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4 दिन पहले दिल्ली से कोटद्वार पहुंचे (कार में मृत मिले) युवक की कोरोना रिपोर्ट आई पॉजिटिव

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कोटद्वार : चार दिन पहले बीते 10 जून को कोटद्वार कोतवाली के कौड़िया चेकपोस्ट पर कार में मृत मिले युवक की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। बतादें कि बीते 10 जून को एक युवक दिल्ली से टैक्सी बुक कर अपने घर कोटद्वार के लिए निकला था। रास्ते में रुड़की के नजदीक उसने कार चालक से स्वास्थ्य खराब होने बात कही और कार की पिछली सीट पर बैठ गया। परन्तु जब कार उत्तराखण्ड की सीमा पर स्थित कौड़िया चेकपोस्ट (कोरोना जांच पोस्ट) पर पहुंची तो युवक कार की पिछली सीट पर मृत मिला। कोतवाली पुलिस कार को लेकर चिकित्सालय पहुंची, जहा मृतक के साथ ही कार चालक के कोरोना सैंपल लिए गए। शनिवार देर शाम आई रिपोर्ट में मृतक में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई है। वहीं कार चालक की रिपोर्ट का इंतजार है।

कोटद्वार के एक व्यापारी और उसकी माँ में भी कोरोना की पुष्टि  

कोटद्वार में गोविंदनगर निवासी एक व्यापारी और उसकी माँ में कोरोना संक्रमण की पुष्टि होने के बाद इलाके को सील कर दिया गया। गोविंदनगर के वार्ड नंबर-15 को सैनेटाइज कराया गया है। कोरोना संक्रमित व्यापारी कोटद्वार के बेस हॉस्पिटल में एडमिट है। व्यापारी की मां को भी आइसोलेशन वार्ड में एडमिट कराया गया है। जानकारी के मुताबिक गोविंदनगर के वार्ड नंबर 15 में रहने वाले व्यापारी की मां इलाज के लिए कोटद्वार से हरियाणा के फरीदाबाद गई हुईं थी। वो 28 मई को वापस लौटीं। 10 जून को व्यापारी को बुखार आया, जिसके बाद व्यापारी और उसकी मां को कोटद्वार के अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनका सैंपल जांच के लिए ऋषिकेश एम्स भेजा गया था। शनिवार को जांच रिपोर्ट में दोनों में कोरोना की पुष्टि हुई है। जिसके बाद नगर निगम प्रशासन ने गोविंदनगर क्षेत्र को सील करा दिया। यहां सैनेटाइजेशन कराया गया है। प्रशासन ने लोगों से घरों में रहने की अपील की है।

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पौड़ी गढ़वाल : विश्व रक्तदाता दिवस पर स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन

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पौड़ी गढ़वाल : विश्व रक्तदाता दिवस (World Blood Donor Day) के मौके पर आज 14 जून को भारतीय रेडक्रॉस समिति के तत्वाधान में जिला चिकित्सालय पौड़ी में स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया।

विश्व रक्तदाता दिवस हर वर्ष 14 जून को मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इस दिन को रक्तदाता दिवस के रूप में घोषित किया गया है। वर्ष 2004 में स्थापित इस कार्यक्रम का उद्देश्य सुरक्षित रक्त उत्पादों की आवश्यकता के बारे में जागरूकता बढ़ाना है।

मीडिया प्रभारी प्रदीप रावत ने बताया कि आज जिला चिकित्सालय पौड़ी में आयोजित विश्व रक्तदाता दिवस कार्यक्रम में भारतीय रेडक्रॉस समिति, शाखा पौड़ी के सचिव डॉ0 गम्भीर सिंह तालियान, केसर सिंह असवाल (चेयरमैन, मैनेजिंग कमेटी), डॉ0 अजय प्रताप, नवीन कठैत (लैब टेक्नीशियन) एवं  प्रदीप रावत (मीडिया प्रभारी) की उपस्थिति में रक्तदाता राकेश शुक्ला, कांताप्रसाद,  कृष्णपाल राणा व उमेद सिंह चौहान द्वारा चार यूनिट रक्तदान किया गया। साथ ही 14 यूनिट रक्तदाताओं को प्रतीक्षा सूची में रखा गया है। जिन्हें अकस्मात आवश्यकता पड़ने पर सूचित करने हेतु निर्देशित किया गया।

इस अवसर पर भारतीय रेडक्रॉस समिति, शाखा पौड़ी के सचिव डॉ0 गम्भीर सिंह तालियान एवं केसर सिंह असवाल (चेयरमैन, मैनेजिंग कमेटी) द्वारा वैश्विक महामारी कोरोना (कोविड-19) के समय रक्तदान के महत्व से भी सभी रक्तदाताओं को परिचित कराया। साथ ही कोरोना महामारी से स्वयं, परिवार व समाज को सुरक्षित रखने के उपायों पर भी चर्चा की गई। अंत में रक्तदाताओं के सुरक्षित जीवन रक्षक हेतु रक्त के दान करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए  सभी काआभार व्यक्त किया गया।

उत्तराखंड में आज दोपहर तक मिले 31 कोरोना पॉजिटिव, 1816 हुई संक्रमितों की संख्या

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corona positives found in Uttarakhand

देहरादून : उत्तराखंड में आज दोपहर तक 31 नए कोरोना पॉजिटिव मामले सामने आये हैं। जिसके बाद राज्य में कोरोना संक्रमित मरीजों का आंकड़ा बढ़कर 1816 हो गया है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा रविवार दोपहर को जारी स्वास्थ्य बुलेटिन के अनुसार आज कुल 1050 सैंपल की रिपोर्ट आई, जिसमे से 31 मामले पॉजिटिव आये जबकि 1019 मामले नेगेटिव आये हैं। जिसके बाद राज्य में अब संक्रमित मरीजों की संख्या बढक़र 1816 हो गई है। हालांकि कुल संक्रमित मरीजों में से अब तक 1078 (60 प्रतिशत से अधिक) लोग स्वस्थ्य होकर अस्पतालों से डिस्चार्ज हो चुके हैं। जबकि विभिन्न अस्पतालों में 705 एक्टिव मरीज चिकित्सकों की निगरानी में भर्ती हैं। वहीँ अब तक कोरोना से 24 मरीजों की मौत भी हो चुकी है। आज सबसे ज्यादा 11 मामले देहरादून जिले से आये हैं,जबकि 09 मामले टिहरी गढ़वाल से, 05 हरिद्वार से, 03 उत्तरकाशी से, नैनीताल, चमोली तथा उधमसिंह नगर से एक-एक कोरोना संक्रमित मरीज सामने आये हैं। आज कोरोना पॉजिटिव आये मरीजों में से ज्यादातर लोग बाहरी राज्यों से यहाँ लौटे हैं।

