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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर 12 मार्च को दिल्ली के गढ़वाल भवन में उत्तराखंड की इन 11 महिलाओं को मिलेगा “कल्याणी सम्मान 2023”

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कल्याणी सम्मान 2023: विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी कल्याणी सामाजिक संस्था द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में आगामी 12 मार्च 2023 को गढ़वाल भवन नई दिल्ली में एक भव्य सम्मान समारोह आयोजित किया जा रहा है। यह कार्यक्रम उन महिलाओं के सम्मान में है, जिन्होंने विकट परिस्थितियों से लड़़कर समाज में एक इतिहास रचा, जो लगातार अपने कार्यो से प्रेरणा बनी। देश व समाज के लिए, उसी मातृशक्ति में नई ऊर्जा प्रवाहित करने के लिए लगातार चौथी बार महिलाओं द्वारा इस सम्मान समारोह का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि ले अलावा विशिष्ट अतिथि होंगे।

मुख्य अतिथि: मीना राणा (सुप्रसिद्ध उत्तराखंडी लोक गायिका) ।

विशिष्ट अतिथि: लक्ष्मी रावत (संस्थापक – प्रज्ञा आर्ट्स, वरिष्ठ निर्देशक एवम् रंगकर्मी, शिक्षाविद, परामर्शदाता, कथाकार), पूनम सती (लोक गायिका), गीता उनियाल (अभिनेत्री – उत्तराखंड चित्रपट), रेशमा शाह (लोक गायिका) ।

इस बार निम्नलिखित महिलाऐं “कल्याणी सम्मान” के लिए चयनित हुई हैं।

  1. सुश्री कविता बिष्ट, रामनगर, जिला नैनीताल
  2. सुश्री भावना वर्मा, सदर बाजार, लैंसडाउन, जिला पौड़ी गढ़वाल
  3. सुश्री दीपा नगरकोटी (गायिका), गांव फरसाली, जिला बागेश्वर
  4. सुश्री सरिता नेगी, ग्राम- गांधीग्राम, घुड़दौड़ी, जिला-पौड़ी गढ़वाल
  5. सुश्री गीता गैरोला, न्यू लदाडी़ विकास भवन, ब्लॉक भटवाड़ी, जिला उत्तरकाशी
  6. सुश्री सुषमा बहुगुणा, ग्राम साबली, जिला टिहरी गढ़वाल
  7. सुश्री मधु खुगशाल, ग्राम बैगवाडी, जिला पौड़ी गढ़वाल
  8. सुश्री प्रियंका जोशी, ग्राम मल्ली बमोरी, जिला नैनीताल
  9. सुश्री पूनम कैंतुरा, ग्राम गिंवाली, पोखड़ा, जिला पौड़ी गड़वाल
  10. सुश्री महेश्वरी देवी, ग्राम थनूल, जिला पौड़ी गढ़वाल
  11. सुश्री ऋतु सिंह (कवियित्री), पौड़ी, जिला पौड़ी गढ़वाल

कल्याणी सामाजिक संस्था की अध्यक्षा बबीता नेगी का कहना है कि जब एक नारी बखूबी अपने कार्यों को मंजिल तक पहुँचाती है तो वो गुमनाम क्यों रहे, क्यों न उसे एक सम्मान का अधिकारी बना सशक्त किया जाए। यह हम जैसी महिलाओं के लिये गौरवपूर्ण क्षण हैं कि उन सभी मातृशक्ति को सम्मानित करें, जो आज अपने कार्यों द्वारा समाज में अपनी अलग पहचान बनाये हुए हैं।

वे आगे बताती हैं कि जैसा कि सब जानते हैं कि उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति कैसी है और बहुत बड़ा क्षेत्र बहुत दुर्गम है, फिर भी हमारी बहनें हर परिस्थिति का सामना करते हुए उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। अतः हमारा प्रयास है कि उत्तराखंड के हर कोने से हम ऐसी महिलाओं को सम्मानित करें। इस बार जो महिलाएं चयनित हुई हैं वे उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों से हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक व साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं।

जैसा कि हमारी संस्था का नाम ही “कल्याणी” है जो नारी शक्ति को एक शब्द में परिभाषित करता है। हमारा प्रयास है कि समाज कल्याण के लिए कार्य करने वाली हर उस महिला को सम्मान मिले जो इस ‘कल्याणी’ शब्द को सार्थक करती है। हम सम्मान प्राप्त करने वाली सभी महिलाओं को मुबारकबाद देते हैं तथा उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।

“गढ़वाली भाषा और नरेंद्र सिंह नेगी”: दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में संवाद कार्यक्रम में लेखक, साहित्यकारों सहित सैकड़ों प्रवासी उत्तराखंडी रहे मौजूद, तीन पुस्तकों का हुआ लोकार्पण

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world book fair :दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में शुक्रवार को विनसर पब्लिकेशन और धाद द्वारा एक संवाद आयोजित किया गया। गढ़वाली भाषा में यहां पहला संवाद था जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित भाषा और साहित्य के मंच पर आयोजित किया गया। इस संवाद कार्यक्रम में उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक गायक गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी की तीन पुस्तकों का भी लोकार्पण किया गया। इस संवाद का विषय था “गढ़वाली भाषा और नरेंद्र सिंह नेगी” इस संवाद में देश भर से गढ़वाली भाषा में काम करने वाले लेखकों, साहित्यकारों और मातृभाषा अभियान को चलाने वाले लोगों ने प्रतिभाग किया।

गढ़वाली भाषा के संवाद कार्यक्रम में विचार व्यक्त करते हुए लोकगायक गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि गढ़वाली भाषा व्यापक अर्थ रखती है और इस पर विचार रखने के लिए मैं अधिकृत नहीं हूं क्योंकि मैं कोई भाषाविद नहीं हूं। हां अगर यह विषय गढ़वाली गीत और नरेंद्र सिंह नेगी होता तो मैं कुछ कह सकता था लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि  हमारे पूर्वजों ने हमें  संपति के रूप में हमें सिर्फ अपने खेत और मकान ही नहीं दिये कोई पूर्वजों ने हमें अपनी भाषा भी विरासत में दी है वह भी हमारी पैतृक सम्पत्ति है। भाषा को भी पूंजी की तरह लिया जाना चाहिए उसे आत्मसात किया जाना चाहिए स्वीकार किया जाना चाहिए तभी हम समृद्ध हो पाएंगे ।

