31 मई को प्रधानाचार्य पद से होंगे सेवानिवृत्त, जीवनभर शिक्षा, साहित्य और लोकसंस्कृति की अलख जगाई
देहरादून। उत्तराखंड की देवभूमि ने समय-समय पर ऐसे साहित्यकारों और लोकधर्मियों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी साधना और कर्मनिष्ठा से समाज को नई दिशा दी। इसी श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण नाम है वरिष्ठ साहित्यकार, लोकगायक एवं शिक्षाविद् ओमप्रकाश सेमवाल का, जो आगामी 31 मई को प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं।
रुद्रप्रयाग जनपद के ग्राम दरम्वाड़ी (जाखधार) में जन्मे ओमप्रकाश सेमवाल ने शिक्षा, साहित्य, लोकभाषा और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। स्वर्गीय श्रीमती कलावती देवी एवं स्वर्गीय पीताम्बर दत्त सेमवाल के सुपुत्र सेमवाल वर्तमान में शहीद भरत सिंह राजकीय इंटर कॉलेज, मालतोली में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत हैं। भौतिकी विषय में एम.एस-सी. एवं बी.एड. की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने लंबे समय तक शिक्षा जगत में सेवाएं दीं और नई पीढ़ी के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गढ़वाली भाषा-साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर
ओमप्रकाश सेमवाल गढ़वाली भाषा और लोकसंस्कृति के सजग प्रहरी माने जाते हैं। उनकी साहित्यिक कृतियों में लोकजीवन, संघर्ष, संवेदनाएं और सांस्कृतिक चेतना की गहरी छाप दिखाई देती है।
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘कलसुड़ी भजन माला’ (2002), ‘मेरि पूफु’ (2009), ‘ढुंगळा’ (2013) तथा नाट्य संग्रह ‘चुनौ’ (2020) शामिल हैं। इन रचनाओं ने गढ़वाली साहित्य को नई वैचारिक दिशा प्रदान की है।
इसके अतिरिक्त उन्होंने माँ फलासी चण्डिका, बाबा तुंगनाथ, कोटेश्वर महादेव और अन्य लोकदेवताओं पर आधारित अनेक भजनों एवं गीतों को अपनी स्वर साधना से जन-जन तक पहुँचाया। आकाशवाणी पौड़ी, देहरादून, नजीबाबाद तथा दूरदर्शन उत्तराखंड से उनके गीत, कहानियाँ और साक्षात्कार प्रसारित होते रहे हैं।
‘कलश’ साहित्यिक संस्था बनी सांस्कृतिक आंदोलन
ओमप्रकाश सेमवाल की पहचान केवल साहित्यकार के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संगठक के रूप में भी स्थापित है। वर्ष 2004 में स्थापित ‘कलश साहित्यिक संस्था (ट्रस्ट)’ आज उत्तराखंड की प्रमुख साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं में गिनी जाती है।
संस्था द्वारा अब तक 562 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं, जिनमें 372 से अधिक कवि सम्मेलन, 42 पुस्तकों का लोकार्पण तथा अनेक सांस्कृतिक आयोजन शामिल हैं। संस्था ने निर्धन एवं मेधावी छात्र-छात्राओं की सहायता के साथ-साथ उत्तराखंड की विभूतियों को सम्मानित करने का भी महत्वपूर्ण कार्य किया है।
संस्था के मंच से महान लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी अनेक बार अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। वहीं पाण्डवाज क्रिएशन के सहयोग से आयोजित वृहद कवि सम्मेलन प्रदेश की सांस्कृतिक गतिविधियों में मील का पत्थर साबित हुए।
संस्था की अविस्मरणीय उपलब्धियाँ:
विभूतियों का स्मरण व सम्मान:
हिमवंत कवि चन्द्र कुँवर बर्त्वाल, डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल, स्वामी सच्चिदानन्द, श्रीदेव सुमन और जिम कॉर्बेट जैसी महान विभूतियों की स्मृति में समारोह आयोजित कर वरिष्ठ साहित्यकारों व समाजसेवियों को सम्मानित करना ‘कलश’ की अनूठी परंपरा है।
कलश कवि सम्मेलन:
वर्ष 2009 से अब तक गाँवों, शहरों और ऐतिहासिक मेलों में 372 से अधिक कवि सम्मेलनों का सफल संयोजन किया जा चुका है। इन सम्मेलनों की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महानायक श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी ने 30 बार इन मंचों की शोभा बढ़ाई है। पाण्डवाज क्रिएशन के साथ मिलकर वर्ष 2016, 2025 और 2026 में हुए तीन वृहद कवि सम्मेलन मील का पत्थर साबित हुए हैं।
गढ़वाली भाषा मानकीकरण में अहम भूमिका
गढ़वाली भाषा के संरक्षण एवं मानकीकरण के लिए अप्रैल 2025 में देहरादून में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला को सेमवाल की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इस कार्यशाला में प्रदेशभर के साहित्यकारों, भाषाविदों और संस्कृति प्रेमियों ने भाग लिया था।
अनेक सम्मानों से हुए सम्मानित
ओमप्रकाश सेमवाल को उनके साहित्यिक और सामाजिक योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें यूथ आइकॉन सम्मान, उफतारा सम्मान, उत्तरायणी सम्मान, देवभूमि लोक सम्मान तथा साहित्य सम्मान प्रमुख हैं। विभिन्न संस्थाओं द्वारा उन्हें 17 से अधिक बार विशेष सम्मान प्रदान किया जा चुका है।
सेवानिवृत्ति नहीं, समाजसेवा की नई शुरुआत
31 मई को शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी ओमप्रकाश सेमवाल लोकभाषा, संस्कृति और समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय रहेंगे। साहित्य और संस्कृति से जुड़े लोगों का मानना है कि सेमवाल जैसे व्यक्तित्व कभी सेवानिवृत्त नहीं होते, बल्कि समाज के लिए और अधिक सक्रिय हो जाते हैं।
उनकी धर्मपत्नी उर्मिला सेमवाल, पुत्रियाँ आकांक्षा एवं दिव्या तथा पुत्र कार्तिकेय उनके सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों में निरंतर सहयोगी रहे हैं।
उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले ओमप्रकाश सेमवाल का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा।
डॉ. अखिलेश चन्द्र चमोला ‘वाचस्पती’



