श्रीनगर गढ़वाल। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव जीवन में आध्यात्मिक चेतना, ज्ञान और नैतिक मूल्यों के जागरण का संदेश देने वाला पर्व है। डॉ. अखिलेश चन्द्र चमोला के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य मानवता को अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और अन्याय से धर्म की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।
वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि का प्रारंभ 4 सितंबर को प्रातः 2:25 बजे से होगा और इसका समापन 5 सितंबर को मध्यरात्रि 12:13 बजे होगा। रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर को मध्यरात्रि 12:29 बजे से प्रारंभ होकर रात्रि 11:04 बजे तक रहेगा।
भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का प्रमुख पूजन निशीथ काल में किया जाएगा। इसके लिए मध्यरात्रि 11:57 बजे से 5 सितंबर को 12:43 बजे तक का समय निर्धारित बताया गया है। स्मार्त एवं गृहस्थ परंपरा में 4 सितंबर को जन्माष्टमी का मुख्य उत्सव मनाया जाएगा, जबकि वैष्णव परंपरा तथा अनेक प्रमुख धामों में 5 सितंबर को नंदोत्सव एवं पारण का आयोजन किया जाएगा।
दुर्लभ शुभ संयोगों का निर्माण
डॉ. चमोला के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृषभ राशि में चंद्रमा तथा मध्यरात्रि के अद्भुत संयोग में हुआ था। जन्माष्टमी के अवसर पर अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग को विशेष महत्व दिया जाता है। इसे शास्त्रीय परंपरा में जयंती योग से जोड़ा गया है।
इसके साथ ही हर्षण एवं सर्वार्थ सिद्धि योग का भी उल्लेख किया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन योगों में की गई साधना, जप, दान और धार्मिक कार्य विशेष फलदायी माने जाते हैं। वृषभ राशि में चंद्रमा की स्थिति को भी मन की स्थिरता, शांति और भक्ति के लिए अनुकूल माना गया है।
जीवन-दर्शन का संदेश देते हैं श्रीकृष्ण
डॉ. अखिलेश चन्द्र चमोला ने कहा कि श्रीकृष्ण का जीवन केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि मानव जीवन के विविध पक्षों को दिशा देने वाला व्यापक दर्शन है। कंस का कारागार मनुष्य के भीतर मौजूद काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के बंधनों का प्रतीक माना जा सकता है। वहीं वासुदेव द्वारा नवजात कृष्ण को लेकर यमुना पार करना शरणागति, विश्वास और धर्म के मार्ग पर चलने का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप वात्सल्य का संदेश देता है, गोपियों के साथ उनकी लीला आत्मा और परमात्मा के आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक मानी जाती है, जबकि कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथि के रूप में श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश निष्काम कर्म, कर्तव्य और धर्म के पालन की प्रेरणा देता है।
इस अवसर पर प्रचलित स्तुति—
“वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥”
के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण को जगद्गुरु के रूप में नमन किया जाता है।
भीतर की चेतना को जागृत करने का पर्व
डॉ. चमोला के अनुसार जन्माष्टमी का वास्तविक उद्देश्य केवल उपवास, पूजा और बाहरी साज-सज्जा तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह पर्व व्यक्ति को अपने भीतर की दिव्य चेतना को जागृत करने, अन्याय और अनीति के विरुद्ध खड़े होने का नैतिक साहस विकसित करने तथा अपने कर्मों को लोककल्याण के लिए समर्पित करने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए समाज और मानवता के कल्याण के लिए कार्य करता है, तभी श्रीकृष्ण के आदर्शों का वास्तविक अनुसरण संभव है। इसी अर्थ में जन्माष्टमी को आध्यात्मिक जागरण और दिव्य चेतना के प्राकट्य का पर्व कहा जा सकता है।