नेगी ने कहा कि हमारी भाषा में जो हमारा लोक ज्ञान- विज्ञान है अगर हम अपनी भाषा को भूल जाएंगे तो पर्वतीय अंचल हिमालय क्षेत्र के ज्ञान की जो परंपरा है वह खंडित तो जाएगी। जडी- बूटियों से संबंधित जो ज्ञान है वह खंडित हो जाएगा खारिज हो जाएगा यह तभी बचा रह सकता है जब भाषा बची रहेगी। हमारी भाषा में जो शब्दों की ताकत है वह बहुत ही सशक्त है।

इस संवाद कार्यक्रम में नरेंद्र सिंह नेगी की कविता पोथी अब, जबकि का लोकार्पण किया गया। इस कविता संग्रह में उनकी सैंतीस कविताएं संकलित हैं। जिनमें हृदयाघात के दौरान अस्पताल के आईसीयू मे लिखी गई कविता “डट्यूं छौं मि” भी शामिल है।

गढ़वाली भाषा की संजीदा कवियित्री बीना बेंजवाल ने कहा कि नरेंद्र सिंह नेगी ने नारी पीड़ा को स्वर दिये। उन्होंने अपनी रचनाओं में पहाड़ की नारी की व्यथा को वाणी भी और उसकी मन के भावों को उद्घाटित किया।

इस कार्यक्रम में प्रसिद्ध भाषाविद साकेत बहुगुणा ने कहा कि नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों में जिस तरह की भाषा का प्रयोग होता है वह अपने आप में एक साक्ष्य है कि गढ़वाली भाषा कितनी समृद्ध है और उस भाषा की शब्द संपदा कितनी महत्वपूर्ण है और उसकी सामर्थ्य क्या है। गढ़वाली भाषा में कई जगह दो-दो क्रियाएं एक साथ प्रयोग की जाती हैं, जो दुनिया की बिरली भाषाओं में ही प्रयोग होती हैं। यहां यह इस बात का प्रमाण है कि गढ़वाली भाषा व्याकरणीय रूप से कितनी समर्थ है  यह भाषा की अपनी संपदा है।

संवाद कार्यक्रम में  लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी की दूसरी पुस्तक “तेरी खुद तेरु ख्याल” का लोकार्पण किया गया इस पुस्तक में तेरह फिल्मों की 68 गीत संकलित हैं। इस पुस्तक में घरजवैं,बेटी ब्वारी, बंटवारु, चक्रचाल, छम्म घुंघरु, फ्योंलि ज्वान ह्वेगे, जै धारी देवी, औंसी की रात, मेरी गंगा होली मैंमू आली, सुबेरो घाम, मेजर निराला और बथौं फिल्म के गीत संकलित हैं। पुस्तक में जहां गीत संकलित वहीं गढ़वाली फिल्मों से संबंधित जानकारी भी पाठकों को मिलती है।

इस कार्यक्रम में विचार व्यक्त करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता दिगमोहन सिंह नेगी ने कहा कि नई पीढ़ी नेगी जी के गीतों से अपनी भाषा को समझती है । प्रवासियों को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है ।ये गीत लोक परंपराओं को जानने और समझने का अवसर देते हैं। उत्तराखण्ड से बाहर रह रहे गढ़वाली समाज के लोग नरेंद्र सिंह नेगी जी के गीतों से ही अपने इतिहास को भी जानते हैं। नेगी सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं लिखते बल्कि वह उत्तराखंडी चिंता और चिंतन को भी अपने गीतों मिलाते हैं नरेंद्र सिंह नेगी ऐसे गीतकार गायक हैं जिन्होंने गंगा के मेली होने की बात सबसे पहली की। उन्होंने गंगा की स्वच्छता की लिए चलाई जाने वाली परियोजनाओं, अभियानों की शुरुआत से पहले ही गंगा के गंदे होने की बात अपने गीतों में कर दी थी। उनका गंदळु कैरि यालि तेरु छाळु पाणि गंगा जी गीत बहुत ही लोकप्रिय और प्रसिद्ध है।

इस अवसर पर दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं प्रसिद्द समाजसेवी संजय शर्मा दरमोड़ा ने कहा कि नरेंद्र सिंह नेगी ऐसे रचनाकार और गायक हैं, जिन्होंने हिमालय के हिमशिखरों को सोने और चांदी से अलंकृत किया, उनके पास ऐसी सौन्दर्य दृष्टि है। इससे पता चलता है कि वह प्रकृति के साथ कैसे तादात्म्य स्थापित करते हैं जो अपनी तरह का अद्भुत और अनूठा है।

दिल्ली और एनसीआर में गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषा की कक्षाएं संचालित करने वाले डॉ. विनोद बछेती ने कहा कि  हमने अपनी भाषा के प्रति यह संवेदनशीलता नरेंद्र सिंह नेगी जी और उनके गीतों को सुनकर ही महसूस की और लगा कि हमें अपनी भावी पीढ़ी को अपनी भाषा की जानकारी देनी चाहिए। उत्तराखंडी समाज और उत्तराखंड समाज की भावी पीढ़ी के लिए भी यह बहुत आवश्यक है । हम ग्रीष्मावकाश में इस कार्य को अपनी जिम्मेदारी और जरूरी सामाजिक कार्य समझते हुए करते हैं।ग्रीष्मावकाश के दौरान नई पीढ़ी को भाषा से जोड़ने के लिए चालीस स्थानों पर मातृभाषा की कक्षाएं संचालित थी जाती हैं।

गढ़वाली भाषा पर आयोजित इस संवाद कार्यक्रम में नरेंद्र सिंह नेगी के एक सौ एक गीतों की पुस्तक “तुम दगड़ि ये गीत राला” भी लोकार्पित की गई। इस पुस्तक में उनके तमाम जनगीतों के साथ बहुत ही प्रसिद्ध नौछमी नारैण गीत भी सम्मिलित है। इस संवाद कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध मंच संचालक एवं वरिष्ठ पत्रकार गणेश खुगशाल गणी ने किया।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर चढ़ा होली का रंग, दोनों  पर्व एक दिन पड़ने से उलझन में महिलाएं, किचन संभाले या अपना सबसे महत्वपूर्ण दिवस मनाएं

