Home Blog Page 1440

लॉकडाउन के दौरान ग्राम पंचायत थनुल आये प्रवासी क्वारेंटाइन में रहकर कर रहे हैं नियमों का पालन

0
migrants are staying in the quarantine and following the govt rules

कल्जीखाल : कोरोना वायरस कोविड-19 के द्वारा देशभर में फ़ैल रही महामारी से बचने के लिए लोग सरकार के आदेशों का पालन कर रहे है। पौडी जनपद के कल्जीखाल ब्लॉक् में सामाजिक कार्यो के लिए सुर्ख़ियों में रहने वाली ग्राम पंचायत थनुल में लॉकडॉउन दौरान अब तक दो दर्जन से ज्यादा लोग गांव आ चुके है। ग्राम प्रधान नरेन्द्र सिंह नेगी द्वारा सभी प्रवासियों को क्वारेंटाइन करवाया गया है। कुछ लोगों को होम क्वारेंटाइन किया गया है तो कुछ को प्राथमिक विद्यालय थनुल में क्वारेंटाइन करवाया गया है। ज्ञात हो कि ग्राम पंचायत थनुल में कोई पंचायत भवन या आंगनबाड़ी भवन उपलब नही है। हाल ही में थनुल गांव के अजित लिंगवाल का परिवार दिल्ली से गाँव आया है। उनके साथ गांव के दो अन्य युवक भी आए है। अजित लिंगवाल की पत्नी श्रीमती सरोजनी देवी क्वारेंटाइन में विद्यालय में अपने परिवार के साथ-साथ अन्य दो युवाओ के लिए भी भोजन बना रही है। ग्राम प्रधान नरेन्द्र सिंह नेगी ने श्रीमती सरोजनी देवी की इस सेवा भावना के लिए आभार ब्यक्त किया। उन्होंने कहा की अजित लिंगवाल का अलग स्थान पर घर होने के बावजूद उन्होंने सरकार के नियमो का पालन करते हुए इस कोरोना रूपी वैश्विक महामारी में गाँव लौटने वाले अन्य प्रवासियों को एक अच्छा संदेश दिया है।

जगमोहन डांगी

उत्तराखंड: दिल्ली से पौड़ी गढ़वाल गई महिला की क्वारंटाइन के दौरान मौत

0
Woman died during quarantine

Coronavirus (covid-19) : बाहरी राज्यों से उत्तराखंड पहुँच रहे प्रवासियों में लगातार कोरोना वायरस संक्रमण के मामले मिलते जा रहे हैं। अभी अभी प्राप्त सूचना के मुताबिक दिल्ली से पौड़ी गढ़वाल के रिखणीखाल विकासखंड के अंतर्गत अपने गांव (रेवा) आई एक महिला की क्वारंटाइन के दौरान मौत हो गई। हालाँकि अभी तक यह मालूम नहीं हो पाया है कि महिला की मौत कोरोना से हुई है या किसी और वजह से। सूचना मिलते ही स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया। सूचना के मुताबिक 77 वर्षीय महिला कुछ दिन पहले ही दिल्ली के बुराड़ी से अपनी बहू के साथ उत्तराखंड स्थित अपने गाँव आई थी। दिल्ली से आने के कारण महिला को जूनियर हाईस्कूल में बने क्वारंटाइन सेंटर में क्वारंटाइन किया गया था। बताया जा रहा है कि शनिवार देर शाम तक महिला बिल्कुल ठीक थी। लेकिन रात में उसकी अचानक तबीयत बिगड़ी और महिला को खून की उल्टियां होने लगी। वहीं, मौके पर ही महिला की मौत हो गई। महिला की मौत के बाद से क्षेत्र में भय का माहौल बना हुआ है। डॉक्टरों की टीम क्वारंटीन सेंटर पहुंच गई है। मामले की जांच की जा रही है।

गढ़वाल की 100 राजपूत जातियों का इतिहास यहाँ पढ़ें

0
History of Rajput castes in Garhwal

गढ़वाल क्षेत्र में निवास करने वाली राजपूत जातियों का इतिहास काफी विस्तृत है। यहां बसी राजपूत जातियों के भी देश के विभिन्न हिस्सों से आने का इतिहास मिलता है।

