Shardiya Navratri 2026: इस वर्ष शारदीय नवरात्रि महापर्व की शुरुआत 11 अक्टूबर से हो रही है। नवरात्र का यह पावन पर्व 20 अक्टूबर, मंगलवार को विजयादशमी के साथ संपन्न होगा। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होने वाला शारदीय नवरात्रि का पावन अनुष्ठान केवल पंचांगीय तिथियों का क्रम नहीं, अपितु अंतश्चेतना को तमस से परम प्रकाश की ओर उन्मुख करने वाला दिव्य महापर्व है। नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व की तैयारियां देवभूमि उत्तराखण्ड सहित पूरे देश में अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। मंदिरों में साफ-सफाई, सजावट, घटस्थापना की तैयारियां और धार्मिक अनुष्ठानों की रूपरेखा पूरी कर ली गई है। श्रद्धालु मां दुर्गा के नौ दिवसीय महापर्व के स्वागत के लिए उत्साहपूर्वक तैयारियां कर रहे हैं।
हिमालय के उत्तुंग धवल शिखरों, अलकनंदा की अविरल धारा और देवऋषियों की तपोभूमि उत्तराखण्ड में नवरात्रि का यह पर्व प्रकृति, संस्कृति और सनातन आस्था के त्रिवेणी संगम के रूप में साकार हो उठता है। श्रीनगर गढ़वाल की पावन धरा, जो युगों-युगों से कमलेश्वर, कमलेश्वरी और किलकिलेश्वर महादेव की छत्रछाया में जाग्रत एवं आलोकित है, वहां शक्ति की आद्य अधिष्ठात्री मां दक्षिण काली और नवदुर्गा की संयुक्त साधना जीवन को आत्मिक शांति, नवचेतना और परम निर्भयता प्रदान करती है।
शुभ योग में हुई घटस्थापना
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस वर्ष नवरात्रि का शुभारंभ विशेष मंगलकारी योगों में हुआ है। श्रद्धालुओं ने प्रातःकाल शुभ मुहूर्त में घटस्थापना (कलश स्थापना) कर अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित की तथा जौ बोकर नवसृजन और समृद्धि का संकल्प लिया। शास्त्रों में कलश को संपूर्ण सृष्टि का प्रतीक माना गया है।
नौ दिनों तक होगी नवदुर्गा की आराधना
नवरात्रि के प्रत्येक दिन मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि इन नौ स्वरूपों की उपासना से साधक के भीतर शक्ति, ज्ञान, साहस, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का विकास होता है।
मां दक्षिण काली की आराधना का विशेष महत्व
देवभूमि उत्तराखण्ड, विशेषकर श्रीनगर गढ़वाल में मां दक्षिण काली की उपासना का विशेष स्थान है। विद्वानों के अनुसार मां दक्षिण काली का स्वरूप भय, अज्ञान और नकारात्मक प्रवृत्तियों के नाश का प्रतीक है। उनकी आराधना से साधक को निर्भयता, आत्मबल और आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है।
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, 11 अक्टूबर को चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग रहेगा। कलश स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त को विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक रहेगा। इसी दौरान कलश स्थापना करना शुभ माना जाता है। हालांकि, अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और स्थानीय समय के अंतर के कारण मुहूर्त में थोड़ा बदलाव हो सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त की पुष्टि जरूर कर लेनी चाहिए।
17 अक्टूबर को महा सप्तमी
17 अक्टूबर, शनिवार को महा सप्तमी से जुड़ी पूजा होगी। पंचांग के अनुसार, सुबह 8:58 बजे के बाद सप्तमी से संबंधित पूजा की जाएगी।
इसी दिन नवरात्र की कई महत्वपूर्ण परंपराएं पूरी की जाएंगी। नौपत्रिका प्रवेश, निशा पूजा और मूल नक्षत्र में पूजा पंडालों में देवी की स्थापना की जाएगी।
इसी दिन श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मां दुर्गा के पट भी खोल दिए जाएंगे। यानी 17 अक्टूबर से दुर्गा पूजा का उत्साह और भी बढ़ जाएगा और भक्त मां के दर्शन कर सकेंगे।
18 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी
18 अक्टूबर, रविवार को श्री दुर्गा अष्टमी का व्रत रखा जाएगा। इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा की जाती है।
अष्टमी का दिन नवरात्र साधना में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं, मां दुर्गा की पूजा करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार कन्या पूजन सहित अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। इसी दिन विशेष पूजा और महानिशा पूजा का भी विधान रहेगा।
19 अक्टूबर को महानवमी
19 अक्टूबर, सोमवार को अष्टमी और नवमी तिथि की संधि बेला में संधि पूजा की जाएगी। पंचांग के अनुसार, संधि पूजा का विशेष समय सुबह 6:53 बजे रहेगा। अष्टमी और नवमी के मिलन का यह समय धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए संधि पूजा को विशेष विधि-विधान और श्रद्धा के साथ संपन्न किया जाता है। इसी दिन महानवमी का पर्व भी मनाया जाएगा।
20 अक्टूबर को विजयादशमी और विसर्जन
20 अक्टूबर, मंगलवार को उदया तिथि के अनुसार नवमी रहेगी और नवमी तिथि सुबह 9:35 बजे तक रहेगी। इसके बाद नवरात्र व्रत का पारण किया जाएगा। इसी दिन विजयादशमी यानी दशहरा भी मनाया जाएगा। मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन भी इसी दिन किया जाएगा।
उत्तराखण्ड में श्रद्धा का उत्सव
अलकनंदा तट सहित प्रदेश के विभिन्न शक्तिपीठों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। मां नंदा-सुनंदा, धारी देवी, सुरकंडा देवी, कुंजापुरी और अन्य सिद्धपीठों में विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। मंदिरों में दुर्गा सप्तशती का पाठ, भजन-कीर्तन और हवन-पूजन का क्रम नौ दिनों तक जारी रहेगा।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि नवरात्रि का वास्तविक संदेश केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे दोषों का त्याग कर सदाचार, सेवा, नारी सम्मान और प्रकृति संरक्षण का संकल्प लेना भी है।
शारदीय नवरात्रि के शुभ अवसर पर श्रद्धालुओं ने मां आदिशक्ति से विश्व में सुख, शांति, समृद्धि, आरोग्य और सद्भाव की कामना की।
लेखक : अखिलेश चन्द्र चमोला, श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

















