72nd National Film Awards: गढ़वाली सिनेमा के लिए शनिवार का दिन ऐतिहासिक बन गया। 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में पहली बार किसी गढ़वाली फिल्म को राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ है। गढ़वाली फिल्म ‘ढोली’ को अन्य भाषाओं की फीचर फिल्म श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ गढ़वाली फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। फिल्म के निर्माता सुनील नायक और निर्देशक दिनेश पी. भोंसले को रजत कमल के साथ 2 लाख रुपये की नकद पुरस्कार राशि से सम्मानित किया जाएगा। इस उपलब्धि के साथ उत्तराखंड का क्षेत्रीय सिनेमा राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान बनाने में सफल हुआ है।
मुख्यमंत्री धामी ने दी पूरी टीम को बधाई
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने फिल्म ‘ढोली’ के निर्माता एससी फार्माकेम प्राइवेट लिमिटेड, निर्देशक दिनेश पी. भोंसले तथा पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपराओं और लोक कलाओं को देश-दुनिया तक पहुंचाने में क्षेत्रीय सिनेमा की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उत्तराखंड के कलाकारों और फिल्म उद्योग के लिए प्रेरणास्रोत बनेगा।
लोक कलाकारों के संघर्ष और सम्मान की संवेदनशील कहानी
करीब 85 मिनट की फिल्म ‘ढोली’ गढ़वाल के पारंपरिक ढोल वादक (ढोली) और उसके परिवार के संघर्ष पर आधारित है। फिल्म समाज के उस विरोधाभास को उजागर करती है, जहां धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में ढोल की धुन को सम्मान मिलता है, लेकिन उसे बजाने वाले कलाकार को बराबरी का सम्मान नहीं दिया जाता।
फिल्म केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उन हजारों लोक कलाकारों की पीड़ा और संघर्ष को सामने लाती है, जो अपनी कला से समाज की परंपराओं को जीवित रखते हैं, लेकिन स्वयं उपेक्षा का सामना करते हैं।
संघर्ष से सफलता तक बेटे की प्रेरक यात्रा
फिल्म में ढोली का बेटा बचपन से अपने पिता का अपमान और संघर्ष देखता है। वह संकल्प लेता है कि अपनी कला को गांव की सीमाओं से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाएगा। वर्षों की मेहनत के बाद वह अपनी प्रतिभा से देश-विदेश में पहचान बनाता है। जब वह सफलता के बाद गांव लौटता है तो वही समाज, जिसने कभी उसके पिता को सम्मान नहीं दिया था, आज उसके सम्मान में खड़ा नजर आता है। फिल्म का मूल संदेश है कि कला और कलाकार—दोनों का समान सम्मान होना चाहिए।
गढ़वाल की संस्कृति और परंपराओं का जीवंत चित्रण
फिल्म में गढ़वाल की लोक संस्कृति, पारंपरिक वाद्ययंत्र, रीति-रिवाज, स्थानीय बोली, पहनावा और ग्रामीण जीवन को बेहद स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि पूरी कहानी का अभिन्न हिस्सा बनकर उभरती है।
उत्तरकाशी की असीगंगा घाटी बनी फिल्म की आत्मा
फिल्म की शूटिंग सितंबर 2023 में उत्तरकाशी जिले की असीगंगा घाटी स्थित नाल्ड गांव और आसपास के क्षेत्रों में की गई थी। वास्तविक लोकेशनों पर फिल्मांकन से गढ़वाल की संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य को प्रामाणिक रूप में पर्दे पर उतारा गया। शूटिंग के दौरान स्थानीय लोगों ने भी भरपूर सहयोग किया।
राष्ट्रीय पुरस्कार से पहले भी बटोर चुकी थी सराहना
राष्ट्रीय सम्मान मिलने से पहले भी ‘ढोली’ ने अपनी अलग पहचान बनाई थी। यह 2024 के कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित होने वाली उत्तराखंड की एकमात्र फिल्म थी। वहां फिल्म की कहानी, अभिनय और लोक संस्कृति के प्रभावशाली चित्रण को दर्शकों और समीक्षकों ने खूब सराहा था।
नरेंद्र सिंह नेगी की आवाज ने बढ़ाया लोकसंगीत का प्रभाव
गढ़वाली लोकसंगीत के प्रसिद्ध गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने फिल्म के गीतों को अपनी आवाज दी है। लोक कलाकारों और परंपराओं पर आधारित इस फिल्म में उनके संगीत ने कहानी को और अधिक प्रभावशाली बना दिया है।
अनुभवी टीम ने मिलकर रचा राष्ट्रीय स्तर का सिनेमा
फिल्म के निर्माता सुनील नायक हैं, जबकि निर्देशन दिनेश पी. भोंसले ने किया है। कहानी के विस्तार, हिंदी संवाद और कार्यकारी निर्माता की जिम्मेदारी शिशिर कृष्ण शर्मा ने निभाई। मूल कहानी और गढ़वाली संवादों का हिंदी रूपांतरण डॉ. नंदकिशोर हटवाल ने किया।
छायांकन अभिनव गंधर्व और शेख काइजर, संपादन एवं सह-निर्देशन वीरेन्द्र घरसे, कला निर्देशन अतुल विश्नोई, वेशभूषा गायत्री टम्टा, मेकअप पूजा भंडारी तथा प्रोडक्शन मैनेजमेंट राजेश कारेकर ने संभाला।
स्थानीय कलाकारों को मिला राष्ट्रीय मंच
फिल्म में मुख्य भूमिका मोहित घिल्डियाल ने निभाई है। उनके साथ दीपा देऊपा, रमेश नौडियाल, सतीश धौलाखंडी, सोनिया गैरोला, नीरज नेगी, अतुल रावत, सुशील पुरोहित, धीरज रावत, जसपाल राणा, आनंद राणा, संजय बडोनी, सुनील सिंह, तन्मय लोहानी, मास्टर ऋषभ, अनिल जखमोला, तनुज शर्मा, प्रेम हिंदवाल और पंकज डंगवाल सहित उत्तरकाशी के अनेक स्थानीय कलाकारों ने अभिनय किया है।
स्थानीय कलाकारों की स्वाभाविक प्रस्तुति ने फिल्म में गढ़वाल की बोली, संस्कृति और सामाजिक जीवन को वास्तविक रूप में दर्शाया है, जो ‘ढोली’ को अन्य क्षेत्रीय फिल्मों से अलग पहचान दिलाती है।