History of Rajput castes in Garhwal

क्षत्रिय/ राजपूत :- गढ़वाल में राजपूतों के मध्य निम्नलिखित विभाजन देखने को मिलते हैं –
1. परमार (पंवार) :– परमार/ पंवार जाति के लोग गढ़वाल में धार गुजरात से संवत 945 में आए। इनका प्रथम निवास गढ़वाल राजवंश में हुआ।
2. कुंवर :- इन्हें पंवार वंश की ही उपशाखा माना जाता है। ये भी गढ़वाल में धार गुजरात से संवत 945 में आए। इनका प्रथम निवास भी गढ़वाल राजवंश में हुआ।
3. रौतेला :– रौतेला जाति को भी पंवार वंश की उपशाखा माना जाता है।
4. असवाल :– असवाल जाति के लोगों का सम्बंध नागवंश से माना जाता है। ये दिल्ली के समीप रणथम्भौर से संवत 945 में यहां आए। कुछ विद्वान इनको चौहान कहते हैं। अश्वारोही होने से ये असवाल कहलाए। वैसे इन्हें गढ़वाल में थोकदार माना जाता है।
5. बर्त्वाल :- बर्त्वाल जाति के लोगों को पंवार वंश का वंशज माना जाता है। ये संवत 945 में उज्जैन/ धारा से गढ़वाल आए और बड़ेत गांव में बस गए।
6. मंद्रवाल (मनुराल) :- ये कत्यूरी वंश के राजपूत हैं। ये संवत 1711 में कुमाऊं से गढ़वाल में आकर बसे। इनको कुमाऊं के कैंत्यूरा जाति के राजाओं की सन्तति माना जाता है।
7. रजवार :- कत्यूरी वंश के वंशज रजवार जाति के लोग संवत 1711 में कुमाऊं से गढ़वाल आए थे।
8. चन्द :- ये सम्वत 1613 में गढ़वाल आए। ये कुमाऊं के चन्द राजाओं की संतानों में से एक मानी जाती हैं।
9. रमोला :- ये चौहान वंश के वंशज हैं जो संवत 254 में मैनपुरी, उत्तर प्रदेश से गढ़वाल में आए और रमोली गांव में रहने के कारण ये रमोला कहलाए। इन्हें पुरानी ठाकुरी सरदारों की संतान माना जाता है।
10. चौहान :- ये चौहान वंश के वंशज मैनपुरी से यहां आए। इनका गढ़ ऊप्पू गढ़ माना जाता था।
11. मियां :- ये सुकेत और जम्मू से गढ़वाल में आए। ये यहां के मूल निवासी नहीं थे। लेकिन ये गढ़वाल के साथ नातेदारी होने के कारण गढ़वाल में आए।

गढ़वाल में राजपूत जातियों में बिष्ट, रावत, भण्डारी, नेगी, गुसाईं आदि प्रमुख समूह हैं, जिनके अंतर्गत कई जातियां समाहित हैं।

रावत जाति के राजपूत :- गढ़वाल में रावत जाति राजपूतों की एक प्रमुख जाति मानी जाती है। इसके अतर्गत कई जातियां समाहित हैं। ये सभी रावत जातियां अलग-अलग स्थानों से आकर गढ़वाल में बसी हैं।
12. दिकोला रावत :- दिकोला रावत की पूर्व जाति (वंश) मरहठा है। ये महाराष्ट्र से संवत 415 में गढ़वाल में आए और दिकोली गांव को अपना बनाया।
13. गोर्ला रावत :– गोर्ला रावत पंवार वंश के वंशज हैं जो गुजरात से संवत 817 में गढ़वाल आए। गोर्ला रावत का प्रथम गांव गुराड़ माना जाता है।
14. रिंगवाड़ा रावत :- इन्हें कैंत्यूरा वंश का वंशज माना जाता है। जो कुमाऊं से संवत 1411 में गढ़वाल आए। इनका प्रथम गढ़ रिंगवाड़ी गांव माना जाता था।
15. बंगारी रावत :- बंगारी रावत बांगर से संवत 1662 में गढ़वाल आए। बांगरी का अपभ्रंश बंगारी माना जाता है।
16. बुटोला रावत :- ये तंअर वंश के वंशज हैं। ये दिल्ली से संवत 800 में गढ़वाल आए। इनके मूलपुरुष बूटा सिंह माने जाते हैं।
17. बरवाणी रावत :- ये तंअर वंश के वंशज मासीगढ़ से संवत 1479 में आए। इनका गढ़वाल में प्रथम निवास नैर्भणा क्षत्रिय था।
18. जयाड़ा रावत :- ये दिल्ली के समीप किसी अज्ञात स्थान से गढ़वाल में आए। गढ़वाल में इनका प्रथम गढ़ जयाड़गढ़ माना जाता था।
19. मन्यारी रावत :- इनके मूल स्थान के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये लोग गढ़वाल की मन्यारस्यूं पट्टी में बसने के कारण मन्यारी रावत कहलाए।
20. जवाड़ी रावत :- इनका प्रथम गांव जवाड़ी गांव माना जाता है।
21. परसारा रावत :- ये चौहान वंश के वंशज हैं जो संवत 1102 में ज्वालापुर से आकर सर्वप्रथम गढ़वाल के परसारी गांव में आकर बसे।
22. फरस्वाण रावत :- मथुरा के समीप किसी स्थान से ये संवत 432 में गढ़वाल आए। इनका प्रथम गांव गढ़वाल का फरासू गांव माना जाता है।
23. मौंदाड़ा रावत :- ये पंवार वंश के वंशज हैं जो संवत 1405 में गढ़वाल में आकर बसे। इनका प्रथम गांव मौंदाड़ी गांव माना जाता है।
24. कयाड़ा रावत :- इन्हें पंवार वंश का वंशज माना जाता है। ये संवत 1453 में गढ़वाल आए।
25. गविणा रावत :- इन्हें भी पंवार वंश का वंशज माना जाता है। गवनीगढ़ इनका प्रथम गढ़ था।
26. लुतड़ा रावत :- ये चौहान वंश के वंशज हैं जो संवत 838 में लोहा चांदपुर से गढ़वाल आए। इनमें पुराने राजपूत ठाकुर आशा रावत और बाशा रावत थोकदार कहलाते थे।
27. कठेला रावत :- कठेला रावत राजपूत जाति के बारे में पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी जी लिखते हैं कि “इनका मूल वंश कठौच/कटौच और गोत्र काश्यप है और ये कांगड़ा से गढ़वाल में आकर बसे हैं। ऐसा माना जाता है कि इनका गढ़वाल राजवंश से रक्त सम्बंध रहा है। इनकी थात की पट्टी गढ़वाल में कठूलस्यूं मानी जाती है। कुमाऊं के कठेला थोकदारों के गांव देवाइल में भी ‘कठेलागढ़’ था।”
28. तेरला रावत :- ये गुजड़ू पट्टी के थोकदार माने जाते हैं।
29. मवाल रावत :- गढ़वाल में इनकी थात की पट्टी मवालस्यूं मानी जाती है। इनका मूल निवास नेपाल तथा ये कुंवर वंश के माने जाते हैं।
30. दूधाधारी रावत :- ये बिनोली गांव, चांदपुर के निवासी माने जाते हैं।
31. मसोल्या रावत :- पंवार पूर्व जाति के वंशज मसोल्या रावत धार के मूल निवासी हैं जो गढ़वाल में बसे हैं।
इसके अलावा जेठा रावत, तोदड़ा रावत, कड़वाल रावत, तुलसा रावत, मौरोड़ा रावत, गुराडी रावत, कोल्ला रावत, घंडियाली रावत, फर्सुड़ा रावत, झिंक्वाण रावत, मनेसा रावत, कफोला रावत जातियों के बारे में अभी जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है।