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इस बार 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के साथ रंगों का पर्व होली भी धूमधाम के साथ मनाई जाएगी। वूमेन फेस्टिवल और रंगों का पर्व एक दिन पड़ने की वजह से महिलाएं कुछ असमंजस में है। होली का सुनते ही पकवान, पूड़ी कचौड़ी, खीर, दही-बड़े, पापड़ और सबसे महत्वपूर्ण त्योहार की शान गुझिया बनाई जाती है। खास बात यह है कि इन सब पकवानों को स्वादिष्ट एक महिला ही बना सकती है। अब महिला उधेड़बुन में है कि वह अपना सबसे बड़ा और सम्मान देने वाला पर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया या किचन में जाकर होली के पकवान बनाएं। लेकिन समझदार नारी ने महिला दिवस और होली पर्व को एक साथ कैसे सेलिब्रेट करें सोच रखा है, यही आज की महिलाओं की समझदारी भी है।

इस बार देश की महिलाएं कुछ उदास और असमंजस में भी हैं। पूरे साल में 8 मार्च की तारीख ऐसी होती है जिसमें महिलाएं चारदीवारी और चौका-चूल्हे से निकलकर अपना सबसे बड़ा पर्व ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ सेलिब्रेट करती हैं। इस दिन महिलाओं के विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धियों का बखान भी किया जाता है। ‌अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर भारत समेत विश्व भर में कार्यक्रम धूमधाम के साथ आयोजित किए जाते हैं। लेकिन इस बार महिलाओं में असमंजस इसलिए है कि 8 मार्च को ही रंगों का पर्व होली भी पड़ रहा है। होली का त्योहार सुनते ही पकवान, पूड़ी कचौड़ी, खीर, दही-बड़े, पापड़ और सबसे महत्वपूर्ण होली की शान गुझिया बनाई जाती है। सबसे खास बात यह है कि इन सब पकवानों को स्वादिष्ट एक महिला ही बना सकती है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस बुधवार को पड़ रहा है। उसी दिन होली भी खेली जाएगी। अब महिला इस उधेड़बुन में है कि वह अपना सबसे बड़ा और सम्मान देने वाला पर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया या किचन में जाकर होली के पकवान बनाएं। यह दिन महिलाओं को समर्पित है। घर की चारदीवारी के अंदर रहने वाली महिलाएं आज अपने देश ही नहीं विदेशों में भी अपना परचम लहरा रही हैं। इस दिन न केवल महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाती है बल्कि महिलाओं के लिए कई जरूरी कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

इंटरनेशनल वूमेंस डे और रंगों का पर्व होली साल में एक बार ही आते हैं। ‌बिना गुझिया के होली का त्योहार अधूरा माना जाता है। ‌ इसी सब बातों को लेकर देश की महिलाएं कई दिनों से उलझी हुईं हैं। लेकिन समझदार नारी ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और होली पर्व को एक साथ कैसे सेलिब्रेट करें यह भी सोच रखा है। यही आज की महिलाओं की समझदारी भी है। आज देश-विदेश में चाहे किसी भी क्षेत्र में महिलाएं तेजी के साथ आगे बढ़ रही हैं। अब वह समय नहीं रहा जब महिलाएं घर के काम और चौका-चूल्हा में ही सिमटी रहती थीं। ‌ मौजूदा समय में महिलाएं फाइटर प्लेन उड़ा रही हैं। महिलाओं ने यह उपलब्धि अपने बल पर हासिल की है। महिलाओं को आगे बढ़ाने और समाज में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से ही हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विश्व भर में मनाया जाता है।

आइए जानते हैं इंटरनेशनल वुमन डे के बारे में। महिलाओं की उपलब्धियों को सराहने और उन्हें और ज्यादा सशक्त बनाने के लिए हर साल 8 मार्च को महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देशभर में अलग-अलग तरह के आयोजनों के माध्यम से अलग-अलग क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं को सम्मानित किया जाता है।दुनिया के कई देशों की महिलाओं को लिंग भेद के कारण असमानता का सामना करना पड़ता है । पिछड़ी महिलाओं को समाज के प्रथम पायदान पर लाने और महिला अधिकारों के बारें में जागरूक करने के लिए अंतराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं ।

समाज में जागरूकता और महिलाओं के अधिकार दिलाने के उद्देश्य से मनाया जाता है यह दिवस

महिला दिवस को मनाने के पीछे साल 1908 में न्यूयॉर्क में हुई एक रैली का अहम योगदान है। दरअसल, इस साल न्यूयॉर्क में 12 से 15 हजार महिलाओं ने एक रैली का आयोजन किया था। रैली करने वाली इन महिलाओं की मांग थी कि उनकी नौकरी के कुछ घंटे कम किए जाए। साथ ही उन्हें वेतन भी उनके काम के मुताबिक दिया जाए। इसके साथ ही इन लोगों की यह भी मांग थी कि उन्हें वोट देने का भी अधिकार मिले। इस आंदोलन के एक साल बाद अमेरिका के सोशलिस्ट पार्टी ने पहले नेशनल वीमेन डे की घोषणा की थी। बाद में साल 1911 में डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, जर्मनी में पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस सेलिब्रेट किया गया।

अमेरिका में महिलाओं ने 8 मार्च को अपने अधिकारों को लेकर मार्च निकाला था। जिसके बाद अगले साल सोशलिस्ट पार्टी ने इसी दिन महिला दिवस मनाने की घोषणा कर दी। वहीं 1917 में पहले विश्व युद्ध के दौरान रूस की महिलाओं ने ब्रेड और पीस के लिए हड़ताल शुरू की थी। उन्होंने भी युद्ध को लेकर अपनी मांग और विचार रखें। इसके बाद सम्राट निकोलस ने अपना पद त्याग दिया और महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। उनको मिले अधिकार को देखते हुए यूरोप में भी महिलाओं ने कुछ दिन बाद 8 मार्च को पीस ऐक्टिविस्ट्स का समर्थन करते हुए रैलियां निकाली।

इसी वजह से 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरुआत हो गई। इसके बाद 8 मार्च, 1975 को संयुक्त राष्ट्र ने महिला दिवस को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी। यूनाइटेड नेशन की तरफ से जब 8 मार्च को महिला दिवस मनाने की शुरुआत की गई थी, तो इसे एक खास थीम के साथ मनाया गया था। जब पहली बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया, तो इसकी थीम ‘सेलिब्रेटिंग द पास्ट, प्लानिंग फॉर द फ्यूचर’ रखी गई थी। वहीं, बात करें इस साल की थीम की, तो इस बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के लिए थीम “डिजिटऑल: लैंगिक समानता के लिए नवाचार और प्रौद्योगिकी” तय की गई है। भले ही आज दुनिया के तमाम देश और हमारा समाज अधिक जागरूक है लेकिन महिलाओं के अधिकारों और हक की लड़ाई अभी भी जारी है। कई मामलों में महिलाओं को आज भी समान सम्मान और अधिकार नहीं मिले हैं। महिलाओं के इन्हीं अधिकार, सम्मान के लिए समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से हर साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है।

