पौड़ी गढ़वाल: उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की गग्वाड़स्यूं पट्टी में लगने वाले ऐतिहासिक एवं प्रसिद्ध मोरी मेले का मंगलवार 7 जुलाई को भव्य समापन होगा। 12 वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित हो रहे इस ऐतिहासिक मेले के अंतिम दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं, प्रवासी ग्रामीणों और क्षेत्रवासियों के पहुंचने की संभावना है। आयोजन समिति ने समापन दिवस की सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं।
मोरी मेला पौड़ी गढ़वाल के तमलाग गांव में आयोजित होने वाला क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्सव है। यह मेला अपनी प्राचीन परंपराओं, लोक आस्था और पांडव संस्कृति से जुड़े अनुष्ठानों के लिए विशेष पहचान रखता है। हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाले इस मेले में उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले प्रवासी ग्रामीण भी बड़ी संख्या में अपने पैतृक गांव पहुंचकर परंपराओं का निर्वहन करते हैं।
मेले के दौरान पारंपरिक ढोल-दमाऊं की गूंज, लोकनृत्य, धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय और उत्सवमय वातावरण में रंग दिया है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और पारिवारिक मिलन का भी महत्वपूर्ण अवसर है।
समापन दिवस पर विशेष पूजा-अर्चना, पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। आयोजन समिति ने श्रद्धालुओं से अनुशासन बनाए रखते हुए अधिक से अधिक संख्या में मेले में शामिल होने की अपील की है।
चीड़ का पेड़ उखाड़ने की है अनोखी परंपरा
मोरी मेले का सबसे अनूठा आकर्षण चीड़ का पेड़ उखाड़ने की सदियों पुरानी परंपरा है। इस परंपरा का निर्वहन कुंडी गांव और तमलाग गांव (ससुराल पक्ष) के ग्रामीण करते हैं। मान्यता के अनुसार जिस व्यक्ति पर हनुमान जी का पश्वा (दैवी अवतार/आवेश) आता है, वही विशाल चीड़ के पेड़ पर चढ़कर उसे उखाड़ता है। यह दृश्य मेले का सबसे रोमांचक और श्रद्धा का केंद्र माना जाता है, जिसे देखने के लिए हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से पहुंचते हैं। पेड़ उखाड़ने के बाद दोनों गांवों के ग्रामीण पारंपरिक वाद्य यंत्रों और जयघोष के साथ शोभायात्रा निकालते हैं। इस दौरान तमलाग गांव का चीड़ का पेड़ भगवान भैरवनाथ मंदिर में तथा कुंडी गांव का चीड़ का पेड़ नागराजा मंदिर में स्थापित किया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह परंपरा क्षेत्र की आस्था, सांस्कृतिक विरासत और दोनों गांवों के आपसी संबंधों का प्रतीक है, जिसका निर्वहन पीढ़ियों से किया जा रहा है।
पांडवों की याद में होता है मोरी मेला
क्षेत्रवासियों के अनुसार आज से पांच हजार साल पहले जब पांडव ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान शिव की खोज में निकले थे। इस दौरान अपना कुछ समय उन्होंने गढ़वाल में बीताया।
मान्यता है कि तब वह कुछ समय इस क्षेत्र में भी रहे। इस क्षेत्र के लोगों के व्यवहार ने पांडवों को काफी प्रभावित किया। जिससे पांडवों की जननी कुंती को गवाड़स्यूं पट्टी के तमलाग गांव अपना ससुराल जैसा और कुंडी गांव अपना मायका जैसा लगा।
तब से क्षेत्र के लोग हर 12 साल में पांडवों की याद में मोरी मेले का आयोजन करते हैं। मेला समिति के चंद्र मोहन नैथानी बताते हैं कि इस मेले को लेकर पांडवों पर आधारित कई कहानियां जुड़ी हैं।
मोरी मेला गढ़वाल की समृद्ध लोक संस्कृति, आस्था और परंपराओं का जीवंत प्रतीक माना जाता है। क्षेत्र के लोग इसे “गग्वाड़स्यूं का महाकुंभ” भी कहते हैं, क्योंकि यह आयोजन 12 वर्षों में एक बार होता है और इसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।