बिष्ट जाति के राजपूत :- गढ़वाल में बिष्ट जाति राजपूतों में गिनी जाती है, इसके अंतर्गत कई अन्य उपजातियां/ उपसमूह आते हैं जो यह प्रदर्शित करते हैं कि बिष्ट जाति किसी एक समूह से नहीं बल्कि कई अन्य जातियों से मिलकर बनी है। ये सभी जातियां कई वर्ष पूर्व अलग-अलग स्थानों से आयी और गढ़वाल में बस गयी।
32. बगड़वाल बिष्ट :- बगड़वाल बिष्ट जाति के लोग सिरमौर, हिमाचल से संवत 1519 में गढ़वाल आए और तत्पश्चात यहीं के निवासी हो गए। इनका प्रथम गढ़ बगोडी/ बगोड़ी गांव माना जाता है।
33. कफोला बिष्ट :- ये लोग यदुवंशी लोगों के वंशज माने जाते हैं, जो इतिहास में कम्पीला नामक स्थान से गढ़वाल में आए और फिर यहीं के मूल निवासी हो गए। इनकी थात पौड़ी गढ़वाल जिले की कफोलस्यूं पट्टी मानी जाती है।
34. चमोला बिष्ट :- पंवार वंशी चमोला बिष्ट जाति के लोग उज्जैन से संवत 1443 में गढ़वाल में आए। गढ़वाल के चमोली क्षेत्र में बसने के कारण ये चमोला बिष्ट कहलाए।
35. इड़वाल बिष्ट :- इन्हें परिहार वंशी माना जाता हैं। ये कि दिल्ली के नजदीक किसी अज्ञात स्थान से संवत 913 में गढ़वाल में आए और ईड़ गांव के निवासी होने के कारण इस नाम से प्रसिद्ध हुए।
36. संगेला/संगला बिष्ट :- संगेला/संगला बिष्ट जाति के लोग गुजरात क्षेत्र से संवत 1400 में गढ़वाल में आए।
37. मुलाणी बिष्ट :- मुलाणी बिष्ट लोगों को कैंत्यूरा वंश का वंशज माना जाता है। ये कुमाऊं क्षेत्र से संवत 1403 में गढ़वाल आए और मुलाणी गांव में बस गए।
38. धम्मादा बिष्ट :- ये चौहान वंश से सम्बंधित हैं। ये दिल्ली के मूल निवासी थे जो कि गढ़वाल में बस गए।
39. पडियार बिष्ट :- ये परिहार वंश के वंशज माने जाते हैं। ये धार क्षेत्र से संवत 1300 में गढ़वाल में आए।
40. साबलिया बिष्ट :- ये सूर्यवंशी वंश के वंशज और उपमन्यु गोत्र के लोग हैं कत्यूरियों की संतान माने जाते हैं। ये पहले उज्जैन से गढ़वाल की साबली पट्टी में आये और उसके बाद कुमाऊं गए। इसके अलावा तिल्ला बिष्ट, बछवाण बिष्ट, भरेला बिष्ट, हीत बिष्ट, सीला बिष्ट के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है।

भण्डारी जाति के राजपूत :- भण्डारी जाति के लोगों को राजपूत जाति के अधीन रखा जाता है।
41. काला भंडारी :- ये काली कुमाऊं के मूल निवासी माने जाते हैं।
42. पुंडीर भंडारी :- पुण्डीर वंशीय भण्डारी जाति के लोग मायापुर के मूल निवासी थे जो संवत 1700 में गढ़वाल आए।
इसके अतिरिक्त तेल भंडारी और सोन भंडारी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है।

