श्रीनगर गढ़वाल: भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम एवं समृद्धतम संस्कृतियों में अग्रणी रही है, जहाँ प्रत्येक पर्व अपने भीतर आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक संदेश समेटे होता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली का पर्व भी इसी परंपरा का प्रतीक है। यह उत्सव केवल रंगों और उल्लास तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, शुचिता और सामाजिक समरसता का महापर्व है।
अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक
होली का प्रारंभ ‘होलिका दहन’ से होता है, जो सत्य की असत्य पर विजय का संदेश देता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति ने उसे अग्नि से सुरक्षित रखा, जबकि अहंकार और अधर्म का प्रतीक होलिका दहन हो गया। यह प्रसंग समाज को यह प्रेरणा देता है कि जब-जब अन्याय और अहंकार बढ़ता है, तब सत्य और आस्था की शक्ति उसकी पराजय सुनिश्चित करती है। वर्तमान संदर्भ में होलिका दहन हमारे भीतर की ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध और कुरीतियों को त्यागने का प्रतीक बन सकता है।
रंगों में एकता और सद्भाव
होली के रंग विविधता में एकता का संदेश देते हैं। जब अबीर-गुलाल चेहरे पर लगते हैं, तो जाति, वर्ग और पद-प्रतिष्ठा के भेद स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यही वह अवसर है जब ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना साकार होती है।
देवभूमि उत्तराखंड में होली का स्वरूप विशेष रूप से सांस्कृतिक गरिमा से जुड़ा हुआ है। श्रीनगर गढ़वाल सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में ‘बैठकी होली’ और ‘खड़ी होली’ के माध्यम से शास्त्रीय संगीत और लोक परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जो इस पर्व को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करता है।
प्राकृतिक और मर्यादित उत्सव की आवश्यकता
आधुनिक समय में होली के स्वरूप में कुछ विकृतियाँ भी देखने को मिल रही हैं। रासायनिक रंगों और नशे के बढ़ते प्रचलन ने इस पर्व की गरिमा को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक रंगों, पुष्पों और पारंपरिक तरीकों से होली मनाना न केवल स्वास्थ्य के लिए हितकर है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
साथ ही, देवभूमि की सांस्कृतिक मर्यादा को ध्यान में रखते हुए इस पर्व को मादक द्रव्यों से दूर रहकर, शालीनता और सौहार्द के साथ मनाने की आवश्यकता है।
सामाजिक समरसता का अवसर
होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि हृदयों के मिलन का पर्व है। यह अवसर है पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाने का। समाज में नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और नैतिक मूल्यों के प्रसार का संकल्प लेकर ही इस पर्व की सार्थकता सिद्ध हो सकती है।
अतः इस होली पर सभी नागरिकों से अपील है कि वे आपसी प्रेम, सद्भाव और सांस्कृतिक गरिमा के साथ इस महापर्व को मनाएं तथा समाज को सकारात्मक दिशा देने में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें।
लेखक: डॉ. अखिलेश चन्द्र चमोला, देवभूमि उत्तराखंड, श्रीनगर गढ़वाल