शंभू नाथ गौतम

 

डीजे की तेज आवाज ने दूल्हे की ली जान, जयमाला के दौरान हुई घटना, जानिए स्वस्थ व्यक्ति को कितना डेसीबल ध्वनि तक नहीं रहता खतरा

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DJ loud sound took grooms life

शादी समारोह या अन्य कार्यक्रमों में बहुत तेज आवाज में डीजे बजाने का चलन है। तेज आवाज स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती है। ऐसा ही एक मामला बिहार के सीतामढ़ी में शादी समारोह के दौरान हुआ। डीजे की आवाज ने दूल्हे की जान ले ली। जिसके बाद शादी समारोह में मातम छा गया। सीतामढ़ी जिले में जयमाला के दौरान दूल्हा स्टेज पर ही बेहोश हो गया। इसके बाद उसे अस्पताल पहुंचाया गया। जहां इलाज के दौरान दूल्हे की मौत हो गई।

बताया जा रहा है कि शादी में तेज आवाज में डीजे बज रहा था। इसी वजह से दूल्हे की तबीयत बिगड़ने लगी। डॉक्टरों ने बताया कि उसकी मौत हार्ट अटैक आने की वजह से हुई है। दूल्हे ने कई बार डीजे को दूर ले जाने के लिए कहा, लेकिन उसकी बात नहीं मानी गई। स्थानीय लोगों ने बताया कि जयमाला के बाद दूल्हा और दुल्हन अपने रिश्तेदार, परिवार और दोस्तों के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। इसी दौरान अचानक दूल्हा बेहोश होकर गिर पड़ा। उसके गिरते ही अफरा-तफरी मच गई। सभी लोग इधर-उधर भागने लगे। दूल्हे की तरफ से आए लोग बिना खाना खाए लौट गए। मृतक दूल्हे की पहचान परिहार प्रखंड की धनहा पंचायत के मनिथर के रहने वाले स्वर्गीय गुदर राय के पुत्र सुरेंद्र कुमार के रूप में की गई है।

उल्लेखनीय है कि यहां डीजे पर प्रतिबंध है फिर भी तेज आवाज में डीजे बजाया जा रहा था। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक एक स्वस्थ व्यक्ति 50 डेसीबल तक की ध्वनि को सहन कर सकता है, डीजे की ध्वनि की तीव्रता 500 डेसीबल तक होती है। इससे अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि डीजे हमारे लिए किस कद्र खतरनाक है। डीजे की तेज ध्वनि से आदमी का शरीर तक कांप उठता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि हमारे घर में दिन के समय अधिकतम 25 से 30 और रात्रि में 20 से 25 डेसीबल तक ध्वनि होनी चाहिए। वाहनों के प्रेशर हॉर्न और मशीनों की आवाज से ध्वनि प्रदूषण की तीव्रता बढ़ जाती है।

डीजे की तीव्र ध्वनि के पास खड़े रहना सेहत के लिए बेहद खतरनाक है। विशेषज्ञों के मुताबिक दिल के मरीजों, कमजोर दिल वाले लोगों को डीजे से दूर ही रहना चाहिए। डीजे की बेहद ऊंची ध्वनि मस्तिष्क में तनाव पैदा करती है। इससे चिड़चिड़ापन और रक्तचाप बढ़ जाता है। तीव्र ध्वनि से प्रजनन क्षमता घट जाती है। गर्भपात की शिकायत और मानसिक तौर पर विकलांगता का खतरा बढ़ जाता है। डीजे की ऊंची आवाज के कारण बहरेपन का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है। वहीं पटाखों से होने वाले शोर भी हमारे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

शादी समारोह में द्वारचार के दौरान आतिशबाजी भी कम खतरनाक नहीं है। ध्वनि वाला आतिशबाजी 117 डेसिवल तक आवाज करता है। आवाज से भी अधिक वायु प्रदूषण पैदा करता है जो कई रोगों का पोषक है। इससे निकलने वाले कई प्रकार के रसायन का उत्सर्जन होता है। ये रसायन फेफड़े के साथ उच्च रक्तचाप व आंखों के लिए काफी नुकसानदायक है।

होलिका दहन 6 मार्च को या 7 मार्च को?, कन्फ्यूजन दूर करें, जानें तारीख, शुभ मुहूर्त, क्या होता है होलाष्टक?

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Holika dahan 2023: देशभर में होली का त्यौहार मनाने को लेकर इस बार लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। दरसल होलिका दहन पर्व फाल्गुन मास की प्रदोषकालीन पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस साल 6 मार्च को प्रदोषकालीन पूर्णिमा के साथ ही भद्रा भी है। पूर्णिमा तिथि पर भद्रा के कारण होलिका दहन तिथि को लेकर उलझन उत्पन्न हो रही है। लोगों का मानना है कि भद्रा काल में होलिका दहन नहीं होता है। अब सवाल उठ रहा है कि होलिका दहन 6 मार्च को होगा या फिर 7 मार्च को?

इसबीच उत्तराखंड ज्योतिष रत्न आचार्य डॉक्टर चंडी प्रसाद घिल्डियाल ने बताया कि शास्त्र के अनुसार होलिका दहन प्रदोष कालीन पूर्णमासी तिथि में ही होता है, अब रही भद्रा की बात तो यद्यपि भद्रा का पुचछ काल जिसे कार्यों के लिए शुभ माना जाता है, वह रात्रि 12:00 बजे के बाद शुरू हो रहा है ,परंतु होलिका दहन 6 मार्च को सायंकाल प्रदोष काल में 6:21 से 8:21 के मध्य किया जाना ही शास्त्र सम्मत है।

आचार्य चंडी प्रसाद घिल्डियाल के मुताबिक 7 तारीख को भी पूर्णमासी तिथि दिन भर है इसलिए उस दिन लोग मिठाई बना सकते हैं, परंतु प्रदोष काल में पूर्णमासी ना होने से उस दिन होलिका दहन नहीं हो सकता है। डॉक्टर घिल्डियाल बताते हैं कि शास्त्रों के अनुसार रंगोत्सव प्रतिपदा तिथि में मनाया जाना शास्त्र सम्मत है, इसलिए 8 मार्च को ही होली के रंग खेले जाएंगे।