नेगी जाति के राजपूत :-
43. पुण्डीर नेगी :- पुण्डीर नेगी संवत 1722 में सहारनपुर से आकर गढ़वाल में बसे। रतूड़ी जी के अनुसार, पृथ्वीराज रासो में ये दिल्ली के समीप के होने कहे गए हैं।
44. बगलाणा नेगी :- बगलाणा नेगी बागल क्षेत्र से संवत 1703 में गढ़वाल आए। इनका मुख्य गांव शूला माना जाता है।
45. खूंटी नेगी :- ये संवत 1113 में नगरकोट-कांगड़ा, हिमाचल से आकर गढ़वाल में बसे। गढ़वाल में इनका प्रथम गांव खूंटी गांव है।
46. सिपाही नेगी :- सिपाही नेगी संवत 1743 में नगरकोट-कांगड़ा, हिमाचल से गढ़वाल में आए। सिपाहियों में भरती होने से इनका नाम सिपाही नेगी पड़ा।
47. संगेला नेगी :- ये जाट राजपूत जाति के वंशज हैं। ये संवत 1769 में सहारनपुर से आकर गढ़वाल में बसे। संगीन रखने से ये संगेला नेगी कहलाए।
48. खड़खोला नेगी :- ये कैंत्यूरा जाति के वंशज मने जाते हैं। ये कुमाऊं से संवत 1169 में गढ़वाल आए यहां के खड़खोली नामक गांव में कलवाड़ी के थोकदार रहे। इसीलिए खड़खोली नाम से प्रचलित हुए।
49. सौंद नेगी :– इनकी पूर्व जाति (वंश) राणा है। ये गढ़वाल में कैलाखुरी से आए और गढ़वाल के सौंदाड़ी गांव में बसने के कारण सौंद नेगी के नाम से जाने गए।
50. भोटिया नेगी :- ये हूण राजपूत जाति के वंशज हैं जो हूण देश से आकर गढ़वाल में बसे।
51. पटूड़ा नेगी :- पटूड़ी गांव में बसने के कारण ये पटूड़ा नेगी कहलाए।
52. महरा/ म्वारा/ महर नेगी :- इनकी पूर्व जाति (वंश) गुर्जर राजपूत है। ये लंढौरा स्थान से आकर गढ़वाल में बसे।
53. बागड़ी/ बागुड़ी नेगी :- ये संवत 1417 में मायापुर स्थान से आकर गढ़वाल में बसे। बागड़ नामक स्थान से आने के कारण ये बागड़ी/ बागुड़ी नेगी कहलाए।
54. सिंह नेगी :- बेदी पूर्व जाति से सम्बद्ध सिंह नेगी संवत 1700 में पंजाब से आकर गढ़वाल में बसे।
55. जम्बाल नेगी :– ये जम्मू से आकर गढ़वाल में बसे हैं।
56. रिखल्या/ रिखोला नेगी :- रिखल्या/ रिखोला राजपूत नेगी डोटी, नेपाल के रीखली गर्खा से आए और छंदों के आश्रय में रहे। रीखली गर्खा से आने के कारण ही इनका नाम रिखल्या/ रिखोला नेगी पड़ा।
57. पडियार नेगी :- ये परिहार वंश के वंशज है। जो संवत 1860 में दिल्ली के समीप से गढ़वाल में आए।
58. लोहवान नेगी :- इनकी पूर्व जाति (वंश) चौहान है। ये संवत 1035 में दिल्ली से आकर गढ़वाल के लोहबा परगने में बसे और यहीं के निवासी हो गए।
59. गगवाड़ी नेगी :- गगवाड़ी नेगी जाति के लोग संवत 1476 में मथुरा के समीप के क्षेत्र से आकर गढ़वाल के गगवाड़ी गांव में बसे।
60. चोपड़िया नेगी :- ये लोग संवत 1442 में हस्तिनापुर से आकर गढ़वाल के चोपड़ा गांव में बसे।
61. सरवाल नेगी :- सरवाल नेगी जाति के लोग संवत 1600 में पंजाब से आकर गढ़वाल में बसे।
62. घरकण्डयाल नेगी :- ये पांग, घुड़दौड़स्यूं के निवासी माने जाते हैं।
63. कुमयां नेगी :- ये कुमैं, काण्डा आदि गांवों में निवास करते हैं।
64. भाणा नेगी :– ये पटना के मूल निवासी हैं।
65. कोल्या नेगी :- ये जाति कुमाऊं से आकर गढ़वाल के कोल्ली गांव में बस गयी।
66. सौत्याल नेगी :- ये जाति डोटी, नेपाल से आकर गढ़वाल के सौती गांव में बस गयी।
67. चिन्तोला नेगी :- ये चिंतोलगढ़ के मूल निवासी हैं।
68. खडक्काड़ी नेगी :- ये मायापुर से आकर गढ़वाल में आकर बसे हैं।
69. बुलसाडा नेगी :- कैंत्यूरा पूर्व जाति के वंशज बुलसाडा नेगी कुमाऊं के मूल निवासी हैं।
इसके अतिरिक्त नीलकंठी नेगी, नेकी नेगी, जरदारी नेगी, हाथी नेगी, खत्री नेगी, मोंडा नेगी आदि के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है।

