सुषमा जुगरान ध्यानी
गढ़वाल मंडल मुख्यालय पौड़ी के शीर्ष में रम्य सुरम्य जंगल के बीच छोटे से कमरेनुमा मंदिर में विराजमान कंडोलिया देवता का स्वरूप आज बेशक सुदूर कुमाऊं के गोल्ज्यू देवता के नाम से प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा हो लेकिन सदियों पूर्व पौड़ी गांव द्वारा स्थापित यह मंदिर मूल रूप से पौड़ी के भूम्याल और ग्राम देवता के रूप में पूजित है। इसके गोलू देवता के नाम रूप वाली कथा एकाध साल से ही प्रचारित हो रही है और पौड़ी गांव में ब्याह कर आई किसी बेटी की विदाई के समय कंडी यानी टोकरी में साथ आ जाने वाली कथा भी कुछेक साल पुरानी ही है।
बहरहाल, निर्जन वन में इकलौते छोटे से कमरेनुमा पवित्र स्थान में, जहां कमर झुकाकर ही प्रवेश कर सकते हैं और दो लोग एक साथ बमुश्किल बैठ सकते हैं, शिवलिंग रूप में पूजित कंडोलिया देवता इस क्षेत्र के रक्षक माने जाते हैं। मंदिर के बगल में छोटे से मुंह वाली एक सुरंग को भी धूप-दीप अर्पित किया जाता है। उसके बारे में बचपन से सुनते आये हैं कि कंडोलिया देवता प्रतिदिन प्रातः चार बजे इस सुरंग के रास्ते श्रीनगर अलकनंदा में स्नान करने जाते हैं और भाग्यशाली लोगों को उनके दर्शन भी हो जाते हैं। कंडोलिया देवता को प्रसाद स्वरूप फल फूल और नैवेद्य के साथ रोट और पान का पत्ता चढ़ता है। मंदिर का प्रबंधन शुरू से ही पौड़ी गांव के हाथ में है लेकिन सामान्य दिनों में यहां कोई पुजारी नहीं बैठता। श्रद्धालु आते हैं और अपनी तरह से पूजा अर्चना कर प्रसाद चढ़ा बाबा को शीश नवाते हैं। एक समय तो मंदिर में ताला भी नहीं लगता था। वहां रखा प्रसाद और दान दक्षिणा गाय बकरियां चराने वाले बच्चे खा लेते थे लेकिन अब खिड़कीनुमा छोटे से जालीदार दरवाजे पर ताला लगा रहता है, जिसे मंदिर की देखभाल करने वाले व्यक्ति द्वारा पूजा हेतु खुलवाने पर खोल दिया जाता है।
समय के साथ कंडोलिया देवता के मंदिर में पिछले कई सालों से पौड़ी गांव और पौड़ी नगर के हर जाति धर्म के लोगों के सौजन्य वार्षिक पूजन के रूप में जून माह के दूसरे सप्ताह विशाल भंडारे का आयोजन हो रहा है जो साल दर साल अद्भुत विस्तार पा रहा है। शुरुआत में एक दिन का भंडारा होता था जो दिन रात की पूजा अर्चना के साथ अब तीन-चार दिन तक चलता है। इस मौके पर हजारों लोग बाबा के दर्शन कर प्रसाद ग्रहण करते हैं। आसपास के गांवों द्वारा अपनी अपनी ध्वजा और छतरियां कंडोलिया देवता को समर्पित की जाती हैं। वह नजारा सच में अद्भुत होता है।
इस बार वार्षिक पूजन और भंडारे के सुअवसर पर नगर पालिका द्वारा ग्रीष्मोत्सव को ‘जय कंडोलिया महोत्सव’ के रूप में और अधिक विस्तार देते हुए नगर भर में खेल-कूद से लेकर साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों को संपन्न कराया गया। सालों बाद इस बार मैंने भी बाबा की कृपा से वार्षिक पूजन के दौरान उनके दर्शन कर भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया। जंगल में मंगल के अनूठे नजारे में पूरे महोत्सव में सबसे सुकूनदेह यही लगा और मन में पूरा श्रद्धा भाव भी उमड़ा कि कंडोलिया देवता अपने उस छोटे से कमरेनुमा मूल स्थान में ही विराजमान हैं और मंदिर के प्रबंधकों द्वारा उससे कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। जबकि वह चाहें तो वहां पर भव्य मंदिर का निर्माण करवा सकते हैं लेकिन देवभूमि उत्तराखंड के प्राण प्रतिष्ठित मंदिरों में इसीलिए परम आस्था का भाव जाग्रत रहता है क्योंकि वह निर्जन स्थानों पर पत्थरों की छोटी-छोटी कूड़ियों (घरों) के भीतर स्थापित हैं।
उल्लेखनीय है कि कंडोलिया देवता के मंदिर का प्रांगण और मंदिर तक पहुंचने का मार्ग बहुत रमणीक और आरामदायक बना दिया गया है। बड़ी संख्या में बैठकर लोग यहां भजन कीर्तन और हवन इत्यादि करते हैं लेकिन देव दर्शन के लिए एक बार में एक या दो लोग ही मंदिर के अंदर झुककर जा पाते हैं। मंदिर के प्रबंधकों से हमारा यही आग्रह रहेगा कि बाहर चाहे कितना ही सौंदर्यीकरण करवा लें लेकिन मंदिर के मूल स्वरूप को उन्होंने अब तक जिस तरह बचाकर रखा है, उसे यथावत रखा जाए। खुशी की बात है कि मंदिर की पुरानी व्यवस्था और मान्यताएं यथावत हैं। इसका एक उदाहरण है मंदिर परिसर के बाहर अर्पित अनगिनत घंटियों के बीच पूर्व दिशा में पेड़ पर लटकाया गया टिन का सबसे पुराना डब्बानुमा गोलाकार घंटा। मान्यता है कि इसे जरूर बजाना चाहिए। पौड़ी के रक्षक भूम्याल कंडोलिया देवता की जय हो।



