देहरादून: उत्तराखण्ड की सुप्रसिद्ध लोकगायिका हेमा नेगी करासी का चयन वर्ष 2024 के प्रतिष्ठित “संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार” के लिए किया गया है। उन्हें यह सम्मान देवभूमि उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति, लोकगीतों और पारंपरिक वेशभूषा के संरक्षण एवं संवर्धन में उनके अतुलनीय योगदान के लिए प्रदान किया जाएगा। पुरस्कार की औपचारिक घोषणा संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष द्वारा की जाएगी तथा सम्मान समारोह भारत के महामहिम राष्ट्रपति की गरिमामयी उपस्थिति में आयोजित होगा।
यह उपलब्धि सम्पूर्ण उत्तराखण्ड और लोक संस्कृति प्रेमियों के लिए गर्व का विषय है। इससे पूर्व भी हेमा नेगी करासी को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है, जिनमें उत्तराखण्ड सरकार द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित “तीलू रौतेली पुरस्कार” विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
लोक संस्कृति की सशक्त आवाज
हेमा नेगी करासी अपनी पारंपरिक जागर शैली, मांगल गीतों और पहाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को देश-विदेश तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। अब तक वह 50 से अधिक एलबमों और 100 से अधिक गीतों को अपनी मधुर आवाज दे चुकी हैं।
संघर्षों के बीच शुरू हुआ सफर
हेमा नेगी करासी का जन्म 5 अप्रैल 1984 को रुद्रप्रयाग जनपद के तल्लानागपुर क्षेत्र स्थित चोपता के समीप टुकिंडा गांव में हुआ था। जब वह मात्र चार वर्ष की थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद उनकी माता बची देवी ने कठिन परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया। बचपन से ही उन्हें संगीत, मांगल, जागर और लोक परंपराओं से विशेष लगाव था।
ऐसे मिली गायन जगत में पहचान
वर्ष 2003 में जीआईसी कांडई के वार्षिकोत्सव में उन्होंने ‘धरती हमरा गढ़वाल की’ गीत प्रस्तुत किया, जिसकी दूरदर्शन और आकाशवाणी से जुड़े उपस्थित अधिकारियों एवं कलाकारों ने सराहना की। इंटरमीडिएट की शिक्षा पूरी करने के बाद वह अपनी बड़ी बहन के साथ कोटद्वार चली गईं। यहां स्नातक की पढ़ाई के साथ उन्होंने संगीत शिक्षक गिरीश शर्मा के मार्गदर्शन में संगीत की विधिवत शिक्षा प्राप्त की।
उनके गायन करियर की वास्तविक शुरुआत कार्तिक स्वामी मंदिर के जन्म गीत से हुई, जिसमें उन्हें पहली बार बड़ा अवसर मिला। अपनी विशिष्ट जागर शैली के माध्यम से उन्होंने लोक कथाओं और धार्मिक परंपराओं को नई पहचान दिलाई।
लोकप्रिय एलबमों से बनाई अलग पहचान
वर्ष 2005 में उनकी पहली गढ़वाली ऑडियो एलबम “क्या बुन तब” रिलीज हुई। इसी वर्ष लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के साथ उनकी एलबम **’कथा कार्तिक स्वामी’** भी आई, जिसे श्रोताओं ने खूब पसंद किया। इसके अलावा ‘मखमली घाघरी’, ‘मेरी बामणी’, ‘सोबनू’, ‘आछरी जागर’, ‘नरसिंह जागर’ और ‘सेम नागराजा जागर जैसे गीत एवं एलबम भी अत्यंत लोकप्रिय रहे। वर्ष 2008 में उनका विवाह चोपता क्षेत्र के मलाओ गांव निवासी अनिल करासी के साथ हुआ। उनके पति ने भी गायन के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए उन्हें निरंतर प्रोत्साहित किया।
सम्मान और उपलब्धियां
लोक संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में उत्कृष्ट योगदान के लिए हेमा नेगी करासी को देश-विदेश में कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। प्रमुख सम्मान इस प्रकार हैं—
- वर्ष 2013 में अमर उजाला लोकगायिका सम्मान
- वर्ष 2015 में उत्तराखण्ड सरकार का सर्वश्रेष्ठ लोकगायिका सम्मान
- वर्ष 2016 में यूथ आइकन नेशनल सम्मान
- वर्ष 2025 में प्रतिष्ठित तीलू रौतेली पुरस्कार
- वर्ष 2024 के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार के लिए चयनित
लोक संस्कृति के जानकारों का मानना है कि हेमा नेगी करासी का यह सम्मान उत्तराखण्ड की समृद्ध लोक परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण साबित होगा। नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए उनका समर्पण और योगदान प्रेरणास्रोत है।