गुसाईं जाति के राजपूत
70. कंडारी गुसाईं :- कंडारी गुसाईं जाति के लोग मथुरा के समीप किसी स्थान से संवत 428 में गढ़वाल आए। इन्हें कंडारी गढ़ के ठाकुरी राजाओं के वंश की जाति माना जाता है।
71. घुरदुड़ा गुसाईं :- घुरदुड़ा गुसाईं जाति के बारे में रतूड़ी जी लिखते हैं कि “ये लोग स्वयं को लगभग नवीं शताब्दी में गुजरात के मेहसाणा से आया हुआ मानते हैं। इनके मूलपुरुष का नाम चंद्रदेव घुरदेव बताया जाता है। गढ़वाल में एक पूरी पट्टी इनकी ठकुराई पट्टी है। कुमाऊं में ये लोग गढ़वाल से ही गए हैं।”
72. पटवाल गुसाईं :- पटवाल गुसाईं जाति के बारे में माना जाता है कि ये प्रयाग से संवत 1212 में गढ़वाल में आए। गढ़वाल के पाटा गांव में बसने से इनके नाम से ही गढ़वाल के एक पट्टी का नाम पटवाल स्यूं पड़ा।
73. रौथाण गुसाईं :- ये संवत 945 में रथभौं दिल्ली के समीप किसी अज्ञात स्थान से आकर गढ़वाल में बसे।
74. खाती गुसाईं :- पौड़ी गढ़वाल में खातस्यूं खाती गुसाईं जाति की थात की पट्टी मानी जाती है।
ठाकुर जाति के राजपूत
75. सजवाण ठाकुर :– महाराष्ट्र से आए मरहट्टा वंश के सजवाण ठाकुर जाति के लोग गढ़वाल में आए और यहीं के निवासी हो गए। ये प्राचीन ठाकुरी राजाओं की संतानें मानी जाती हैं।
76. मखलोगा ठाकुर :- पुण्डीर वंशीय मख्लोगा ठाकुर संवत 1403 में मायापुर से गढ़वाल के मखलोगी नामक गांव में आकर बसे और तत्पश्चात वहीं के निवासी हो गए।
77. तड्याल ठाकुर :- इनका प्रथम गांव तड़ी गांव बताया जाता है।
78. पयाल ठाकुर :- ये कुरुवंशी वंश से सम्बद्ध हैं। ये हस्तिनापुर से आकर गढ़वाल के पयाल गांव में बसे।
79. राणा ठाकुर :- ये सूर्यवंशी वंश वंशज हैं जो कि संवत 1405 में चितौड़ से गढ़वाल में आकर बसे।

अन्य राजपूत
80. राणा :- नागवंशी वंश से सम्बंधित राणा राजपूत जाति के लोग हूण देश से आकर गढ़वाल में बसे। इन्हें गढ़वाल के प्राचीन निवासियों में से एक माना जाता है।
81. कठैत :- कटोच वंश के वंशज कठैत जाति के लोग कांगड़ा, हिमाचल से आकर गढ़वाल में बस गए।
82. वेदी खत्री :- ये खत्री वंश के वंशज हैं जो संवत 1700 में नेपाल से गढ़वाल आए।
83. पजाई :- पजाई राजपूतों को कुमाऊं का मूल निवासी माना जाता है।
84. रांगड़़ :- ये रांगड़़ वंश के वंशज हैं जो सहारनुपर से गढ़वाल में आकर बस गए।
85. कैंत्यूरा :- ये कैंत्यूरा वंश के हैं जो कुमाऊं से गढ़वाल में आए।
86. नकोटी :- ये नगरकोटी वंश के वंशज हैं जो नगरकोट, कांगड़ा से गढ़वाल में आए। गढ़वाल के नकोट गांव में बसने के कारण ये नकोटी कहलाए।
87. कमीण :- इनके बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।
88. कुरमणी :- इनके मूलपुरुष का नाम कुर्म था संभवतः उनके नाम से ही ये कुरमणी कहलाए।
89. धमादा :- इन्हें पुराने गढ़ाधीश की संतानें माना जाता हैं।
90. कंडियाल :- इनका प्रथम गांव कांडी था इसीलिए ये कंडियाल कहलाए।
91. बैडोगा :- बैडोगा जाति के लोगों का प्रथम गांव गढ़वाल का बैडोगी गांव माना जाता है।
92. मुखमाल :- इनका प्रथम गांव मुखवा या मुखेम गांव माना जाता है।
93. थपल्याल :- ये थापली गांव, चांदपुर में बसने के कारण थ्पल्याल कहलाए।
94. डंगवाल :- डंगवाल जाति के राजपूत गढ़वाल के डांग गांव के निवासी हैं।
95. मेहता :- यह जाति दरअसल वैश्य है जो कि संवत 1590 में पानीपत से गढ़वाल आयी।
96. रणौत :- इसे सिसोदियों की एक शाखा माना जाता है जो कि राजपुताना से गढ़वाल में आयी।
97. रौछेला :- ये जाति दिल्ली से गढ़वाल में आयी।
98. जस्कोटी :- ये जाति सहारनपुर, उ.प्र. से आकर गढ़वाल के जसकोट नामक गांव में आकर बस गयी।
99. दोरयाल :- ये द्वाराहाट, कुमाऊं के निवासी माने जाते हैं।
100. मयाल :- ये कुमाऊं के मूल निवासी माने जाते हैं।

संकलनकर्ता – नवीन चन्द्र नौटियाल
शोधार्थी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
मूल निवासी- गांव – रखूण, पट्टी – सितोनस्यूं, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)
वर्तमान निवासी- जनकपुरी, नई दिल्ली।

यह भी पढ़ें:

