Home दिल्ली-एनसीआर शब्दों में हिमालय: बल्लभ डोभाल का साहित्यिक संसार और हिमालयी संवेदना

शब्दों में हिमालय: बल्लभ डोभाल का साहित्यिक संसार और हिमालयी संवेदना

हिमालय की आत्मा, लोकजीवन और पहाड़ की पीड़ा को शब्द देने वाले साहित्यकार थे बल्लभ डोभाल : प्रोफेसर वेदवाल

नोएडा। बुरांस साहित्य एवं कला केंद्र द्वारा हिन्दी के साहित्यकार बल्लभ डोभाल की तेरहवीं के संस्कार के बाद हिमालय दिवस पर “शब्दों में हिमालय: बल्लभ डोभाल का साहित्यिक संसार और हिमालयी संवेदना” विषय पर एक भावपूर्ण विचार गोष्ठी के माध्यम से बल्लभ डोभाल को साहित्यिक श्रद्धांजलि दी गई। सेक्टर 12 स्थित सामुदायिक केंद्र में आयोजित गोष्ठी में साहित्य, पत्रकारिता और संस्कृति जगत से जुड़े अनेक साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों ने बल्लभ डोभाल के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करते हुए उनके साहित्य में निहित हिमालयी चेतना पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।

गोष्ठी का शुभारंभ योगेन्द्र कुमार, पूर्व अपर आयुक्त (विधि), वाणिज्यिक कर, उत्तर प्रदेश के संबोधन से हुआ। योगेन्द्र कुमार ने बल्लभ डोभाल के साहित्यिक योगदान का सिलसिलेवार उल्लेख करते हुए उनके साहित्य को अनुकरणीय बताया।

गोष्ठी के संयोजक बुरांस साहित्य एवं कला केंद्र के अध्यक्ष, वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार प्रोफेसर प्रदीप कुमार वेदवाल ने कहा कि बल्लभ डोभाल का साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि हिमालय के जीवन, उसकी संस्कृति, संघर्ष, स्मृतियों और संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि डोभाल ने अपने लेखन के माध्यम से पहाड़ की पीड़ा, पलायन, लोकजीवन, प्रकृति और बदलते सामाजिक परिवेश को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्ति दी।

प्रोफेसर वेदवाल ने कहा कि बल्लभ डोभाल हिमालय की आत्मा, लोकजीवन और पहाड़ की पीड़ा को शब्द देने वाले साहित्यकार थे।

वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार सुषमा जुगरान ध्यानी ने कहा कि बल्लभ डोभाल का व्यक्तित्व जितना सहज और आत्मीय था, उनका साहित्य उतना ही गहन और जीवन-सापेक्ष था। उन्होंने कहा कि डोभाल जी ने हिमालय और पहाड़ को केवल भौगोलिक परिदृश्य के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे मनुष्य की संवेदना और सांस्कृतिक चेतना के रूप में अपने साहित्य में प्रतिष्ठित किया।

प्रसिद्ध कथाकार पंकज बिष्ट ने बल्लभ डोभाल के साहित्यिक योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि उनका लेखन अपने समय और समाज से गहरे संवाद करता है।

पंकज बिष्ट ने अपने लेखन के शुरुआती दिनों का उल्लेख करते हुए कहा कि बल्लभ डोभाल ने उनकी पहली साहित्यक पुस्तक के प्रकाशन में अहम भूमिका का निर्वाह किया।

कथाकार महेश दर्पण ने कहा कि बल्लभ डोभाल उन रचनाकारों में थे जिन्होंने अपने परिवेश को पूरी ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ शब्दों में उतारा। महेश दर्पण ने कहा कि हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला और अन्य जगहों में प्रवास कर बल्लभ डोभाल ने अनुपम साहित्य का सृजन किया है।

वरिष्ठ साहित्यकार राजा खुगशाल ने कहा कि बल्लभ डोभाल के साथ सतर के दशक में जो उनके संबंध बने थे वो ताउम्र बने रहे।

साहित्यकार डॉ. हरिसुमन बिष्ट ने बल्लभ डोभाल के साथ नोएडा में रहकर बहुत कुछ सीखने और समझने की बात कही।

राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के डायरेक्टर और भाजपा नेता बीरेन्द्र जुयाल ने युवा पीढ़ी से बल्लभ डोभाल के साहित्य को पढ़ने का आह्वान किया।

डॉ. हेमा उनियाल ने साहित्यकार बल्लभ डोभाल से जुड़े आत्मीय संस्मरण साझा करते हुए कहा कि वे केवल एक बड़े साहित्यकार ही नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील, आत्मीय और नई पीढ़ी के रचनाकारों को प्रोत्साहित करने वाले व्यक्तित्व थे।

लेखक मंगतराम धस्माना ने कहा कि किसी साहित्यकार का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं होता, बल्कि उसके साथ अनुभवों, स्मृतियों और एक पूरे रचनात्मक संसार का एक अध्याय समाप्त होता है।

वहीं शशि भूषण खंण्डूड़ी ने कहा कि बल्लभ डोभाल भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएं उन्हें सदैव जीवित रखेंगी।

चंद्र बल्लभ थपलियाल ने बल्लभ डोभाल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर सारगर्भित संबोधन में कहा कि बल्लभ डोभाल अपने क्रांतिकारी लेखन के लिए हमेशा याद रहेंगे।

इस अवसर पर बल्लभ डोभाल की पुत्री प्रभा थपलियाल ने अपने पिता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनके पिता का साहित्य उनके लिए सबसे बड़ी विरासत है। उन्होंने संकल्प व्यक्त किया कि वे बल्लभ डोभाल की साहित्यिक धरोहर को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास करेंगी।

पत्रकार राजेश डंडरियाल ने बल्लभ डोभाल के साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए समाजिक संस्थाओं से समर्पित भाव से काम करने की बात कही।

श्रद्धांजलि सभा में बल्लभ डोभाल के दोनों पुत्र प्रकाश डोभाल, कैलाश डोभाल, अरुण डोभाल, नातिन शिवानी, अंचल सहित ज्योत्सना बिष्ट, वरिष्ठ पत्रकार नवोदित, वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा, कात्यायनी फांउडेशन से कुसुम असवाल, आभा गांधी, निधि कुमार, हेमलता मैठाणी, वीरेंद्र भसीन, सौम्या डोभाल, गोपाल सिंह असवाल, वरिष्ठ समाजसेवी विनोद कबटियाल, हरीश असवाल, रमेश ध्यानी, विनोद काला, किशोर कुमार कौशल, वीणा मैठाणी, प्रकाश थपलियाल, वीरेंद्र मैठाणी, विनोद कुमार पोखरियाल, सूर्यकांत डोभाल, महेंद्र मैठाणी, लक्ष्मी नागपाल, हेमंत कौशिक, शैलेंद्र मैठाणी, दीपक डंडरियाल, प्रदीप डोभाल, अजय डोभाल, हरिश्चंद्र डोभाल, मुकेश कौशिक, डाक्टर जगदीश यादव और प्रदीप चौधरी सहित साहित्य, संस्कृति से जुड़े लोग मौजूद थे।