उत्तराखंड में अब तक कोरोना covid-19 के जिलेवार मामले

जनपद कोरोना के मरीज
देहरादून472
नैनीताल335
टिहरी291
उधमसिंह नगर114
हरिद्वार209
पौड़ी62
अल्मोड़ा74
पिथौरागढ़51
चमोली44
उत्तरकाशी33
बागेश्वर40
चंपावत48
रुद्रप्रयाग43
कुल1816

 

 

दुखद खबर: बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत ने की खुदकुशी

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नई दिल्ली : कोरोना संकट के बीच बॉलीवुड से बेहद दुखद खबर आ रही है। अभी अभी प्राप्त जानकारी के मुताबिक बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत ने अपने मुंबई स्थित घर में आत्महत्या कर ली है। उनके नौकर ने पुलिस को इस बारे में जानकारी दी कि सुशांत ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। 34 साल के सुशांत ने यह कदम क्यों उठाया इस बारे में जानकारी नहीं मिल सकी है। उनके कमरे के दरवाजे को जब तोड़ा गया तो रूम में सुशांत फांसी के फंदे से लटके पाए गए। पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, वे पिछले 6 महीनों से डिप्रेशन से गुजर रहे थे। उनकी मौत की खबर फैलते ही पूरे फिल्म जगत (बॉलीवुड़) में शोक की लहर दौड़ पड़ी है।

महेंद्र सिंह धोनी की बायोपिक पर बनी फिल्म ‘एमएस धोनी’ से सुर्ख़ियों में आये सुशांत की मौत की वजह अभी तक सामने नहीं आ पाई है। मुंबई स्थित उनके घर पर पुलिस पहुंच चुकी है। सुशांत सिंह राजपूत ने टीवी सीरियल से अपने करियर की शुरुआत की थी और बाद में बॉलिवुड का रूख किया था। सुशांत उन गिने चुने कलाकारों में आते हैं जिन्होंने टीवी के बाद फिल्मों में भी अच्छी सफलता हासिल की। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत छोटे परदे पर ‘किस देश में है मेरा दिल’ नाम के धारावाहिक से बतौर टीवी एक्टर की थी. परन्तु उन्हें पहचान एकता कपूर के धारावाहिक “पवित्र रिश्ता” से मिली. इसके बाद उन्हें फिल्मों का सफर शुरु किया था. सुशांत ‘केदारनाथ’, ‘एम एस धोनी’ और छिछोरे जैसी फिल्मों में दिखाई दे चुके हैं। उन्होंने टीवी सीरियल ‘पवित्र रिश्ता’ से घर-घर में पहचान बनाई थी। बतादें कि बीते सप्ताह सुशांत सिंह राजपूत की एक्स मैनेजर दिशा सालियान ने भी मुंबई की एक बिल्डिंग की 14वीं मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली थी।

मनरेगा क्या है, हाशिये पर चल रही मनरेगा योजना अचानक सुर्खियों में कैसे? पढ़िए डॉ. राजेंद्र कुकसाल (पूर्व लोकपाल मनरेगा) की विस्तृत रिपोर्ट

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इन दिनों या यूँ कहें कि कोरोना संकट काल में सोशल मीडिया पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) चर्चाओं में हैं,  हाशिये पर चल रही यह योजना अचानक सुर्खियों में आ गयी क्योंकि हुक्मरानों को इस योजना के माध्यम से बेरोजगार प्रवासियों के लिए रोजगार की संभावनाएं दिखाई देने लगी हैं। इसके बारे में विस्तृत जानकारी दे रहे हैं मनरेगा योजना से जुड़े पूर्व लोकपाल, डॉ. राजेंद्र कुकसाल।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना,   जिसे भारत सरकार ने 7 सितंबर 2005 को पार्लियामेंट से पास करा कर कानूनी दर्जा दिया गया। यह योजना दो फरवरी, 2006 को देश के 200 जिलों में शुरू की गयी. अगले ही साल याने 2007 में इसे और 130 जिलों में विस्तारित किया गया वर्ष 2008-09 में पहली अप्रैल से यह देश के सभी 593 जिलों में लागू की गयी।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक कानून है, जो शासन को इस बात के लिए बाध्य करता है कि वह किसी भी ग्रामीण परिवार के वैसे सदस्यों को एक साल में सौ दिन का रोजगार मुहैया कराये, जो 18 साल की उम्र पूरी कर चुके हैं और अकुशल मजदूर के रूप में काम करना चाहते हैं।

इस अधिनियम को ग्रामीण लोगों की क्रय शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, मुख्य रूप से ग्रामीण भारत में रहने वाले लोगों के लिए अर्ध-कौशलपूर्ण या बिना कौशलपूर्ण कार्य, चाहे वे गरीबी रेखा से नीचे हों या ना हों। शुरू में इसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) कहा जाता था, लेकिन 2 अक्टूबर 2009 को इसका पुनः नामकरण कर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना किया गया। सूखाग्रस्त क्षेत्रों और जनजातीय इलाकों में तथा कुछ राज्यों ने अपनी हिस्सेदारी से मनरेगा के तहत 150 दिनों के रोज़गार का प्रावधान रखा है। मनरेगा के तहत ग्रामीण परिवारों के व्यस्क युवाओं को रोज़गार का कानूनी अधिकार प्रदान किया गया है। प्रावधान के मुताबिक, मनरेगा लाभार्थियों में एक-तिहाई महिलाओं का होना अनिवार्य है। साथ ही विकलांग एवं अकेली महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। प्रावधान के अनुसार, आवेदन जमा करने के 15 दिनों के भीतर या जिस दिन से काम की मांग की जाती है, आवेदक को रोज़गार प्रदान किया जाएगा। पंचायती राज संस्थानों को मनरेगा के तहत किये जा रहे कार्यों के नियोजन, कार्यान्वयन और निगरानी हेतु उत्तरदायी बनाया गया है। मनरेगा में सभी कर्मचारियों के लिये बुनियादी सुविधाओं जैसे- पीने का पानी और प्राथमिक चिकित्सा आदि के प्रावधान भी किये गए हैं।