यह पूछे जाने पर कि कुछ हिंदू पंचांग 6 मार्च की रात्रि 4:00 बजे से सुबह 6:00 बजे के बीच होलिका दहन की बात कर रहे हैं और केंद्र सरकार ने भी 8 मार्च का अवकाश रखा है, डॉ घिल्डियाल ने स्पष्ट किया कि दरअसल संपूर्ण उत्तर भारत के पश्चिमी इलाके में और दक्षिण भारत में प्रदोष काल 6 तारीख को प्राप्त हो रहा है, परंतु चंद्रमा की गति के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश और कुछ इलाकों में उस दिन प्रदोष प्राप्त ना होने से काशी के पंचांग ने यह व्यवस्था दी है, तो वहां के हिसाब से उन्होंने भी शास्त्र सम्मत बात ही की है। उसी आधार पर केंद्र सरकार ने 8 तारीख को अवकाश किया है।

पत्रकारों द्वारा यह कहने पर कि होली जैसा त्यौहार पूरे देश में अब  अलग-अलग तरीके से 2 दिन मनाया जा रहा है ,क्या यह उचित है? के जवाब में आचार्य घिल्डियाल ने बताया कि त्यौहार में वृद्धि होना पूरे राष्ट्र के लिए अत्यंत शुभ होता है, इसलिए इसको अन्यथा नहीं लेना चाहिए रंगो के त्यौहार को पूरे उत्साह के साथ शास्त्र सम्मत ही मनाना चाहिए।

होलिका दहन कथा और महत्व

होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और यह उत्सव हिरण्यकश्यप और उसके पुत्र प्रह्लाद की कथाओं से जुड़ा हुआ है। हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु का घोर विरोधी था, लेकिन उसका पुत्र भगवान विष्णु का भक्त था। हिरण्यकश्यप अपने पुत्र के अपने कट्टर-शत्रु के भक्त होने से क्रोधित था, इसलिए उसने अपनी बहन होलिका की मदद से अपने ही पुत्र की हत्या करने का फैसला किया। हिरण्यकश्यप एक राक्षस राजा था, और उसकी बहन एक राक्षसी थी। भगवान ब्रह्मा ने एक वरदान स्वरूप एक बार होलिका को एक शॉल दिया था जिसे ओढ़ने से आग उसे जला नहीं सकता था। साजिश स्वरूप उसने प्रहलाद को आग में बैठने के लिए आमंत्रित किया और प्रचंड लपटों से खुद को बचाने के लिए उस शाल में लपेट लिया। इस बीच, प्रहलाद ने भगवान विष्णु से रक्षा करने की प्रार्थना की और तब भगवान विष्णु हवा के झोंके के रूप में प्रकट हुए होलिका की शाल को उड़ा दिया जिससे होलिका आग में भस्म हो गई जबकि भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद को आग जला नहीं पाया।

होलिका दहन उपाय

  • होलिका दहन की पूजा के दौरान नारियल के साथ पान और सुपारी अर्पित करना चाहिए। इससे सोया भाग्य जाग सकता है।
  • घर की नकारात्मकता दूर करने और परिवार के लोगों के जीवन की हर परेशानी को दूर करने के लिए होलिका दहन के दिन एक नारियल लें। इसे अपने और परिवार के लोगों पर सात बार वार लें। इसके बाद होलिका दहन की अग्नि में इस नारियल को डाल दें और सात बार होलिका की परिक्रमा करें।
  • होलिका दहन के दिन गरीबों और जरूरतमंदों को अपने सामर्थ्य के अनुसार दान जरूर करें। इससे जीवन में आने वाले संकट दूर हो जाते हैं।

होलिका दहन में न करें इन लकड़ियों का इस्तेमाल

पीपल, बरगद, शमी, आंवला, नीम, आम, केला और बेल की लकड़ियों का प्रयोग होलिका दहन के दौरान कभी नहीं किया जाना चाहिए। हिंदू धर्म में इन पेड़ों को काफी पवित्र और पूज्यनीय माना गया है। इनकी पूजा की जाती है और इनकी लकड़ियों का प्रयोग यज्ञ, अनुष्ठान आदि शुभ कार्यों के लिए किया जाता है। होलिका दहन को जलते हुए शरीर का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस कार्य में इन लकड़ियों का उपयोग नहीं करना चाहिए।

होलाष्टक होते क्या हैं?

होलाष्टक फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ समाप्त हो जाते हैं। इस साल होलाष्टक 28 फरवरी से शुरु होकर 6 मार्च को होलिका दहन के साथ समाप्त हो जायेंगे। होली के 8 दिन पहले होलाष्टक लग जाते हैं। होलाष्टक के समय शुभ ग्रह भी अशुभ फल देते हैं। एक प्रकार से सभी ग्रहों का स्वभाव उग्र हो जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार अगर कोई व्यक्ति होलाष्टक के दौरान कोई मांगलिक काम करता है तो उसे कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इतना ही नहीं व्यक्ति के जीवन में कलह, बीमारी और अकाल मृत्यु का साया भी मंडराने लगता है। इसलिए होलाष्टक के समय को शुभ नहीं माना जाता है।

होलाष्टक के दौरान ना करें ये काम

  1. इस दौरान शादी, विवाह, भूमि पूजन, गृह प्रवेश या कोई नया बिजनेस खोलना वर्जित माना जाता है।
  2. शास्त्रों के अनुसार, होलाष्टक शुरू होने के साथ 16 संस्कार जैसे नामकरण संस्कार, जनेऊ संस्कार, गृह प्रवेश, विवाह संस्कार जैसे शुभ कार्यों पर भी रोक लग जाती है।
  3. किसी भी प्रकार का हवन, यज्ञ कर्म भी इन दिनों में नहीं किया जाता है।
  4. इसके अलावा नव विवाहिताओं को इन दिनों में मायके में रहने की सलाह दी जाती है।

 

 

 

होलाष्टक क्या होता है?, जानिए क्यों मानते हैं इन 8 दिनों को अशुभ?

