का यह शख्स डांस के अलावा कॉमेडी भी अच्छी करते हैं। दोनों पैरों से विकलांग कमांडर ने लव मैरिज की है और उनके 2 बच्चे भी है।

इसके अलावा कार्यक्रम की शान रही उत्तराखंड की स्वर कोकिला कल्पना चौहान, जिनके बारे शायद सभी लोगों को मालूम होगा कि कुछ वर्षो पहले एक सड़क दुर्घटना में वह अपने दोनों पैर खो चुकी थी। परन्तु आज अपनी हिम्मत और हौसले के दम पर वह कृतिम पैरों के सहारे बड़े-बड़े मंचों पर उसी तरह अपनी मधुर आवाज में शानदार प्रस्तुतियां दे रही हैं। इन प्रतिभाओं की हौसला अफजाई के लिए उन्होंने भी अपनी कुछ पुराने सुपरहिट लोकगीत प्रस्तुत किये।

उत्तराखंड दिव्यांग लोक कला उत्सव में पधारे दिव्यांग कलाकारों सुरेन्द्र कमांडर, धन सिंह कोरंगा, पूरन राठौर, रेखा मेहता, विजय बिष्ट, प्रेमा विश्वास, कु. अंजलि, कु. सरोज, प्रवीन नेगी, पं. सुधीर ग्वाड़ी, निर्मला मेहता, रोशन लाल, मुकेश अनुरागी, सतीश मधुर, निर्मल अनुरागी, नीलिमा आदि कलाकारों ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

इन प्रतिभाओं के हुनर और हौसले के देखकर सभागार में उपस्थित उत्तराखंड समाज के लोगों ने महसूस किया कि अगर किसी दिव्यांग जन को सहारा मिले, और उसके हुनर को तराशने वाला मिले वह भी अपनी पहचान बना सकते हैं। संगीत निर्देशक राजेंद्र चौहान और स्वर कोकिला कल्पना चौहान की इस नेक पहल का सभी ने सराहना करते हुए आभार व्यक्त किया।

इस आयोजन में पर्वतीय सांस्कृतिक संस्था, रविशा फाउंडेशन सहित घुघुती फाउंडेशन, स्वथान NGO, महावेला सनराइज और महिला सेवा शक्ति फाउंडेशन का विशेष सहयोग रहा।