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अनिल शाही: पद से नहीं, जनसेवा और विकास से पहचान बनाने की कोशिश

द्वाराहाट। चुनावी मौसम में सक्रिय होने वाली राजनीति से इतर भाजपा नेता एवं उत्तराखंड पलायन आयोग के सदस्य अनिल शाही पिछले दो दशकों से द्वाराहाट विधानसभा क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क और विकास कार्यों के माध्यम से अपनी पहचान बनाने का दावा करते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में मामूली अंतर से हार मिलने के बावजूद उनका कहना है कि उन्होंने जनता के बीच रहकर क्षेत्र की समस्याओं को शासन तक पहुंचाने और विकास कार्यों को गति दिलाने का प्रयास जारी रखा है।

सेना और सेवा की परंपरा वाले परिवार से जुड़ाव

द्वाराहाट ब्लॉक के ग्रामसभा डोटलगांव में जन्मे अनिल शाही ऐसे परिवार से आते हैं, जिसकी पहचान सेना, अनुशासन और सामाजिक सेवा से रही है। उनके दादा, पिता और ताऊ भारतीय सेना में सेवाएं दे चुके हैं, जबकि परिवार के अन्य सदस्य भी विभिन्न सरकारी सेवाओं से जुड़े रहे हैं। शाही का कहना है कि इसी पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उनमें सेवा, अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना विकसित की।

छात्र जीवन में मिला जनसेवा का संकल्प

उनकी प्रारंभिक शिक्षा शिशु मंदिर विद्यालय बग्वाली पोखर में हुई। इसके बाद उन्होंने आगे की शिक्षा रानीखेत, काशीपुर और उच्च शिक्षा अल्मोड़ा में प्राप्त की। छात्र जीवन के दौरान जब भी वे अपने गांव लौटते थे, तब सड़क, पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधाओं की कमी उन्हें परेशान करती थी। यही अनुभव आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन और राजनीति में आने की प्रेरणा बने।

छात्र राजनीति से भाजपा तक का सफर

अल्मोड़ा कॉलेज में छात्रसंघ अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। इसी दौरान उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से परिचय हुआ और बाद में वे भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गए। संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाते हुए उन्होंने स्थानीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उनके अनुसार राजनीति उनके लिए केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और क्षेत्र के लोगों से जुड़े रहने का अवसर है।

हार के बाद भी जनता के बीच सक्रिय रहने का दावा

पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका कहना है कि चुनाव परिणाम के बाद भी उन्होंने क्षेत्र का दौरा जारी रखा। गांव-गांव जाकर लोगों की समस्याएं सुनीं और उन्हें शासन तक पहुंचाने का प्रयास किया। उनका दावा है कि मुख्यमंत्री और शासन स्तर पर लगातार संपर्क के माध्यम से उन्होंने कई विकास योजनाओं की स्वीकृति दिलाने में भूमिका निभाई।

सड़क, पेयजल और संचार पर फोकस

शाही के अनुसार मोबाइल टावर, पेयजल योजनाएं, सड़क निर्माण तथा अन्य आधारभूत सुविधाओं से जुड़े कई प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने लगातार प्रयास किए। अपने पैतृक गांव डोटलगांव तक लगभग 13 करोड़ रुपये की लागत से सड़क निर्माण और डामरीकरण कार्य शुरू होना भी वे अपने प्रयासों का महत्वपूर्ण परिणाम बताते हैं। उनका कहना है कि यह सड़क वर्षों से ग्रामीणों की प्रमुख मांग थी।

पलायन रोकना सबसे बड़ी प्राथमिकता

उत्तराखंड पलायन आयोग के सदस्य के रूप में अनिल शाही का मानना है कि राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकना सबसे बड़ी चुनौती है। उनके अनुसार केवल सड़क बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि गांवों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विकास भी जरूरी है। यदि युवाओं को अपने क्षेत्र में ही अवसर मिलेंगे, तो वे गांव छोड़ने को मजबूर नहीं होंगे।