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Holashtak

Holashtak 2023: हमारा भारत वर्ष त्योहारों का देश है। जहां पर हर महीने में कोई न कोई त्योहार मनाने की परम्परा देखने को मिलती है।जिसमें विविधता मे भी एकता के दर्शन निरूपित होते हैं। इसीक्रम होली का भी त्योहार है। जो कि 6 मार्च को होलिका दहन और 8 मार्च को आपसी भातृत्व के भाव के रुप में गीली होली का पर्व है। इस होली त्योहार के साथ होलाष्टक का भी भाव जुडा हुआ है।

होलाष्टक क्या हैं?

होलाष्टक क्या है, इस सन्दर्भ में तरह-तरह की रूचिप्रद कहानियों के संकेत देखने को मिलते हैं। होलाष्टक फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ समाप्त हो जाते हैं। इस साल होलाष्टक 28 फरवरी से शुरु होकर 6 मार्च को होलिका दहन के साथ समाप्त हो जायेंगे। होली के 8 दिन पहले होलाष्टक लग जाते हैं। होलाष्टक के समय शुभ ग्रह भी अशुभ फल देते हैं। एक प्रकार से सभी ग्रहों का स्वभाव उग्र हो जाता है।

होलाष्टक कथा

होलाष्टक के सन्दर्भ में मान्यता है कि भक्त प्रहलाद के पिता हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र को इन दिनो कठोर यातनाएं देकर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया। जिस कारण भगवान बिष्णु ने ये दिन श्रापित करते हुए अशुभता में निरूपित कर दिए। दूसरी पौराणिक मान्यता यह है कि एक बार तारकासुर नाम के राक्षस ने अपनी शक्तियों से देवताओ को परेशान करना शुरू कर दिया। उसे यह वरदान प्राप्त था कि उसका बध शंकर भगवान के पुत्र द्वारा ही संभव हो सकता है। भगवान शंकर निर्गुण परम तत्व में अपनी तपस्या में लीन थे। देवताओ व जन कल्याण के लिए कामदेव ने भोले बाबा शंकर की तपस्या को भंग करने का प्रयास किया, जिस कारण भगवान शंकर ने कुपित होकर कामदेव को भस्म कर दिया।

काम देब की पत्नी रति ने अपने पति को जीवित करने के लिए कठोर साधना की। जिससे खुश होकर भगवान शंकर ने रति के पति को जीवित कर दिया। तभी से होलाष्टक मनाने की परम्परा चल रही है। होलाष्टक के दिनों में विवाह, सगाई, मांगलिक कार्यो के अलावा नामकरण संस्कार, भवन निर्माण, जमीन खरीदना व बेचना, आभूषण खरीदना, जमीन बेचना आदि सभी कार्य अशुभ माने जाते हैं। होलिका दहन के दिन ही होलाष्टक का भी अंत हो जाता है।

लेखक: अखिलेश चन्द्र चमोला

पूर्व सैनिक स्वर्गीय योगम्बर सिंह रावत यशु फौजी को दी श्रद्धांजलि

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Pauri News: राजकीय आदर्श कन्या जूनियर हाईस्कूल सल्डा, विकास खंड कोट में क्षेत्रीय जनता व विद्यालय परिवार सल्डा की और से आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में 2 मार्च 2023 को माँ भारती के सच्चे सपूत पूर्व सैनिक व सामाजिक सरोकारों से जुडा़ बड़ा नाम स्वर्गीय योगेम्बर सिंह रावत यशु फौजी भाई को क्षेत्रीय जनता शिक्षकों द्वारा विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

इस अवसर पर पौड़ी विधायक राजकुमार पोरी, ब्लॉक प्रमुख कोट पूर्णिमा नेगी, लक्ष्य कोचिंग इस्टूटिट, भाजपा मंडल अध्यक्ष श्रीनगर जितेंद्र धीरवाण, सांसद प्रतिनिधि संजय बलुनी ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उनके कार्यो को याद किया।

इस मौके पर विधायक पोरी द्वारा उनकी धर्म पत्नी रजनी देवी, ताऊजी दयाल सिंह व परिवार के अन्य सदस्यों को शाल व स्मृति चिन्ह् देकर यशु के कार्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए सम्मानित किया गया। इस दौरान उपस्थित लोगों की आखें उस समय नम हो गई जब विद्यालय के बच्चों ने अपने सम्बोधन में उनके कार्य को याद करते हुए मार्मिक कविताएँ सुनाई।

जितेंद्र धीरवाण ने सेना में यशु फौजी के साथ बिताये पलों को याद करते हुए एक भाई व बेटे के रूप में उनके परिवार के साथ हमेशा खड़े रहने का संकल्प उनके परिवार को दिया।

यशु रावत का जन्म 2 जून 1979 को ग्राम सल्डा में हुआ, प्रारंभिक शिक्षा व इंटर कॉलेज तक की पढ़ाई उन्होंने अपने गाँव में की। तथा देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत होकर उन्होंने 5 अप्रैल 1999 में भारतीय सेना गढ़वाल राइफल ज्वाइन की। वर्ष 2016 में सेना में माँ भारती की सेवा करने के बाद उन्होंने सामाजिक जीवन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। इसके लिए भी उन्होंने अपने गांव को ही चुना, और उन्होंने गाँव के विकास के लिए हर सम्भव कोशिश की। गाँव के बेहतरी के लिए वो हमेशा खड़े रहे और विभिन्न मंचों पर गाँव के लिए सघर्ष करते नजर आए। इसी कड़ी में उन्होंने अपने गाँव के विद्यालय को माध्यम बनाया और विद्यालय की विभिन्न गतिविधियों में अपनी उपस्थिति देकर बच्चों की हौसला की। कोई ऐसा कार्य नहीं जिसमें यशु की भागीदारी न रही हो। गाँव में सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा सभी मुद्दों पर वो हमेशा एक फौजी की तरह लडते रहे और समाधान की और बढते गये।

उन्होंने विधिक सेवा में जुडते हुए गावों के लोगों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत किया। जिला न्यायालय के विभिन्न विधिक शिवरो का आयोजन उन्होंने विकास खंड कोट में कराया। स्वच्छता अभियान से जुडते हुए हुए उन्होंने इस मुहिम में अपने क्षेत्र में जन जन को जागरूक किया। शराब के लिए उनका आंदोलन हमेशा यादों में रहेगा। पौड़ी जिले में विदेशी खिलाड़ियों को बुलाकर अपने युवाओं को मैराथन दौड़ करवाने की उनकी मुहिम भी आज सभी को याद है। उनके ही प्रयास से आज सल्डा में एक खेल मैदान निर्माण की ओर अग्रसर है। कोविड के दौरान उन्होंने अपने स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए अपने सेना के जज्बे को बनाये रखते हुए आमजन की सेवा में अपना सम्पूर्ण समय व्यतीत किया। जिसकी कीमत उन्होंने 8 मई 2021 को अपनी जान देकर चुकायी।