मनरेगा के तहत आर्थिक बोझ केंद्र और राज्य सरकार द्वारा साझा किया जाता है। इस कार्यक्रम के तहत कुल तीन क्षेत्रों पर धन व्यय किया जाता है. (1) अकुशल, अर्द्ध-कुशल और कुशल श्रमिकों की मज़दूरी (2) आवश्यक सामग्री (3) प्रशासनिक लागत। केंद्र सरकार अकुशल श्रम की लागत का 100 प्रतिशत, अर्द्ध-कुशल और कुशल श्रम की लागत का 75 प्रतिशत, सामग्री की लागत का 75 प्रतिशत तथा प्रशासनिक लागत का 6 प्रतिशत वहन करती है, वहीं शेष लागत का वहन राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। चूंकि राज्य सरकारें बेरोजगारी भत्ता देती हैं, उन्हें श्रमिकों को रोजगार प्रदान करने के लिए भारी प्रोत्साहन दिया जाता है। बेरोजगारी भत्ते की राशि को निश्चित करना राज्य सरकार पर निर्भर है, जो इस शर्त के अधीन है कि यह पहले 30 दिनों के लिए न्यूनतम मजदूरी के 1/4 भाग से कम ना हो और उसके बाद न्यूनतम मजदूरी का 1/2 से कम ना हो। प्रति परिवार 100 दिनों का रोजगार (या बेरोजगारी भत्ता) सक्षम और इच्छुक श्रमिकों को हर वित्तीय वर्ष में प्रदान किया जाना चाहिए।

मनरेगा के अंतर्गत किये जाने वाले कार्य :

मनरेगा के कार्य ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करने के उद्देश्य से निर्धारित किए जाते हैं। जैसे जल संरक्षण और संचयन, वनीकरण, ग्रामीण संपर्क-तंत्र, बाढ़ नियंत्रण और सुरक्षा, तटबंधों का निर्माण और मरम्मत, नए टैंक/तालाबों की खुदाई, रिसाव टैंक और छोटे बांधों के निर्माण को भी महत्व दिया जाता है। कोई भी ऐसा कार्य जिसे केन्द्र सरकार राज्य सरकारों से सलाह लेकर अधिसूचित करें। समय समय पर राज्यों की मांग व आवश्यकता नुसार इसमें भारत सरकार द्वारा सुधार किया जाता रहा है। कोरोना काल में बड़ी संख्या में प्रवासियों के अपने राज्य व गांव लौटने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की चुनौती पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है इस स्थति में मनरेगा के वार्षिक बजट को लगभग 60,000 करोड़ रुपए से लगभग एक लाख करोड़ रुपए करके भारत सरकार ने एक सराहनीय कदम उठाया है।

उत्तराखंड में मनरेगा योजना की स्थिति-

2 फरवरी 2006 को राज्य के दो जनपदों टेहरी एवं अल्मोड़ा में मनरेगा शुरू की गई। टेहरी जनपद में विकास खण्ड फगोट के आगराखाल में श्रीमती वीभा पुरीदास तत्कालीन प्रमुख सचिव व वीरेन्द्र सिंह कंडारी, तत्कालीन क्षेत्र पंचायत प्रमुख फगोट के दिशा निर्देशन इस योजना का शुभारम्भ हुआ। टेहरी जनपद में जिला उद्यान अधिकारी होने के कारण मुझे भी इस कार्यक्रम में शामिल  होने का शुअवसर मिला।

 जिला अधिकारी टेहरी द्वारा मुझे मनरेगा का मास्टर ट्रेनर नामित किया गया।

मनरेगा का मास्टर ट्रेनर होने के कारण मुझे पूरे टेहरी जनपद में मनरेगा के प्रशिक्षण हेतु जान होता था इस प्रकार मनरेगा के कार्यों को समझने व नजदीकी से देखने का अवसर मिला। शुरू के बर्षौं में मनरेगा योजना के प्रति ग्रामीणों का उत्साह देखते को मिलता था विशेष रूप से महिलाओं में। इस योजना की यह भी विशेषता है कि इसमें रोजगार पाने में पुरुष व महिला में कोई भेद नहीं होता। क्योंकि महिलाएं अन्य जगहों जैसे सड़क निर्माण आदि श्रमिक कार्यों हेतु वाहर नहीं निकल पाती थी घर पर ही इस योजना में रोजगार मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार भी आया। संयोगवश वर्ष 2015-16 में मेरी नियुक्ति लोकपाल मनरेगा के पद पर पौड़ी जनपद के लिए हुई। मुझे इस योजना से फिर से जुड़ने का अवसर मिला। अपने लोकपाल मनरेगा जनपपद पौड़ी के कार्यकाल में मैंने अनुभव किया कि लोगों का विशेष रूप से ग्राम प्रधानों का इस योजना के प्रति लगाव कम होने से इच्छुक ग्रामीणों को इस योजना के अंतर्गत रोजगार नहीं मिल पा रहा है। इसके कई कारण मेरे संज्ञान में आये।

योजना के शुरू के बरसों में अधिकतर ग्राम प्रधानों ने अपने परिवार के सभी सदस्यों व नजदीकियां के (जो गांवों में नहीं रहते थे) के जौव कार्ड अधिक संख्या में बनवाये। योजना का पूरा संचालन क्योंकि ग्राम प्रधान के ही हाथ में होता था उसे धन का दुरपयोग करने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। आरटीआइ के माध्यम से ग्रामीणों ने ग्राम प्रधानों से जौव कार्ड धारकों के नाम व पते पूछने शुरू कर दिये इस प्रकार ग्राम प्रधानों के रिस्तेदारों के फर्जी जौब कार्ड कम होते गए। योजना में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से जैसे जैसे कर्मचारियों की बढ़ोतरी होती गयी हिस्सेदारी उतनी बढ़ती गई। रोजगार न मिलने की दशा में आवेदक को वेरोजगारी भत्ता देने का प्राविधान है जिसका भुगतान राज्य सरकार को करना होता है। आवेदक से कार्यक्रम अधिकारी का कार्यालय विना तिथि डाले आवेदन लेता है। जिससे निर्धारित तिथि के बाद आवेदक को बेरोजगारी भत्ता न देना पड़े। आश्चर्यजनक रूप से जबसे मनरेगा योजना चली आंकड़ों के अनुसार राज्य में किसी को भी बेरोजगारी भत्ता नहीं दिया गया याने अभिलेखों में प्रत्येक आवेदक को समय पर योजना में रोजगार उपलब्ध कराया गया।