सरकार और जनप्रतिनिधियों के समन्वय पर जोर

वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर शाही का कहना है कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन विकास के मुद्दों पर राजनीति से ऊपर उठकर कार्य होना चाहिए। उनका दावा है कि पिछले चार वर्षों में उन्होंने मुख्यमंत्री के कई क्षेत्रीय दौरे कराकर स्थानीय समस्याओं को सीधे सरकार के समक्ष रखा। उनका मानना है कि सरकार और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर समन्वय से क्षेत्र में अधिक विकास कार्य किए जा सकते हैं।

विरोध के बीच भी जनसंपर्क पर भरोसा

द्वाराहाट की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर अनिल शाही का कहना है कि क्षेत्र में कई नेता सक्रिय हैं, लेकिन उनके अनुसार किसी भी जनप्रतिनिधि की वास्तविक पहचान चुनाव के समय नहीं, बल्कि चुनाव के बाद जनता के बीच उसकी निरंतर मौजूदगी और समस्याओं के समाधान के प्रयासों से तय होती है। उनका आरोप है कि कुछ राजनीतिक विरोधी उनके बढ़ते जनसंपर्क और मुख्यमंत्री के साथ संवाद को लेकर असहज हैं। हालांकि उनका कहना है कि वे व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में विश्वास नहीं रखते।

संवाद और समाधान की राजनीति

शाही का मानना है कि क्षेत्र में होने वाले धरना-प्रदर्शनों और आंदोलनों को केवल राजनीतिक नजरिये से नहीं, बल्कि उनकी मांगों और जनहित के उद्देश्य से देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार लोकतंत्र में जनसमस्याओं को उठाना आवश्यक है, लेकिन संवाद और समाधान की प्रक्रिया भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। यदि सरकार विकास कार्यों के लिए सहयोग को तैयार है, तो सभी जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों को मिलकर क्षेत्र के हित में कार्य करना चाहिए।

वे दावा करते हैं कि पिछले चार वर्षों में उन्होंने मुख्यमंत्री के कई क्षेत्रीय दौरे कराने में भूमिका निभाई, जिससे स्थानीय समस्याओं को सीधे शासन के सामने रखा जा सका और कई विकास योजनाओं को गति मिली। उनके अनुसार उन्होंने अपने राजनीतिक संपर्कों का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के बजाय क्षेत्रीय विकास के लिए किया है।

राजनीति से ऊपर विकास की बात

अनिल शाही का कहना है कि द्वाराहाट विधानसभा के प्रत्येक गांव और प्रत्येक परिवार की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। उनका मानना है कि राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन इन मतभेदों के कारण विकास कार्य प्रभावित नहीं होने चाहिए। वे क्षेत्रवासियों से विकास के मुद्दों पर एकजुट होकर सहयोग करने की अपील करते हुए कहते हैं कि सरकार और जनता के संयुक्त प्रयासों से ही क्षेत्र का समग्र विकास संभव है।

काम के आधार पर होगी पहचान

छात्र राजनीति से लेकर संगठन, चुनावी संघर्ष और जनसेवा तक का अनिल शाही का सफर कई उतार-चढ़ाव से गुजरा है। विधानसभा चुनाव में मिली हार को वे अपने राजनीतिक अनुभव का हिस्सा मानते हैं और कहते हैं कि जनसेवा का उनका प्रयास निरंतर जारी रहेगा।

हालांकि उनकी राजनीतिक भूमिका और दावों का वास्तविक मूल्यांकन अंततः उनके कार्यों, विकास योजनाओं की प्रगति और क्षेत्र की जनता को मिलने वाले लाभ के आधार पर ही होगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनके प्रयास पलायन रोकने, स्थानीय रोजगार बढ़ाने और द्वाराहाट के समग्र विकास में कितने प्रभावी साबित होते हैं।

प्रभाकर सिंह