ऐसे शख्स को जब श्रद्धांजलि दी गई तो सबकी आखें नम थी। आयोजन में क्षेत्रीय जनता के साथ विभिन्न विद्यालय के बच्चों ने पेंटिंग व निबन्ध के माध्यम से भी याद किया। आयोजक संयोजक रोशन डोगरा ने अपने सम्बोधन में उन्हें भारत माँ का सच्चा सपूत बताया और विद्यालय को आर्दश विद्यालय बनाने में उनकी भूमिका को याद किया।

इस आयोजन की अध्यक्षता सुभाष रावत व संचालन पूर्व संकुल समन्वयक बालमणा महेश गिरि ने किया।   आयोजन में भारती लाल, भजन सिंह कठैत, गौरव, भुपेन्द्र रावत, यशवंती राणा, दुर्गावती शाह, राकेश मोहन, सुषमा रावत, अंजना, आदि का महत्वपूर्ण सहयोग रहा।

 

यमुना प्राधिकरण कार्यालय में गूंजी कवि सुनील जोगी की कविताएं, होली मिलन पर आयोजित कवि सम्मेलन में कवियों ने बांधा समां

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यमुना प्राधिकरण द्वारा शुक्रवार को अपने ग्रेटर नोएडा स्थित कार्यालय में होली मिलन एवं कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन में देश प्रसिद्ध कवि पद्मश्री डॉ. सुनील जोगी, सरदार मनजीत सिंह, शम्भू शिखर, विकास बौखल, दीपक सैनी, कवियत्री पद्मिनी शर्मा एवं राधिका मित्तल ने अपनी सुन्दर कविताऐं प्रस्तुत कर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कवि सम्मेलन का संचालन कवि डॉ. सुनील जोगी ने किया। इस दौरान हास्य कवि शम्भू शिखर, विकास बौखल तथा कवियत्री पद्मिनी शर्मा ने अपनी व्यंग्यात्मक कविताओं की प्रस्तुतियों से दर्शकों को हंसा हंसाकर लोटपोट कर दिया। वहीँ श्रंगार रस की कवियत्री राधिका मित्तल,  कवि दीपक सैनी तथा सरदार मनजीत सिंह ने भी सभी श्रोताओं को खूब हंसाया।

अंत में कवि डॉ. सुनील जोगी ने देशभक्ति से ओतप्रोत अपनी शानदार कविताओं जोगीरा… गाकर पूरे कार्यक्रम का समां बांध दिया। इस मोके पर यमुना प्राधिकरण के सीईओ डॉ. अरुणबीर सिंह, एसीईओ मोनिका रानी, रवीन्द्र सिंह,  ओएसडी शैलेन्द्र भाटिया, शैलेन्द्र सिंह, एवं समस्त स्टाफ के अलावा ग्रेटर नोएडा के पत्रकार मौजूद रहे।

उत्तराखंड: पौड़ी जिले की शिक्षिका आशा बुड़ाकोटी सहित प्रदेश के इन 17 शिक्षकों का शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार के लिए चयन

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Shailesh matiyani award 2022

Shailesh matiyani award 2022-23: उत्तराखंड में हर साल शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य वाले शिक्षकों को शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार से नवाजा जाता है। इसीक्रम में इस बार भी राज्य के 17 शिक्षकों को वर्ष 2022-23 के राज्य स्तरीय शैलेश मटियानी पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है। शासन की ओर से जारी आदेश में प्राथमिक के 10, माध्यमिक के 6 और प्रशिक्षण संस्थान से एक शिक्षक शामिल है।

इस वर्ष शैलेश मटियानी पुरस्कार के लिए पौड़ी जिले से प्राइमरी स्कूल की प्रधानाध्यापिका आशा बुड़ाकोटी का चयन हुआ है। द्वारीखाल ब्लॉक के राजकीय आदर्श प्राइमरी स्कूल कोटलमंडा में कार्यरत प्रधानाध्यापिका आशा बुड़ाकोटी ने स्कूल के बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु अभिनव प्रयोग किए हैं। जिसकी वजह से कई प्राइवेट स्कूल के बच्चों ने भी इस विद्यालय में प्रवेश लिया है। जिसको लेकर उनको यह पुरस्कार मिलने जा रहा है। आशा बुड़ाकोटी साल 2016 से राजकीय आदर्श प्राइमरी स्कूल कोटलमंडा में प्रधानाध्यापिका पद पर तैनात हैं। बतौर प्रधानाध्यापिका उन्होंने अपनी टीम और एसएमसी के सहयोग से स्कूल के शैक्षणिक और भौतिक दोनों ही स्तरों में बेहतर सुधार के लिए ठोस कदम उठाए। जो समय के साथ सफल भी हुए। मौजूदा समय में स्कूल में बच्चे कंप्यूटर से लेकर प्रोजेक्टर के माध्यम से आधुनिक तरीके से पठन-पाठन कर रहे हैं।

द्वारीखाल ब्लॉक का यह स्कूल किसी हाईटेक प्राइवेट स्कूल को भी मात दे रहा है। इतना ही नहीं पास के ही निजी स्कूल से बच्चे यहां पढ़ने आते हैं। कोरोना काल में जहां पूरा पठन-पाठन प्रभावित रहा। वहीं, अभिभावकों के सहयोग से बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं होने दी गई। स्कूल ने ऑनलाइन क्लास संचालित की। इस समय स्कूल की छात्र संख्या 50 है। प्राइमरी स्कूल कोटलमंडा के कई बच्चे राजीव गांधी और जवाहर नवोदय विद्यालय के लिए चयनित हो चुके हैं।