मेरे द्वारा अपने लोकपाल के कार्यकाल में पौडी जनपद के कोट विकास खण्ड के एक अम्बेडकर गांव में ग्रामीणों से योजना के बारे में वार्तालाप करने का अवसर मिला। इस अवसर पर विकास खण्ड के कर्मचारी ग्राम प्रधान व ग्रामीण जिनमें अधिकतर महिलाएं थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। मैंने ग्रामीणों से योजना के बारे में जानकारी चाही और पूछा कि इस योजना में सब को समय पर रोजगार मिल रहा है सबने एक स्वर में कहा कि हमें विगत छै माह से रोजगार नहीं मिला कुछ गरीब महिलाओं ने तो अपनी व्यथा रोते हुए बताई। मैंने फिर पूछा कि आप लोगों ने रोजगार के लिए आवेदन किया सबने हां भरी। बाद में काफी पूछ ताछ के बाद पता चला कि रोजगार के लिए आवेदन तो लिए गए किन्तु उन पर आवेदन की दिनांक अंकित नहीं करवाई गई थी। मैंने विकास खण्ड के कर्मचारियों से पूछा उन्होंने भी इधर उधर के बहाने बनाने लगे। मैंने ग्राम प्रधान से पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है उनका जवाब था कि मैं विकास खण्ड के चक्कर काटते काटते थक गया में पैसा कहां से दूं इसलिए गांव की योजना की स्वीकृति ही नहीं मिलती। कार्यालय पहुंचे पर मैने कार्यक्रम अधिकारी का स्पष्टीकरण कर एक सप्ताह में कार्य प्रारंभ कराने के निर्देश दिए तब जा के इस गांव में कार्य प्रारंभ हुआ। कहने का अभिप्राय यह है कि जब कानूनी हक प्राप्त योजना से गरीब ग्रामीणों को समय पर योजना का लाभ नहीं मिल पाता तो सामान्य योजनाओं का राज्य में क्या हाल होते होंगे।

मरोड़ा पावो विकास खण्ड, पौड़ी में आयोजित एक कृषि गोष्ठी में सम्मिलित हुआ, गोष्टी में क्षेत्र के कई ग्राम प्रधानों से मनरेगा पर विचार विमर्श का अवसर मिला कई ग्राम प्रधान ऐसे मिले जिनमें कुछ अच्छा करने की सोच थी, मरोड़ा के ग्राम प्रधान ने क्षेत्र में चल रही ग्राम्या योजना के तहत मनरेगा को जोड़ कर अनार व अखरोट की उन्नत किस्मों के दो दो हैक्टर के बड़े-बड़े बाग ग्रामीणों की बंजर पढी जमीन पर विकसित करवाये जिनको मेंने स्वयमं जाकर देखा। मनरेगा योजना में समय-समय पर कुछ जनप्रतिनिधियों व योजना से जुड़े अधिकारी व कर्मचारियों द्वारा किए गए अच्छे कार्य भी चर्चा में रहते हैं।

वार्ता में मरोड़ा क्षेत्र के ग्राम प्रधानों का कहना था कि मनरेगा में मस्टर रोल निर्गत करने से लेकर लाभार्थियों के भुगतान तक बड़ी सम्स्याऐं आती है कार्यक्रम अधिकारी के कार्यालय के कई चक्कर काटते पड़ते हैं तब जाकर भुगतान प्राप्त होता है। मेंने उनसे भुगतान में हो रही कठनाइयों को लिख कर देने को कहा कोई लिख कर देने को तैयार नहीं हुआ कहने लगे हमें अन्य योजनाओं जैसे राज्य वित्त, विधायक निधि, सांसद निधि आदि से उसी कार्यायल के माध्यम से ठेके लेने हैं। सरकारी रिकॉर्ड में तो मनरेगा कार्य उत्तसाहवर्धक लगते हैं पर गांव में पूछने पर पता चलता है कि जरूरत बदों को रोजगार बहुत कम मिलता है।

सौ दिनों के सापेक्ष मात्र औसतन पैंतालीस दिनौं का ही लाभार्थियों को रोज़गार मिल पाता है।

मनरेगा में प्रस्तावित कार्ययोजना ग्रामीणों द्वारा आयोजित खुली बैठक में विचार विमर्श के बाद गांव की आवश्यकता के अनुसार बनाने का प्राविधान है। किन्तु होता इसके विपरीत है अधिकतर ग्राम सभाओं में विकास खण्ड से आये कर्मचारी व गांव के कुछ सम्मानित ग्रामीण (ग्राम प्रधान की नज़र में) एक रात प्रधान की मेहमान नवाजी में आपस में बैठते हैं और हो गयी गांव की विकास योजना तैयार। योजना में सोशल आडिट का प्राविधान है राज्य में सोसल आडिट थर्डपार्टी (ठेके) से कराया जाती है जिसकी नियुक्ति जिले के मुख्य विकास अधिकारी कार्यालय द्वारा होती है। एक दिन गांव में आकर यह औपचारिकता पूर्ण कर ली जाती है कभी कभी तो मुख्यालय में ही सोसल आडिट हो जाता है जिस कार्य का सोसल आडिट करने वाली संस्था से अच्छा खासा भुगतान किया जाता है। कुछ राज्यों में मनरेगा के अंतर्गत अच्छे कार्य हुए हैं। राजस्थान, झारखंड,मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, सिक्किम, हिमांचल आदि कई राज्य है जिन्होंने इस योजना के प्रारम्भ में ही   2008 में अपने राज्यों के ग्रामीण कृषि विकास को देखते हुए समान कार्य  के विभागों के कार्य मनरेगा योजना में जोड़ते हुए अपने राज्य से योजना पास करा कर  भारत सरकार से अनुमोदन उपरांत अपने राज्य के हित में मनरेगा एक्ट में शामिल  करा दिया तथा सभी कार्य सोसल आडिट के अंतर्गत लाये गये जिससे यैजनाऔ के क्रियान्वयन  में पारदर्शिता लाईं जा सके।

उत्तराखंड में ऐसा करने का प्रयास किसी भी सरकार ने नहीं किया। यहां तो एक ही ग्राम सभा में वर्मी कम्पोस्ट पिट का निर्माण – मनरेगा, कृषि विभाग, उद्यान विभाग,जलागम,वन विभाग,ग्राम्या, आजीविका , विभिन्न स्वयंम सेवी संस्थाएं बनाने का दावा करते हैं कितने वर्मी कारपोरेट पिट गांवों में बने हुए दिखाई देते हैं स्तिथि सबके सामने है । इसी प्रकार अन्य कार्यो की स्थति है।  यही नहीं एक ही योजना विभाग की जिला योजना, राज्य सैक्टर, विश्व वैक,वाह्य सहायतित व भारत सरकार की योजनाओं में होती है।

