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गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं के संरक्षण के लिए सरकार करेगी काम: भाषा मंत्री खजानदास

लोक-भाषा साहित्य मंच ने सौंपा ज्ञापन, आठवीं अनुसूची में शामिल करने और भाषा अकादमी गठन की उठाई मांग

देहरादून: उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर राज्य सरकार सकारात्मक पहल करेगी। यह आश्वासन उत्तराखण्ड के भाषा मंत्री खजानदास ने उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के दौरान दिया।

18 सितंबर को देहरादून स्थित रेसकोर्स आवास पर मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी एवं युवा कवि एवं भाषाविद अशीष सुंदरियाल ने भाषा मंत्री को ज्ञापन सौंपकर गढ़वाली और कुमाऊनी भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन तथा संवैधानिक मान्यता से संबंधित विभिन्न मांगें रखीं।

ज्ञापन में कहा गया कि गढ़वाली और कुमाऊनी भाषाएं सदियों पुरानी समृद्ध भाषाएं हैं, जिनमें साहित्य की सभी विधाओं में निरंतर सृजन हो रहा है। इतिहास में ये भाषाएं राजकाज की भाषा भी रही हैं, लेकिन उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद भी इन्हें अपेक्षित सरकारी संरक्षण नहीं मिल सका है।

मंच ने सरकार से मांग की कि गढ़वाली और कुमाऊनी भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए उत्तराखण्ड विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाए। साथ ही प्रदेश में हिंदी, पंजाबी, उर्दू और संस्कृत की तर्ज पर गढ़वाली एवं कुमाऊनी भाषा अकादमी का गठन किया जाए। प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-345 के अनुरूप इन भाषाओं को राज्य स्तर पर मान्यता देने तथा विद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की भी मांग की।

प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली लंबे समय से गढ़वाली और कुमाऊनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए अभियान चला रहा है। मंच दिल्ली-एनसीआर और उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में लोकभाषाओं के शिक्षण एवं प्रचार-प्रसार के लिए नियमित भाषा कक्षाओं का भी आयोजन करता है।

भाषा मंत्री खजानदास ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त करते हुए कहा कि सरकार लोकभाषाओं के संरक्षण और विकास के प्रति गंभीर है। उन्होंने कहा कि गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी जैसी समृद्ध लोकभाषाओं के संवर्धन के लिए सरकार सकारात्मक रूप से कार्य करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि गढ़वाली एवं कुमाऊनी भाषा अकादमी के गठन पर सरकार शीघ्र निर्णय लेगी।

इस अवसर पर अशीष सुंदरियाल ने मंत्री को वार्षिक पत्रिका ‘चिट्ठी-पत्री’ भेंट की, जबकि दिनेश ध्यानी ने अपना हाल ही में प्रकाशित गढ़वाली कथा-संग्रह ‘बगत’ उन्हें भेंट किया। पुस्तकों का अवलोकन करते हुए भाषा मंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं में अपार संभावनाएं हैं और साहित्यकारों के निरंतर प्रयासों से इन भाषाओं का उत्कृष्ट साहित्य सामने आ रहा है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि भविष्य में राज्य सरकार लोकभाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए और अधिक प्रभावी कदम उठाएगी। समारोह के अंत में भारतीय ज्ञान, विज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए कार्यरत विभूतियों के योगदान को रेखांकित करते हुए संस्था ने भविष्य में भी इस प्रकार के सम्मान कार्यक्रम निरंतर आयोजित करने का संकल्प व्यक्त किया।