प्रारंभिक शिक्षा के 10 शिक्षकों को मिलेगा पुरुस्कार

शासन की ओर से जारी आदेश के मुताबिक प्राथमिक शिक्षा में पौड़ी जिले के राजकीय प्राथमिक विद्यालय कोटलमंडा की प्रधानाध्यापिका आशा बुड़ाकोटी, उत्तरकाशी के प्राथमिक विद्यालय बड़ेथी के प्रधानाध्यापक संजय कुमार कुकसाल, देहरादून जिले के जूनियर हाईस्कूल डोईवाला की सहायक अध्यापिका ऊषा गौड़, हरिद्वार जिले के जूनियर हाईस्कूल रोशनाबाद के प्रधानाध्यापक संजय कुमार, टिहरी जिले के प्राथमिक विद्यालय उलाणा के प्रधानाध्यापक उत्तम सिंह राणा, चंपावत जिले के जूनियर हाईस्कूल बिसारी के सहायक अध्यापक रवीश चंद पचौली, बागेश्वर जिले के जूनियर हाईस्कूल पिंगलौ के सहायक अध्यापक सुरेश चंद्र सती, पिथौरागढ़ जिले के प्राथमिक विद्यालय भट्टी गांव के प्रधानाध्यापक गंगा आर्या, अल्मोड़ा जिले के जूनियर हाईस्कूल पौड़ा कोठार की सहायक अध्यापिका यशोदा कांडपाल, नैनीताल जिले के प्राथमिक विद्यालय धुलई की प्रधानाध्यापिका डॉ. आशा बिष्ट को पुरस्कृत किया जाएगा।

माध्यमिक के छः शिक्षकों को मिलेगा पुरुस्कार

माध्यमिक स्तर पर उत्तरकाशी जिले में इंटर कालेज कीर्ति के लोकेंद्रपाल सिंह, देहरादून जिले के जीआईसी क्वानू के प्रवक्ता संजय कुमार मौर्य, पिथौरागढ़ जिले के जीआईसी बड़ावे की सहायक अध्यापिका दमयंती, बागेश्वर जिले के जीआईसी कांडा के प्रवक्ता त्रिभुवन चंद, अल्मोड़ा जिले के जीआईसी रयालीधार के प्रवक्ता प्रभाकर जोशी, ऊधमसिंह नगर जिले के राजकीय गांधी नवोदय विद्यालय खटीमा के प्रवक्ता निर्मल कुमार का पुरस्कार के लिए चयन किया गया है।

प्रशिक्षण संस्थान के एक शिक्षक का चयन

इसके अलावा प्रशिक्षण संस्थान से जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान बागेश्वर के प्रवक्ता शैलेंद्र सिंह धपोला को पुरस्कृत किया जाएगा।

ऑस्ट्रेलिया ने तीसरा टेस्ट जीता : टीम इंडिया को 3 दिन में मिली करारी हार पर कप्तान रोहित शर्मा का अजीबोगरीब बयान

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Australia won the third Test

इंदौर के होलकर स्टेडियम में ऑस्ट्रेलिया ने तीसरे टेस्ट में भारत को 3 दिन में ही हरा दिया। ऑस्ट्रेलिया से टीम इंडिया को 9 विकेट के अंतर से हार का सामना करना पड़ा। जीत के लिए मिले 76 रन के लक्ष्य का पीछा ऑस्ट्रेलिया ने तीसरे दिन पहले सत्र में 18.5 ओवर में कर लिया और 2017 के बाद पहली बार भारतीय सरजमीं पर टेस्ट मैच में जीत दर्ज करने में सफल रही।

इस जीत के साथ ही कंगारू टीम ने चार मैचों की सीरीज में 2-1 की वापसी की है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच टेस्ट मैच 3 दिन में ही खत्म हुए। इसके बाद कप्तान रोहित शर्मा का बयान टीम इंडिया की हार से मायूस क्रिकेट प्रशंसकों को निराश कर गया। रोहित शर्मा से जब मीडिया ने 3 दिन में मैच खत्म होने पर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि हम टेस्ट मैच को रोमांचक बना रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘अब तो भारत के बाहर भी टेस्ट मैच पांच दिन तक नहीं चल रहे हैं। 3 दिन में मैच खत्म करके हमने टेस्ट को पहले से रोमांचक बनाया है।

पिछले 2 टेस्ट भी 3 दिन में खत्म हो गए थे। हम तो चाहते हैं कि लोगों को दिन में ही मैच खत्म होने का मजा मिले। कप्तान रोहित शर्मा ने इंदौर की पिच पर पूछे सवाल के जवाब में कहा कि इस पिच पर खेलने का फैसा सामूहिक तौर पर हमने लिया था। उन्होंने कहा, हम जानते हैं कि यह पिच मुश्किल है और इस पर खेलना चनौतीपूर्ण होगा। हम ऐसी चुनौतियों के लिए तैयार हैं। हमें इस तरह की पिच पर खेलकर अपनी ताकत और कमजोरियों को पहचानना है। मुकाबला रोमांचक था और ऑस्ट्रेलिया इस जीत की हकदार है।

रोहित ने आगे कहा, ये स्किल का मामला है, लोगों को वो हुनर सीखना पड़ेगा। पिचें गेंदबाजों की मदद कर रही हैं तो बल्लेबाजों को अपने कौशल को परखना पड़ेगा। ये उस तरह का मामला नहीं है कि मैच सपाट पिच पर खेले जा रहे हैं और नतीजे नहीं निकल रहे हैं।

बता दें कि टॉस जीतकर पहले बैटिंग करने उतरी टीम इंडिया पहली पारी में 109 रनों पर ऑलआउट हो गई थी। वहीं, ऑस्ट्रेलिया ने पहली पारी में 197 रन बना लिए थे। उसे 88 रनों की बढ़त मिली थी। इसके बाद भारतीय टीम दूसरी पारी में 60.3 ओवर में 163 रन पर ही सिमट गई। उसने 75 रन की बढ़त बनाई। इस तरह ऑस्ट्रेलिया को 76 रन का लक्ष्य मिला था। दूसरे दिन के खेल में ऑस्ट्रेलियाई टीम के स्पिनर नाथन लियोन ने कुल 8 विकेट चटकाए। जवाब में कंगारू टीम ने 18.5 ओवर में एक विकेट पर 78 रन बनाकर मैच को जीत लिया।

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चौथा टेस्ट अहमदाबाद में खेला जाना है। इस मैच को देखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथोनी अल्बनीस स्टेडियम में मौजूद रहेंगे। ‌यह पहली बार होगा जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने नाम पर बने स्टेडियम में कोई मैच देखेंगे। बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी सीरीज का चौथा टेस्ट मैच 9 से 13 मार्च के बीच खेला जाना है। पिछले साल मई में ऑस्ट्रेलिया का प्रधानमंत्री बनने के बाद से एंथोनी अल्बनीज का यह पहला भारत दौरा है।