प्रकृति के अनुपम चितेरे कवि ने अल्पायु में हिंदी साहित्य को दिया अमूल्य खजाना, फिर भी राष्ट्रीय पहचान का इंतजार
दिनेश ध्यानी
देहरादून: हिमालय की गोद में जन्मे और प्रकृति को अपनी कविता का प्राण बनाने वाले महान कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल की 107वीं जयंती (20 अगस्त 2026) पर एक बार फिर यह सवाल उठता है कि आखिर हिंदी साहित्य के इस अनमोल रत्न को राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान क्यों नहीं मिल पाया, जिसके वह वास्तविक अधिकारी हैं।
प्रकृति, पर्यावरण, हिमालय और मानवीय संवेदनाओं के अद्भुत कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल ने मात्र 28 वर्ष के छोटे से जीवनकाल में हिंदी साहित्य को जो अमूल्य धरोहर दी, वह किसी भी बड़े साहित्यकार की पहचान के लिए पर्याप्त है। बावजूद इसके राष्ट्रीय साहित्यिक मंचों पर उनका नाम अपेक्षित स्थान नहीं पा सका है।
चमोली के मालकोटी गांव में हुआ था जन्म
हिमवंत पुत्र चंद्रकुंवर बर्त्वाल का जन्म उत्तराखंड के चमोली जिले के ग्राम मालकोटी, पट्टी तल्ला नागपुर में 20 अगस्त 1919 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पौड़ी और देहरादून में हुई। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1939 में बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की और 1941 में लखनऊ विश्वविद्यालय में एमए में प्रवेश लिया। इसी दौरान उनका संपर्क हिंदी साहित्य के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ से हुआ।
बर्त्वाल जी बचपन से ही प्रकृति के अत्यंत करीब रहे। हिमालय की चोटियां, नदियों की कलकल ध्वनि, जंगलों की हरियाली और पहाड़ का जीवन उनकी चेतना का हिस्सा बन गए थे। यही कारण है कि उनकी कविताओं में प्रकृति केवल दृश्य नहीं बल्कि जीवंत अनुभूति बनकर सामने आती है।
अल्पायु में रच दिया साहित्य का विशाल संसार
चंद्रकुंवर बर्त्वाल ने जीवन के केवल 28 वर्षों में हिंदी साहित्य को लगभग एक हजार कविताओं, कहानियों, एकांकियों और बाल साहित्य का अमूल्य खजाना दिया। वे हिंदी के उन विरले कवियों में शामिल हैं जिन्होंने हिमालय और प्रकृति प्रेम के साथ-साथ मानव जीवन की संवेदनाओं, पीड़ा और संघर्ष को अपनी रचनाओं में स्थान दिया।
उनकी कविताओं में प्रकृति और मनुष्य के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है। मृत्यु, जीवन, प्रेम, विरह और अस्तित्व जैसे विषयों पर उन्होंने जिस संवेदनशीलता से लिखा, वह उन्हें हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।
निराला से मिला साहित्यिक मार्गदर्शन
वर्ष 1939 से ही उनकी कविताएं “कर्मभूमि” साप्ताहिक पत्र में प्रकाशित होने लगी थीं। उनके सहपाठी और मित्र शंभूप्रसाद बहुगुणा ने उनकी साहित्यिक प्रतिभा को पहचानते हुए उनकी रचनाओं को संरक्षित और प्रकाशित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
बहुगुणा जी ने वर्ष 1945 में “हिमवंत का एक कवि” नाम से चंद्रकुंवर बर्त्वाल की काव्य प्रतिभा पर पुस्तक प्रकाशित की। बाद में उनकी अनेक कृतियां जैसे गीत माधवी, पयस्विनी, प्रेमिनी, जीतू, कंकड़-पत्थर और नंदिनी प्रकाशित हुईं।
आचार्य भारतीय और भावनगर के साहित्यकार हरिशंकर मूलानी ने उनकी कृति “नंदिनी” की प्रशंसा करते हुए इसे रस, भाव, चमत्कार और संवेदनाओं की दृष्टि से अत्यंत उत्कृष्ट बताया था।
“मैं न चाहता युग-युग तक पृथ्वी पर जीना…”
चंद्रकुंवर बर्त्वाल हिंदी के कालिदास कहे जाने वाले महान कवि कालिदास को अपना आदर्श मानते थे। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां आज भी उनके जीवन दर्शन को व्यक्त करती हैं—