गढ़वाल की 75 ब्राह्मण जातियों का इतिहास, यहाँ पढ़ें

91 हजार के करीब पहुंची देश में कोरोना मरीजों की संख्या, बीते 24 घंटे में 4,987 नए मामले, 120 की मौत, देखें पूरी लिस्ट

0
coronavirus covid-19

Coronavirus (covid-19) : दुनियाभर में कोरोना महामारी का कहर लगातार जारी है। दुनियाभर में अब तक 47 लाख से ज्यादा लोग कोरोना (Coronavirus) की चपेट में आ चुके हैं। जबकि पूरी दुनिया में इस बीमारी से अब तक 3 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। वहीँ भारत में भी कोरोना वायरस का प्रकोप लगातार बढ़ता ही जा रहा है। भारत में  अबतक 90,927 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। जिनमें से 2,872 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 34,109 लोग ठीक होकर डिस्चार्ज हो चुके हैं। भारत में इस समय कोरोना संक्रमण के ऐक्टिव केसों की संख्या 53,946 है। बीते 24 घंटे में भारत में कोरोना के 4,987 नए केस सामने आए हैं जबकि इस बीमारी से 120 लोगों के मौत की खबर है। महाराष्ट्र में 30 हजार से ज्यादा लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं। देखें अन्य राज्यों में कोरोना के आंकड़ें।

S. No.States ConfirmedCuredDeath
20Maharashtra3070670881135
11Gujarat109884308625
28Tamil Nadu10585353874
9Delhi93333926129
27Rajasthan49602839126
19MP47892315243
32UP42582441104
33West Bengal2576872232
2Andhra2355135349
26Punjab1946125732
29Telengana150997134
5Bihar11794537
14J&K112154212
16Karnataka109249636
12Haryana88751413
24Odisha7371963
17Kerala5874954
15Jharkhand2171133
6Chandigarh191513
30Tripura167640
4Assam92412
31Uttarakhand88511
13Himachal78433
7Chhattisgarh67560
18Ladakh43220
1Andaman33330
10Goa1770
22Meghalaya13111
25Puducherry1391
21Manipur720
3Arunachal110
8Dadar Nagar Haveli100
23Mizoram110
Cases being reassigned to states290
Total confirmed cases90927341092872

वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा आज की गई घोषणाओं से विकास के नए आयाम स्थापित होंगे: सीएम त्रिवेन्द्र

0
Finance Minister

 देहरादून: मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा है कि वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा आज की गई घोषणाओं से विकास के नए आयाम स्थापित होंगे। औद्योगिक क्षेत्र में ढांचागत सुधार से आत्मनिर्भर भारत के लिए मजबूत नींव रखी जाएगी। इन सुधारों से देश कड़ी प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होगा। फास्ट ट्रैक इन्वेस्टमेंट से निवेश अधिक होगा। युवाओं के लिए रोजगार के नए क्षेत्र खुलेंगे। सोलर पीवी, एडवांस्ड सेल बेटरी जैसे नए चैम्पियन सेक्टर विकसित होंगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि कोयला, खनन, रक्षा, नागरिक उड्डयन, परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं। कोयले की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए देश आत्मनिर्भर होगा। कोयला क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार के लिए 50 हजार करोड़ रूपए खर्च किए जाएंगे। इसी प्रकार खनन में किए गए ढांचागत सुधार से इसमें निजी निवेश बढ़ेगा। इससे खनन में उत्पादन, रोजगार बढ़ेगा और स्टैट ऑफ आर्ट टेक्नोलोजी का प्रयोग होगा। रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। इससे हमारी रक्षा- उपकरणों के लिए दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता कम होगी। एयरस्पेस मेनेजमेंट से नागरिक उड्डयन क्षेत्र की कार्य-कुशलता बढ़ेगी। सामाजिक ढांचागत क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए लगभग 8100 करोड़ रूपए की वायबिलिटी गैप फंडिंग की व्यवस्था की गई है। अंतरिक्ष क्षेत्र में भी निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाएगा।

उत्तराखंड: सार्वजनिक स्थानों पर थूकने वालों और मास्क का इस्तेमाल न करने वालों पर लगेगा जुर्माना

0
Fines for spitting in public places and not using masks in Uttarakhand

देहरादून : मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने शनिवार को सचिवालय में कोविड-19 के प्रभावी नियंत्रण के लिए अधिकारियों की बैठक ली। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिये कि बाहरी राज्यों से उत्तराखण्डवासी काफी संख्या में आ रहे हैं, ये जिन जनपदों में आ रहे हैं, वहां पर थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था की जाए ताकि उत्तराखण्ड के बोर्डर ऐरिया पर स्क्रीनिंग का लोड कुछ कम हो सके। बाहर से आने वाले लोगों को जहां पर क्वारंटाइन किया जा रहा है, उसकी नियमित मोनिटरिंग की जाए। इसके लिए कर्मिकों की तैनाती की जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि कोरोना पर नियंत्रण के लिए सोशल डिस्टेंसिंग एवं मास्क की अनिवार्यता का कड़ाई से पालन करवाया जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि लोगों के पास मास्क की उपलब्धता हो। मास्क का इस्तेमाल न करने वालों एवं सार्वजनिक स्थानों पर थूकने वालों पर जुर्माने की कारवाई की जाए। बाहरी राज्यों के जो श्रमिक उत्तराखण्ड में हैं, अगर वो अपने राज्यों में वापस जाना चाहतें हैं, तो सम्बन्धित राज्यों से जो वाहन आ रहे हैं, उन्हें उन वाहनों में भेजने की व्यवस्था की जाए।