कोरोना काल में जब लाखों की संख्या में प्रवासी अपना स्वयंम का रोजगार छोड़ कर अन्य राज्यों से अपने राज्य उत्तराखंड में आयें हो निश्चित रूप से उन्हें अपने व अपने परिजनों की आजीविका हेतु रोजगार चाहिए। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ही एक मात्र योजना दिखाई देती है जिस में आवश्यकतानुसार सुधार कर लोगों को ग्रामीण रोजगार से जोड़ा जा सकता है।

किन कारणों से मनरेगा जैसी अच्छी योजना के बहुत अनुकूल परिणाम राज्य को नहीं मिल पा रहे हैं।

मुझे सबसे बड़ा कारण राज्य सरकार द्वारा चाहे ओ किसी भी पार्टी की सरकार रही हो योजना का सामाजिक आडिट का प्रभावी ढंग से लागू न करना व समय पर विभिन्न विभागों की कृषि संबंधी समान यौजनाऔं को मनरेगा में समाहित कर एक्ट के दायरे में नहीं लाना है। सोशल आडिट राज्य में कैसे होता होगा आप इसी पता चला सकते हैं कि राज्य में किसी भी आवेदक को वेरोजगारी भत्ता नहीं दिया गया जबकि सोसल आडिट में यह भी देखने का प्राविधान है कि कितनों को बेरोजगारी भत्ता दिया गया ‌। किसी  भी सामाजिक आडिट में यह उजागर नहीं हुआ कि आवेदकों से रोजगार हेतु आवेदन विना तिथि डाले लिए जाते हैं।

सामाजिक अंकेक्षण (ऑडिट) –

भारत में राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम ऐसा प्रथम राष्ट्रीय कानून है, जिसमें  सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया को विधिवत् स्वीकार किया गया है। सामाजिक अंकेक्षण की शुरुआत स्वैच्छिक संस्था “मज़दूर किसान शक्ति संगठन” द्वारा की गयी, जिसमें सरकारी कार्यों एवं व्यय हेतु राजस्थान के रायपुर (पाली) में जन सुनवाई हुई। इसके पश्चात् “हमारा पैसा, हमारा हिसाब” नामक आंदोलन से इस अवधारणा को दुरुस्त किया गया।

 सामाजिक अंकेक्षण से लाभ-

  1. सामाजिक आडिट सामाजिक कल्याण के लिये उठाए गए कदमों के उद्देश्यों और वास्तविकता के बीच अंतर को पाटने का काम करता है।
  2. सामाजिक अंकेक्षण सरकारी धन के उपयोग का गुणवत्तापरक एवं परिमाणात्मक परीक्षण करता है तथा पारदर्शिता बहाल करता है।
  3. यह विकास कार्यों में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करता है तथा इस प्रकार लोकतंत्र एवं स्थानीय स्व-शासन की अवधारणा को मज़बूती प्रदान करता है।
  4. यह जनता को उसके अधिकारों के प्रति जागरूक करता है तथा सरकारी योजनाओं एवं कल्याण कार्यों की सूचना प्रदान करता है।
  5. यह सरकार तथा नौकरशाही को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाता है तथा भ्रष्टाचार को कम करने में सहायता करता है।
  6. यह हाशिये पर स्थित समुदायों तक सरकारी लाभों को पहुँचाने में तथा उनकी शिकायतों के निपटान के लिये एक उपकरण के रूप में कार्य करता है।
  7. सामाजिक अंकेक्षण योजनाओं की निगरानी एवं जनता की आवश्यकताओं के अनुसार उनमें संशोधन करने में सक्षम करता है।

कुछ राज्यों राजस्थान आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, सिक्किम, तमिलनाडु आदि में सामाजिक संगठनों द्वारा सरकार पर दबाव बना कर तथा अन्य में नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति के बलबूते सामाजिक सम्प्रेक्षण को प्रभावी बनाया गया। कहने को उत्तराखंड राज्य में कई सामाजिक संगठन है किन्तु राजस्थान जैसा हमारा पैसा हमारा हिसाब जैसा आन्दोलन राज्य में कोई भी संगठन खड़ा नहीं कर पाया किसी भी सामाजिक संगठन ने योजनाओं में चल रहे भ्रष्टाचार पर अपनी आवाज बुलंद नहीं की लगता है. सभी पार्टियों की सरकारों में राज्य के सभी सामाजिक संगठनों की हिस्सेदारी तय है। हिमाचल प्रदेश ने कोरोना महामारी के कारण वेरोजगारों को रोजगार के अवसर देने के उद्देश्य से ग्रामीण महिलाओं को सतत आजीविका अर्जित करने व समग्र विकास के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से “मुख्यमंत्री एक बीघा योजना” शुरू की गई है। इस योजना के अंतर्गत संगठित स्वयंम सहायता समूहों को लक्षित किया गया है।

  • इच्छुक स्वयंम सहायता समूहों की ऐसी महिलाएं जिनके पास किचन गार्डनिग योग्य परिवारिक भूमि उपलब्ध है ग्राम पंचायत के माध्यम से आवेदन कर सकती हैं।
  • लाभार्थियों को इस योजना का लाभ अधिक तम एक बीघा (चार नाली) जमीन पर किचन गार्डन हेतु प्राप्त होगा।
  • इस योजना में मनरेगा के अंतर्गत स्वीकृत कार्यों में भूमि सुधार, पौधशाला निर्माण, फलदार पौधरोपण, केंचुआ खाद के लिए गड्ढा खोदना व पक्का बनाना आदि शामिल हैं।
  • इस के अतिरिक्त पशुधन आश्रय जैसे गोशाला, बकरी बाडा, मुर्गी बाड़ा निर्माण सम्बन्धित कार्य, जल संचयन व सिंचाई सम्बन्धित कार्य योजना के तहत किये जा सकते हैं।
  • योजना की अधिकतम लागत एक लाख रुपए निर्धारित की गई है। इस धनराशि का प्रबन्धन मनरेगा के अंतर्गत किया जायेगा जिसमें साठ प्रतिशत मज़दूरी तथा चालीस प्रतिशत सामाग्री घटक शामिल हैं।

