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कुछ लोग केवल उपचार नहीं करते, बल्कि जीवन भी लौटा देते हैं: राजेश पंत

देहरादून: विश्व प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात की पवित्र यात्रा केवल पहाड़ों की कठिन पगडंडियों पर चलने वाली एक धार्मिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह हिमालय की आस्था, संस्कृति, लोकविश्वास और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी उत्तराखंड की महान सांस्कृतिक परंपरा है। इसी पावन यात्रा में शामिल होने का सौभाग्य मुझे भी मिला। लेकिन चमोली की दुर्गम पहाड़ियों में अचानक मेरी तबीयत इतनी गंभीर रूप से बिगड़ गई कि एक क्षण को जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी बेहद छोटी दिखाई देने लगी।

उस कठिन समय में चमोली के अनजान लोगों ने जिस आत्मीयता और अपनत्व के साथ मेरी सहायता की, उसे शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए संभव नहीं है। जिनसे मेरा कोई परिचय नहीं था, वे मेरे अपने बनकर खड़े हो गए। किसी ने संभाला, किसी ने रास्ता दिखाया, किसी ने अस्पताल पहुँचाने की चिंता की और किसी ने मेरे परिजनों  को सूचना देने में सहयोग किया।

गढ़वाल की यही तो पहचान है—भोलेपन में बसी मनुष्यता और अतिथि को अपना मान लेने वाली मेहमाननवाजी।

यदि उन लोगों ने समय पर मेरी सुध न ली होती और मुझे शीघ्र चिकित्सा सहायता न मिली होती, तो शायद आज मैं यह शब्द लिखने के लिए जीवित न होता।

मुझे तत्काल हिमालयन अस्पताल, जौलीग्रांट, देहरादून पहुँचाया गया। अस्पताल के चिकित्सकों और पूरे चिकित्सा दल ने जिस तत्परता, संवेदनशीलता और कुशलता के साथ मेरा उपचार किया, वह मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं है। मुझे उचित और गुणवत्तापूर्ण उपचार मिला और वह भी अत्यंत वाजिब खर्च में।

मैं अस्पताल के चिकित्सकों एवं समस्त चिकित्सा-कर्मियों के प्रति हृदय की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूँ।

विशेष रूप से अस्पताल के जनसंपर्क अधिकारी सत्यपाल जी का मैं आत्मीय धन्यवाद करता हूँ। बीमारी और असहायता के उस समय में उन्होंने जिस संवेदनशीलता और मानवीयता का परिचय दिया, वह मेरे लिए सदैव स्मरणीय रहेगी। अस्पताल में केवल दवाइयां और चिकित्सा ही नहीं मिलीं, बल्कि यह विश्वास भी मिला कि अभी जीवन बाकी है।

आज जब मैं पीछे मुड़कर उस घटना को देखता हूँ तो लगता है कि नंदा देवी की राजजात ने मुझे केवल हिमालय के दर्शन ही नहीं कराए, बल्कि हिमालय के भीतर बसे मनुष्य के हृदय के भी दर्शन करा दिए।

नंदा देवी को विदा करने और उनके मायके से ससुराल की ओर प्रस्थान की इस महान लोकयात्रा में मैं स्वयं भी जीवन की एक कठिन यात्रा से होकर लौटा हूँ। वहां के लोगों ने जिस तरह मुझे संभाला, वह मेरे लिए मां नंदा की कृपा से कम नहीं था।

मेरे लिए वे सभी अनजान लोग अब अनजान नहीं रहे। वे मेरे जीवन के वे रक्षक हैं, जिनका ऋण मैं शायद जीवन भर नहीं चुका पाऊंगा।

गढ़वाल की धरती को मेरा नमन। उसकी सरल, भोली और अतिथि-सत्कार करने वाली जनता को मेरा प्रणाम। नंदा देवी की उस पावन परंपरा को मेरा नमन, जिसने मुझे हिमालय की संस्कृति के साथ-साथ हिमालय की मानवता से भी परिचित कराया।

और उन सभी चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों तथा विशेष रूप से डाक्टर अनुराग रावत और जनसंपर्क अधिकारी  सत्यपाल जी को हृदय से धन्यवाद, जिन्होंने कठिन समय में मेरा हाथ थामा और मुझे फिर जीवन की ओर लौटाया।

कभी-कभी जीवन हमें दूसरी बार मिलता है। ऐसे जीवन के हर श्वास में उन हाथों की स्मृति रहती है, जिन्होंने मृत्यु के अंधेरे से निकालकर हमें फिर उजाले में ला खड़ा किया।

मैं उन सभी के प्रति नतमस्तक हूँ।

राजेश पंत