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने अधिकारियों को निर्देश दिये कि बाहरी राज्यों से जितने भी लोग आ रहे उनका पूरा डाटा रखा जाए कि ये कहां पर क्वारंटाइन किये गये हैं। यदि इनमें से कोई कोरोना पाॅजिटिव पाया जाता है तो अन्य लोगों को भी ट्रेस किया जा सके। इसके लिए पुलिस द्वारा संबंधित लोगों को अलर्ट के लिए एस.एम.एस भेजने की व्यवस्था भी की जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में कन्ट्रोल रूम एवं आईटी सेक्टर को और मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में जिन लोगों को क्वारंटीन किया जा रहा है, ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम प्रधानों द्वारा अच्छा कार्य किया जा रहा है एवं पूरा सहयोग दिया जा रहा है।

बैठक में मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह, अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश, डीजीपी अनिल कुमार रतूड़ी, सचिव अमित नेगी, नितेश झा, शैलेष बगौली, आईजी संजय गुंज्याल, निदेशक एनएचएम युगल किशोर पंत एवं डीजी स्वास्थ्य श्रीमती अमिता उपे्रती उपस्थित थे।

उत्तराखंड में शनिवार को फिर से मिले 9 कोरोना पॉजिटिव, 91 पंहुचा संक्रमितों का आंकड़ा

0
9 corona positive again in Uttarakhand on Saturday

Coronavirus (Covid-19) : बीते कुछ दिनों से उत्तराखंड में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। शनिवार को राज्य में कुल 9 लोगों में कोरोना वायरस की पुष्टि हुई है। इनमें चार संक्रमित मरीज देहरादून से, चार मरीज उधमसिंहनगर जनपद तथा एक नैनीताल जिले से हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा शनिवार को 2 बजे जारी सैंपल रिपोर्ट में देहरादून में चार और ऊधमसिंह नगर में दो कोरोना संक्रमित मामले पाए गए। जबकि अभी-अभी रात 9 बजे जारी स्वास्थ्य बुलेटिन में 3 अन्य लोगों में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई है। इनमे से फिर से 2 मरीज ऊधमसिंह नगर तथा 1 मरीज नैनीताल जिले से है। इसके साथ ही प्रदेश में करोना संक्रमित मामलों की संख्या 91 पहुंच गई है। वहीं 51 मरीज ठीक हो चुके हैं। शनिवार को देहरादून और ऊधमसिंह नगर में 4-4 नए संक्रमित मामले सामने आने से स्वास्थ्य विभाग में भी हड़कंप मचा है।

उधमसिंहनगर जनपद में भी आज जो चार कोरोना संक्रमित मरीज मिले हैं वह भी बाहर से लौटे हुए हैं। इनमें एक 18 वर्षीय युवक महाराष्ट्र से काशीपुर लौटा था और दूसरा युवक गुरुग्राम से रुद्रपुर लौटा था, जिन्हें पहले ही अस्पताल में आइसोलेट किया गया था। जबकि मुंबई से  जसपुर लौटे दो व्यक्ति भी कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज की लैब से इन चारों की रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई है। नैनीताल जनपद के हल्द्वानी में जिस व्यक्ति में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई है वह 2 दिन पहले ही दिल्ली से वापस लौटा था। इसके अलावा शनिवार को राजधानी देहरादून में कोरोना संक्रमण के जो चार नए मामले सामने आए हैं उनमें तीन व्यक्ति ऐसे हैं जो कि प्रवासी संक्रमित मरीज के परिवार के सदस्य हैं।

यह भी पढ़ें:

अच्छी खबर: पंजाब में एक दिन में रिकॉर्ड 952 कोरोना मरीज हुए ठीक, अब तक 1257 लोग हो चुके हैं स्वस्थ

 

अच्छी खबर: पंजाब में एक दिन में रिकॉर्ड 952 कोरोना मरीज हुए ठीक, अब तक 1257 लोग हो चुके हैं स्वस्थ

0
corona positive case in punjab

Coronavirus (Covid-19) : पंजाब से कोरोना को लेकर एक बड़ी राहत भरी खबर आ रही है। ताजा जानकारी के मुताबिक पंजाब में पिछले 24 घंटे में कोरोना के कुल 952 मरीज ठीक होकर अपने-अपने घरों को लौट गए हैं। स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार पंजाब में कोरोना बीमारी से ठीक हो चुके मरीजों की संख्या 1257 हो गई है। जबकि कल तक यह आंकड़ा मात्र 305 था। स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार पंजाब में अब तक कुल 1946 लोगों में कोरोना की पुष्टि हुई है जिनमे से 1257 मरीज ठीक होकर अपने घर लौट चुके हैं। जबकि 32 लोगों की इस बीमारी से मौत हो चुकी है।

उत्तराखंड : 36 दिन, 11 सैंपल जांच के बाद युवक को मिला कोरोना से छुटकारा, डॉक्टरों ने ली राहत की सांस