*”मैं न चाहता युग-युग तक पृथ्वी पर जीना,*
*पर उतना जी लूं जितना जीना सुंदर हो।*
*मैं न चाहता जीवन भर मधुरस ही पीना,*
*पर उतना पी लूं जिससे मधुमय अंतर हो।”*
इन पंक्तियों में जीवन के प्रति उनका गहरा दर्शन और सौंदर्यबोध दिखाई देता है।
बीमारी से संघर्ष करते हुए भी जारी रखी साहित्य साधना
जीवन के अंतिम वर्षों में चंद्रकुंवर बर्त्वाल क्षय रोग (टीबी) से पीड़ित हो गए थे। उस समय इस बीमारी को लेकर समाज में भय और अंधविश्वास था। उनका इलाज नैनीताल जिले के भवाली स्थित टीबी सैनिटोरियम में भी हुआ।
परिजनों ने अगस्त्यमुनि के पास पवालिया में उनके लिए एक अलग घर बनाया, जहां वे एकांत में रहने लगे। बीमारी के कारण लोग उनसे दूरी बनाए रखते थे। परिवार के लोग उनके लिए भोजन दरवाजे पर रख जाते थे और वे अधिकांश समय प्रकृति के बीच बैठकर अपनी रचनाएं लिखते रहते थे।
मृत्यु को सामने महसूस करते हुए भी उन्होंने कलम नहीं छोड़ी। उनका एकांत, प्रकृति और कागज-कलम ही उनके जीवन के अंतिम साथी बने।
28 वर्ष की आयु में हिमालय की गोद में ली अंतिम सांस
लगातार बीमारी से संघर्ष करते हुए 14 सितंबर 1947 को मात्र 28 वर्ष की आयु में चंद्रकुंवर बर्त्वाल का निधन हो गया। रविवार का वह दिन हिंदी साहित्य के लिए एक महान प्रतिभा को खोने का दिन था।
उनके निधन के बाद उनकी कई रचनाएं और साहित्यिक सामग्री नष्ट हो गईं। उस समय टीबी को लेकर लोगों में इतना भय था कि उनके कपड़े, बर्तन और कई सामान जला दिए गए। माना जाता है कि इस दौरान उनकी कई अप्रकाशित रचनाएं भी हमेशा के लिए समाप्त हो गईं।
हालांकि उनके मित्र शंभूप्रसाद बहुगुणा और बुद्धि बल्लभ थपलियाल ने उनकी बची हुई रचनाओं को सुरक्षित कर प्रकाशित कराया, जिसके बाद हिंदी साहित्य जगत में उनकी पहचान बनी।
प्रमुख रचनाएं और कविताएं
चंद्रकुंवर बर्त्वाल की प्रमुख कृतियों में शामिल हैं—
गीत संग्रह:
* गीत माधवी
* पयस्विनी
* प्रेमिनी
* जीतू
* कंकड़-पत्थर
* नंदिनी
प्रमुख कविताएं:
* पयस्विनी
* काफल पाको
* मुझको पहाड़ ही प्यारे हैं
* घर की याद
* बसंत आगमन
* स्वर्ग सरि
* विराट ज्योति
* मेघ नंदिनी
“मुझको पहाड़ ही प्यारे हैं…”
पहाड़ों के प्रति उनके प्रेम को उनकी कविता की इन पंक्तियों से समझा जा सकता है—
*”मुझको पहाड़ ही प्यारे हैं,*
*प्यारे समुद्र मैदान जिन्हें,*
*नित रहे उन्हें वही प्यारे,*
*मुझको हिम से भरे हुए,*
*अपने पहाड़ ही प्यारे हैं।”*
यह कविता उनके हिमालय प्रेम और पहाड़ों से आत्मिक संबंध को दर्शाती है।
राष्ट्रीय सम्मान का इंतजार
आज चंद्रकुंवर बर्त्वाल के साहित्य पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं। उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर साहित्यिक आयोजन भी आयोजित किए जाते हैं। लेकिन सवाल अभी भी कायम है कि हिंदी साहित्य के इस महान कवि को राष्ट्रीय स्तर पर वह पहचान और सम्मान क्यों नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी हैं।
उत्तराखंड के इस हिमवंत कवि ने अपने छोटे से जीवन में हिंदी साहित्य को जो ऊंचाई दी, वह किसी भी युग के बड़े साहित्यकार से कम नहीं है। आवश्यकता है कि उनके साहित्य को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान मिले और उनकी रचनाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
चंद्रकुंवर बर्त्वाल केवल उत्तराखंड के नहीं, बल्कि पूरे हिंदी साहित्य जगत की अमूल्य धरोहर हैं। उनकी 107वीं जयंती पर यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी कि उनके साहित्य और योगदान को राष्ट्रीय मंच पर उचित सम्मान मिले।