सुझाव :-

  1. एक सौ दिनों के सापेक्ष एक सौ पचास दिनों का रोजगार दिवस किये जायं।
  2. मनरेगामें मजदूरी कम से कम तीन सौ रुपए की जाय। जैसा कि कई राज्यों ने अपने स्तर से किया है।
  3. हिमाचल प्रदेश की तरह चार नाली याने एक बीघा जमीन पर व्यक्तिगत/ समूहों हेतु योजनाएं बनाई जाय।
  4. सौसियल औडिट में पारदर्शिता लाई जाय। इसके लिए अन्य राज्यों जैसे राजस्थान, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, मेघालय , सिक्किम आदि राज्यों की तरह किसी सामाजिक आडिट हेतु स्वतंत्र इकाई का गठन किया जाय।
  5. ग्रामीण विकास की विभिन्न विभागों की समान योजनाओं को एक कर मनरेगा के अंतर्गत लाने का प्रस्ताव भारत सरकार के अनुमोदन हेतु भेजा जाय जिससे योजनाएं मनरेगा में सामाहित हो सकें जिससे उनको सामाजिक आडिट के दायरे में लाया जा सकें।
  6. ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य एवं जिला पंचायत के सभी सदस्यों को अपने हित छोड़ कर सेवा भाव से कोरोना काल में वे सहारा लोगों को सहारा याने रोजगार देने के प्रयास करने चाहिए।
  7. क्योंकि ग्राम प्रधान का मनरेगा योजना के संचालन में महत्वपूर्ण योगदान होता है अतः उन्हें सेवा भाव से योजना का संपादन करना चाहिए।
  8. पंचायती राज संस्थानों को मनरेगा के तहत किये जा रहे कार्यों के नियोजन, कार्यान्वयन और निगरानी हेतु उत्तरदायी बनाया गया है। इसलिए जनप्रतिनिधियों का नैतिक दायित्व बनता है कि संकट की इस घड़ी में मनरेगा से जुड़े सभी कर्मचारी अधिकारियों पर निगरानी रखें जिससे पारदर्शिता आ सके।
  9. चूंकि राज्य सरकारें बेरोजगारी भत्ता देती हैं, उन्हें श्रमिकों को रोजगार प्रदान करने के लिए भारी प्रोत्साहन दिया जाता है।
  10. आवेदकों से बिना तिथि डाले आवेदन लेने बन्द किए जायं जिससे राज्य सरकार पर योजना में शीघ्र धन आवंटन करने का दबाव बना रहेगा।
  11. लाभार्थियों में जागरूकता, साक्षरता, एकजुटता और प्रतिरोध की क्षमता का अभाव के कारण इस योजना में पारदर्शिता नहीं आ पाई है।
  12. प्रवासियों को ग्रामीणों के साथ मिलकर संगठित होकर योजना के पारदर्शी क्रियान्वयन के लिए मनरेगा में रोजगार हेतु प्रयास करने होंगे।

लेखक:
डॉ. राजेंद्र कुकसाल (पूर्व लोकपाल मनरेगा)
पौड़ी गढ़वाल।

कृपया ध्यान दें : उत्तराखंड में मास्क नहीं पहनने पर होगा 5000 रुपये जुर्माना या 6 महीने की जेल

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face mask compulsory in uttarakhand

देहरादून : उत्तराखंड में कोरोना से बचाव एवं रोकथाम के मद्देनजर मास्क नहीं पहनने और शारीरिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग) के नियमों का उल्लंघन करने पर अब 6 माह की सजा या 5000 रुपये जुर्माना अदा करना होगा। राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने आज महामारी अधिनियम 1897 उत्तराखंड राज्य संशोधन अध्यादेश को स्वीकृति प्रदान कर दी। शनिवार को राज्यपाल ने महामारी अधिनियम1897 में संशोधन करते हुए राज्य संशोधन अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। धारा 2 व् 3 संशोधित होकर अब से राज्य में कोविड-19 के तहत राज्य में फेस मास्क को जरूरी करते हुए क्वारंटीन नियमो को कड़ा करते कर दिया गया है। जो इस अध्यादेश का उल्लंघन करता पाया जाता है उसे 6 महीने की जेल या 5000 रुपये का जुर्माना भरना पडेगा। इस एक्ट में कम्पाउंडिंग सुविधा भी नहीं है। सीधा जेल होगी। यह इसलिए भी किया गया है क्योंकि लोग बिना मास्क के सड़कों-बाज़ारों में घूम रहे थे। इसके बाद राज्य में ये कड़ा नियम बनाया गया है। जो आज से ही लागू माना जाएगा। महामारी अधिनियम में बदलाव करने वाला केरल व उड़ीसा के बाद उत्तराखंड तीसरा राज्य बन गया  है।

उत्तराखंड में आज कोरोना के 61 नये केस, 02 मरीजों की मौत, 1785 हुई संक्रमितों की संख्या

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देहरादून : उत्तराखंड में भी कोराना का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है। ज्यादातर मामले महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा, यूपी, राजस्थान आदि राज्यों से आने वाले प्रवासियों से आ रहे हैं। बीते कुछ दिनों से लगातार कई कोरोना संक्रमित मरीज मिल रहे हैं। विभिन्न राज्यों से वापस लौटे प्रवासियों के बाद अब स्थानीय स्तर पर भी कोरोना संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। चिंता इस बात को लेकर भी कि कोरोना के खिलाफ छिड़ी जंग में फ्रंटलाइन पर खड़े कोरोना वारियर्स डॉक्टर्स, स्वास्थ्य कर्मियों के अलावा पुलिस के जवान भी इस जानलेवा वायरस की चपेट में आ रहे हैं। शनिवार को भी प्रदेश में कोरोना के 61 नये मामले मिले हैं। जिसके बाद राज्य में अब संक्रमित मरीजों की संख्या बढक़र 1785 हो गई है। हालांकि कुल संक्रमित मरीजों में से अब तक 1077 (60 प्रतिशत से अधिक) लोग स्वस्थ्य होकर अस्पतालों से डिस्चार्ज हो चुके हैं। जबकि विभिन्न अस्पतालों में 708 एक्टिव मरीज चिकित्सकों की निगरानी में भर्ती हैं। वहीँ अब तक कोरोना से 23 मरीजों की मौत भी हो चुकी है। स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार शनिवार दोपहर में 35 मामले सामने आये हैं। वहीँ रात 9 बजे आई रिपोर्ट में 26 और लोगों में कोरोना की पुष्टि हुई है।

