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2 अक्टूबर विशेष: वर्तमान संदर्भ में गांधी दर्शन और शास्त्री जी के आदर्शों की बढ़ती प्रासंगिकता

सत्य, अहिंसा, सादगी और कर्तव्यनिष्ठा के मार्ग पर चलने का आह्वान

श्रीनगर गढ़वाल: 2 अक्टूबर भारतीय इतिहास का एक ऐसा गौरवशाली दिन है, जब देश ने दो महान विभूतियों को जन्म लेते देखा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जीवन आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वर्तमान समय में जब दुनिया तेजी से बदलते भौतिकवादी दौर, नैतिक संकट, पर्यावरण असंतुलन, सामाजिक तनाव और वैश्विक अशांति जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब गांधी जी और शास्त्री जी के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक नजर आते हैं।

हिमालय की शांत वादियों और ऋषि-परंपरा की भूमि उत्तराखंड के संदर्भ में देखें तो इन दोनों महापुरुषों के आदर्श केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।

सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाता गांधी दर्शन

महात्मा गांधी का दर्शन केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं था, बल्कि वह मानव जीवन के नैतिक उत्थान का संदेश था। सत्य, अहिंसा और सर्वोदय उनके विचारों के मूल आधार थे।

आज जब विश्व के कई हिस्से संघर्ष और तनाव से गुजर रहे हैं, तब गांधी जी का अहिंसा और संवाद का सिद्धांत शांति स्थापना का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। गांधी जी के लिए अहिंसा कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल और नैतिक शक्ति का प्रतीक थी।

गांधी जी की ट्रस्टीशिप की अवधारणा और प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण आज पर्यावरण संरक्षण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड जैसे पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील राज्य में अनियंत्रित विकास, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बीच गांधी जी का ग्राम स्वराज और सतत विकास का विचार नई दिशा प्रदान करता है।

स्वच्छता, आत्मनिर्भरता और स्थानीय संसाधनों के उपयोग पर गांधी जी का जोर आज भी प्रासंगिक है। स्वच्छ भारत अभियान और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की पहल गांधीवादी सोच का आधुनिक रूप मानी जा सकती है।

शास्त्री जी का जीवन: सादगी और कर्तव्य का आदर्श

भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जीवन सादगी, ईमानदारी और दृढ़ संकल्प का उदाहरण रहा है। उन्होंने अपने आचरण से साबित किया कि सत्ता का वास्तविक उद्देश्य सेवा और जनकल्याण है।

वर्ष 1965 के युद्ध और खाद्यान्न संकट के समय दिया गया उनका अमर नारा “जय जवान, जय किसान” आज भी देश की आत्मनिर्भरता और सुरक्षा का मूल मंत्र है। देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिक और अन्नदाता किसान आज भी राष्ट्र की मजबूती के आधार स्तंभ हैं।

शास्त्री जी की राजनीतिक शुचिता भी आज के दौर में एक मिसाल है। रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री पद से इस्तीफा देना उनके उच्च आदर्शों और जवाबदेही की भावना को दर्शाता है। सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और नैतिकता के लिए उनका व्यक्तित्व सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।

गांधी और शास्त्री के विचारों से सीखने की जरूरत

महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का जीवन एक-दूसरे का पूरक दिखाई देता है। गांधी जी ने जहां सत्य, अहिंसा और नैतिक मूल्यों का मार्ग दिखाया, वहीं शास्त्री जी ने उन सिद्धांतों को प्रशासन और व्यवहार में उतारकर दिखाया।

दोनों नेताओं का जीवन इस बात का प्रमाण है कि विचारों की सार्थकता तभी है, जब उन्हें आचरण में उतारा जाए।

डा. अखिलेश चन्द्र चमोला, श्रीनगर गढ़वाल (देवभूमि उत्तराखंड)