Uniform Civil Code: उत्तराखण्ड में राजनीति से जुड़े तमाम मिथक तोड़कर पुष्कर सिंह धामी लगातार दूसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं। बतौर मुख्यमंत्री उनकी ओर से की जा रही एक पहल पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। ये पहल है ‘उत्तराखण्ड में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करना’। उनकी कोशिश अगर कामयाब होती है तो निश्चित रूप से पूरे देश के लिए ये मील का पत्थर साबित होगी।
उत्तराखंड सचिवालय में धामी सरकार 2.0 की पहली बैठक जारी है। बैठक में कई अहम प्रस्तावों पर मुहर लग सकती है। सूत्रों के मुताबिक बैठक में यूनिफॉर्म सिविल कोड (Uniform Civil Code) का प्रस्ताव लाया जा सकता है। बैठक में इसे लेकर हाईपावर कमेटी बनाए जाने की कवायद भी की जा सकती है।
बता दें कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से ठीक 2 दिन पहले कहा था कि सरकार बनते ही राज्य में जल्द से जल्द समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। उन्होंने कहा था कि उत्तराखंड सरकार अपने शपथ ग्रहण के तुरंत बाद, न्यायविदों, सेवानिवृत्त लोगों, समाज के प्रबुद्ध जनों और अन्य गणमान्य लोगों की एक कमेटी गठित करेगी, जो उत्तराखंड राज्य के लिए समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार करेगी।
क्या है समान नागरिक संहिता
यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता का मतलब है कि देश (भारत) में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून हो। चाहे व्यक्ति किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक, गोद लेने और संपति (जमीन जायदाद) के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक कानून लागू होगा।
इधर, भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा किया था। इसी क्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, कुछ लोगों का कहना है कि उत्तराखण्ड हो या कोई भी राज्य, वहां की सरकार ‘समान नागरिक संहिता’ को लागू करने की अधिकारी नहीं है, यह अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार को (संविधान की धारा 44 और 12 के तहत) है। ऐसे में समान नागरिक संहिता को संसद के जरिए ही लागू किया जा सकता है। लेकिन, कुछ लोग इस मामले में गोवा का उदाहरण देते हैं।
गोवा देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां समान नागरिक संहिता लागू है। लेकिन इस राज्य को अपवाद माना गया है। इसलिए अपवाद माना गया है क्योंकि गोवा में 1961 से पुर्तगाल सिविल कोड लागू है इसलिए वहां ये व्यवस्था मान्य है। फिर भी इस मसले में राज्यों के अधिकार को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। अब मुख्यमंत्री धामी का समान नागरिक संहिता को लेकर आगे का स्टैंड काफी अहम होगा। चूंकि केंद्र में भी भाजपा की ही सरकार है और वो चुनावी घोषणा पत्र में समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा भी कर चुकी है, इसलिए उम्मीद तो बनती है। धामी अगर इसमें सफल हो गए तो राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी विशिष्ट छवि बन जायेगी और जनहित का कानून भी लागू हो जायेगा।