आज सबसे ज्यादा टिहरी गढ़वाल में 23 लोगों कोरोना की पुष्टि हुई है। जिनमे से ज्यादातर लोग बाहरी राज्यों से यहाँ लौटे हैं। इसके अलावा देहरादून में 12, पौड़ी गढ़वाल में 09, उधमसिंह नगर में 05, हरिद्वार में 04, उत्तरकाशी में 04, चमोली में 03 तथा रुद्रप्रयाग में एक शख्स में कोरोना की पुष्टि हुई है।

रंग लाई 11 वर्ष की कठिन तपस्या, श्रीनगर गढ़वाल का युवा बना भारतीय सेना में अधिकारी

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श्रीनगर गढ़वाल : उत्तराखंड के देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) से पास आउट होकर आज 333 युवा अफसर भारतीय थल सेना में शामिल हो गए हैं। शनिवार सुबह आईएमए देहरादून में पासिंग आउट परेड हुई जिसमें 423 अफसरों ने हिस्सा लिया। इनमें से 90 जेंटलमैन कैडेट्स 9 अलग-अलग देशों के हैं। पासिंग आउट परेड में शामिल होकर सैन्य अधिकारी बने इन्हीं युवा कैडेट में से एक कैडेट श्रीनगर गढ़वाल निवासी अभिषेक भट्ट भी है। जिसे 11 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद आज भारतीय सेना में बतौर सैन्य अधिकारी शामिल होने का गौरव प्राप्त हुआ है।

मूलरूप से श्रीनगर गढ़वाल के शीतला माता मन्दिर मार्ग, भक्तियाना, निवासी अभिषेक भट्ट के पिता बिजेंदर भट्ट ने बताया कि अभिषेक में बचपन से ही देश सेवा का जज्बा था। उन्होंने बताया कि अभिषेक भारतीय सेना में बतौर सैन्य अधिकारी शामिल होने का सपना लेकर वर्ष 2009 में अपने घर से दूर सैनिक स्कूल में चले गए थे, और आज 11 साल की कड़ी मेहनत के बाद उनका यह सपना पूरा हुआ है।

उन्होंने बताया कि अभिषेक ने पांचवी तक की पढ़ाई सेंट टेरेसा कॉन्वेंट स्कूल श्रीनगर से करने के पश्चात वर्ष 2009 में छठवीं कक्षा में सैनिक स्कूल घोड़ाखाल (नैनीताल) में दाखिला लिया। तथा वर्ष 2016 में सैनिक स्कूल घोड़ाखाल से इंटरमीडिएट करने के पश्चात उसका चयन एनडीए पुणे के लिए हुआ। और मई 2019 में एनडीए पुणे से पास आउट होने के पश्चात IMA देहरादून में एक वर्ष का प्रशिक्षण पूर्ण करने पर आज भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त हुआ। अभिषेक के अंदर बचपन से ही आसमान में उड़ते फाइटर जहाजों को देखकर एयरफोर्स में जाने की उत्सुकता थी, उसका फाइटर प्लेन उड़ाने हेतु एसएसबी में एयर फोर्स हेतु चयन भी हो गया था किंतु मेडिकल में हाइट कम होने के कारण आर्मी या नेवी हेतु सिलेक्शन हुआ। अभिषेक ने आर्मी का चयन किया। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत युवा सैन्य अधिकारी अभिषेक भट्ट का पैतृक गांव ग्राम सांपला, पट्टी रावतस्यूं, देहलचौरी, पौड़ी गढ़वाल है। अभिषेक के पिता बिजेंदर भट्ट पूर्व में बीआरसी पौड़ी में समन्वय के पद पर एवं वर्तमान में जूनियर हाई स्कूल चंदोलाराई विकासखंड पौड़ी में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। जबकि माताजी श्रीमती परमेश्वरी भट्ट श्रीशारदा बाल एकेडमी आंचल डेरी उफल्डा में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत हैं। अभिषेक की बड़ी बहन अभिलाषा भट्ट वीर चंद्र सिंह गढ़वाली राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीकोट श्रीनगर में फाइनल वर्ष में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही है। देवभूमि संवाद की ओर से अभिषेक भट्ट एवं उनके पूरे परिवार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

तीन माह की फीस माफी समेत अन्य मुद्दों को लेकर अभिभावक संघ का हल्ला बोल आंदोलन, जिला प्रशासन के माध्यम से मुख्यमंत्री तक अपनी मांग पहुंचाएगें अभिभावक

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ग्रेटर नोएडा : लॉकडाउन की अवधि की तिमाही फीस की माफी को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहा अभियान जारी है। इसके साथ ही ऑनलाइन क्लास से छोटे बच्चों को हो रहे नुकसान को लेकर भी विरोध शुरू हो गया है। निजी स्कूलों की मनमानी के विरोध में उतरे विभिन्न अभिभावक संघों के लोग आज देशव्यापी स्तर पर हल्ला बोल आंदोलन करेंगे। हल्ला बोल आंदोलन में (ग्रेटर नोएडा-नोएडा-गाजियाबाद अभिभावक महासंघ) जीएनजी पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रकाश कोटिया, हेम चंद तिवारी, अनिल पुंडीर, योगेश भगौर, चन्जीत, दुर्गेश, रजनीश, अमित अरोड़ा आदि लोग भी शामिल होंगे। जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंप, सरकार तक बात पहुंचाई जाएगी। बता दें कि जीएनजी पेरेंट्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने बीते 6 जून को गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी से मुलाकात कर सरकार तक अपनी आत पहुंचाने की मांग की थी। अभिभावक संघ की मांग है कि लॉकडाउन अवधि की तिमाही फीस माफ की जाए। छोटे बच्चों की ऑनलाइन क्लास पर रोक लगे। अभिभावकों का कहना है कि इससे बच्चों को नुकसान हो रहा है। छोटे बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लास को कोई फायदा नहीं है। एक देश एक शिक्षा, एक बोर्ड और एक ही पाठ्यक्रम लागू किया जाए। कोरोना वायरस के बढ़ते केस को देखते हुए ज्यादातर अभिभावकों का कहना है कि वर्तमान स्थिति को देखकर सितंबर माह तक स्कूलों को ना खोला जाए, उसके बाद स्थिति को देखकर आगे का निर्णय लिया जाए। सोशल मीडिया पर स्कूलों की मनमानी के खिलाफ अभियान चला रहे अभिभावकों का यह भी कहना है कि स्कूल प्रशासन अपने सरप्लस खातों के माध्यम से अपने अध्यापकों व अन्य कर्मचारियों को बिना किसी देरी के सैलरी दें, जिससे कि उन्हें परेशान न हो।

देहरादून के क्वारेंटाईन सेंटर में युवक के आत्महत्या पर नोडल अधिकारी व डाक्टर को निलंबित करने के मुख्यमंत्री ने दिए निर्देश

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जिलाधिकारियों को प्रभावी सर्विलांस के निर्देश

लोगों में व्यवहारात्मक परिवर्तन लाते हुए फिजीकल डिस्टेंसिंग, मास्क, स्वच्छता को आदत में लाना है।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने सचिवालय में वीडियो कांफ्रेंसिग द्वारा जिलाधिकारियों के साथ प्रदेश में कोविड-19 की स्थिति की समीक्षा की।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आशा व आंगनबाङी कार्यकत्रियों की सहायता से सर्विलांस को बढाएं। यह सर्विलांस नियमित रूप से होना है। वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप लोगों में व्यवहारात्मक परिवर्तन लाने होंगे। देहरादून के क्वारेंटाईन सेंटर में युवक के आत्महत्या पर संबंधित नोडल अधिकारी व डाक्टर को निलंबित किया जाए। कोविड-19 से संबंधित हर मृत्यु की ऑडिट कराई जाए। शनिवार को मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने सचिवालय में वीडियो कांफ्रेंसिग द्वारा जिलाधिकारियों के साथ प्रदेश में कोविड-19 की स्थिति की समीक्षा की।

कोविड-19 से संबंधित लक्षण पर अनिवार्य तौर पर सेम्पलिंग

मुख्यमंत्री ने कहा कि आशा व आंगनबाङी कार्यकत्रियों की सहायता से सर्विलांस को बढाएं।

सर्विलांस में जिन लोगों में कोविड-19 से संबंधित लक्षण दिखाई दें, उनकी हेल्थ टीम के माध्यम से अनिवार्य रूप से सेम्पलिंग कराई जाए। फ्रंटलाईन वर्कर्स को आवश्यकताअनुसार  थर्मल स्कैनर, फेस शील्ड, पीपीई किट, मास्क आदि जरूर उपलब्ध कराए जाएं। इससे उनका कार्य के प्रति उत्साह बढ़ता है। ओपीडी में ड्यूटी करने वाले चिकित्सकों को भी फेस शील्ड उपलब्ध हों।

लोगों में व्यवहारात्मक परिवर्तन लाने होंगे

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप लोगों में व्यवहारात्मक परिवर्तन लाने होंगे। इसके लिए आईईसी कार्यक्रम संचालित करें।  फिजीकल डिस्टेंसिंग, मास्क का अनिवार्यता से उपयोग, नियमित रूप से हाथ धोना आदि बातों को आदत में लाना होगा। बाजारों में एक जगह पर भीड़ को सख्ती से नियंत्रित किया जाए।

कोविड-19 से संबंधित हर डेथ का आडिट

मुख्यमंत्री ने  देहरादून के क्वारेंटाईन सेंटर में युवक के आत्महत्या पर संबंधित नोडल अधिकारी व डाक्टर को निलंबित करते हुए जांच के निर्देश दिये। देहरादून में एक गर्भवती महिला की इलाज न मिलने पर मृत्यु की भी शीघ्र जांच की जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों, गम्भीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों पर विशेष ध्यान दिया जाए। कन्टेनमेंट जोन में पूरी सख्ती रखी जाए। कान्टेक्ट ट्रेसिंग बहुत महत्वपूर्ण है। कोविड-19 से संबंधित हर डेथ का आडिट किया जाए। हर मृत्यु के कारण का विश्लेषण किया जाए। कोविड केयर सेंटर में सारी आधारभूत सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं। क्वारेंटाईन सेंटर में भी सुविधाएं उपलब्ध हों। यह सुनिश्चित किया जाए कि होम आइसोलेशन में सारे प्रोटोकोल का पालन हो। डिस्चार्ज कर होम आइसोलेशन में भेजे जाने वालों की काउंसिल की जाए।

कोविड-19 से संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु पर अंतिम संस्कार सम्मानजनक तरीके से हो

मुख्यमंत्री ने कहा कि कोरोना संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु पर उसके अंतिम संस्कार में विवाद न हो। लोगों को इस संबंध में जारी दिशानिर्देशों की जानकारी दी जाए। मृत्यु के बाद भी व्यक्ति का सम्मान बरकरार रहना चाहिए। मुख्यमंत्री ने हल्द्वानी व हरिद्वार में विद्युत शव-दाह गृह का कार्य शुरू करने के निर्देश देते हुए देहरादून में भी शव-दाह गृह की घोषणा की।

जिला स्तर पर अधिकार

मुख्यमंत्री ने कहा कि धन की कोई समस्या नहीं है। आवश्यकता अनुसार कार्मिकों की नियुक्ति के लिए जिलाधिकारियों को अधिकार दिए गए हैं। इसी प्रकार आवश्यक चिकित्सा संबंधित उपकरणों के क्रय के लिए भी अधिकार दिए गए हैं।

होम क्वारेंटाईन में प्रोटोकॉल का पालन

मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह ने कहा कि हर केस को पूरी गम्भीरता से लिया जाना है। होम क्वारेंटाईन के लिए डिस्चार्ज करने से पूर्व पूरी तरह आश्वस्त हो जाएं कि घर में मानकों के अनुरूप सारी व्यवस्थाएं उपलब्ध हों। सर्विलांस को बढाया जाना है।

पेशेंट केयर मेनेजमेन्ट से मृत्यु दर पर नियंत्रण

सचिव अमित नेगी ने कहा कि अगले 15-20 दिन हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। हमारी रिकवरी रेट और डबलिंग रेट में सुधार हो रहा है। एक्टिव केस लगभग स्थिरता की ओर जा रहे हैं। पेशेंट केयर मेनेजमेन्ट पर अधिक ध्यान दिया जाए। कोविड-19 के अलावा सामान्य चिकित्सा भी प्रभावित नहीं हो। लोगों को सामान्य इलाज मिलता रहे।

प्रदेश में आने वालों का ऑनलाइन पंजीकरण जरूरी

सचिव शैलेश बगोली ने कहा कि बाहर से प्रदेश में आने वालों के लिए ऑनलाइन पंजीकरण कराना अनिवार्य है। इससे भविष्य में उन्हें ट्रेक करने में आसानी होगी।

वीडियो कांफ्रेंसिग में आयुक्त कुमाऊँ अरविंद सिंह ह्यांकी, आयुक्त गढवाल रविनाथ रमन, सचिव डाॅ पंकज पाण्डेय, सहित अन्य अधिकारी व जिलाधिकारी उपस्थित थे।