0
dr sushila tiwari hospital haldwani

Coronavirus (Covid-19) : उत्तराखंड के हल्द्वानी के स्थित सुशीला तिवारी अस्पताल में लम्बे समय से भर्ती कोरोना संक्रमित मरीज आख़िरकार 36 दिन बाद स्वस्थ होकर घर लौट गया है। जिसके बाद वहाँ के डॉक्टरों ने राहत की साँस ली। बतादें हल्द्वानी के वनभूलपुरा का रहने वाला एक 35 वर्षीय युवक जमातियों के संपर्क में आया था। युवक को कोरोना संदिग्ध मानते हुए क्वारेंटाइन कर उसका सैंपल जांच के लिए भेजा गया था। जाँच में कोरोना पॉजिटिव आने पर युवक को बीते 8 अप्रैल को सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती कर कर दिया गया और तभी से उसका उपचार चल रहा था। इस युवक के साथ चार अन्य लोग भी पॉजीटिव पाए गए थे। परन्तु वे सभी कुछ दिनों के भीतर ठीक होकर अस्पताल से डिस्चार्ज हो चुके थे। पर इस युवक के शरीर में कोरोना वायरस खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। डॉक्टरों के अनुसार इस युवक की  10 सैंपल जाँच रिपोर्ट पॉजीटिव आई। हैरानी की बात यह थी कि युवक के भीतर कोरोना वायरस से ग्रसित होने के कोई गंभीर लक्ष्ण नहीं दिखाई दे रहे थे परन्तु उसकी सैंपल जाँच रिपोर्ट पॉजीटिव आ रही थी। हालाँकि डॉक्टरों का कहना था कि वह बाहरी रूप से पूरी तरह स्वस्थ लग रहा था पर शरीर के भीतर वायरस की मौजूदगी बनी हुई थी। आख़िरकार इस कोरोना संक्रमित मरीज की 11वीं सैंपल जांच रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद बीते गुरुवार को उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।

इससे पहले देहरादून की भगत सिंह कॉलोनी का युवक 32 दिन बाद कोरोना मुक्त हुआ था। देश में कोरोना के मरीजों के सबसे देर में ठीक होने का रेकार्ड 45 दिनों का है। केरल में 70 साल के एक बुजुर्ग ने 45 दिन तक अस्पताल में भर्ती रहते हुए कोरोना के खिलाफ यह जंग जीती थी।

देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग स्थित कालीमठ का महात्म्य

0

कालीमठ का महात्म्य गढ़वाल जो प्राचीन ग्रन्थों में स्वर्ण भूमि, तपोभूमि, हिमवन्त प्रदेश, बद्रीकाश्रम, केदारखन्ड तथा उत्तराखंड के नाम से प्रसिद्ध है। पर्वत शिखरों पर अनेक भग्नावशेषों के कारण इसका नाम गढ़वाल पडा। मनु के जल प्लावन के पश्चात आदि सृष्टि की रचना जिस मनोरम स्थान पर हुई, वह अलकापुरी के निकट व्रह्मावर्त के पास इसी भू भाग में है। पृथ्वी का यही सर्वोच्च शिखर जल प्लावन के अवतरण पर सर्वप्रथम चक्षुओं के सम्मुख प्रकट हुआ। आदि मानव ने बद्रीनाथ के निकट अनेक रहस्यमयी स्कन्ध गुफा, नारद गुफा और व्यास गुफा में बैठकर उन्हीं के पास पडोस के पर्वत प्रदेश को काट कर शैल शिखरों पर मानव जीवन प्रारंभ किया था। गढ़वाल की पावन पूज्य भूमि पवित्र धरती पर ऋषियों महर्षियों वेदज्ञों देवज्ञों ब्राह्मणों याज्ञिकों ने अनेक धार्मिक ग्रन्थ वेद वेदांग पुराण स्मृतियाँ शास्त्र आदि रचे जो मानव मात्र कल्याण उपकार सुख शांति आध्यात्मिकता की ओर बढने ईश भक्ति संस्कृति की पहचान आन्नद भौतिक उन्नति आदि के हेतु है। आज नैतिक धार्मिक आध्यात्मिक शिक्षा लेने व देने की आवश्यकता है। भूली बिसरी बातें याद दिलाने की है। सोये को जगाना होगा। पूर्वजों की थाथी से परिचित करना करना होगा और तब वह दिन दूर नहीं जब पुनः हमारा गढ़वाल वही गढ़वाल होगा।

पूरे विश्व में सदियों से ही गढ़वाल का वातावरण शान्तिमय रहा है। जिस कारण ऋषि मुनियों ने यहाँ पर तपस्या करके आध्यात्मिक सत्ता के साथ आत्मसात किया है। शास्त्रों में इस तरह का वर्णन देखने को मिलता है कि ऋषि मुनियों तथा देवताओं की तपस्या भंग करने के लिए आसुरी शक्ति ने भी यहाँ पर अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए उपद्रव मचाना शुरू किया। इसी तरह से आध्यात्मिक शक्ति के रूप में कालीमठ का नाम विशिष्टता के भाव को उजागर करता है। जो ऋषिकेश बदरीनाथ हाइवे से रुद्रप्रयाग तक 130किमी ‘यहाँ से गौरीकुण्ड हाइवे गुप्त काशी 42 किमी और गुप्तकाशी से 10 किमी. सरस्वती नदी के तट पर स्थित है। इस मठ की गणना भारत के सर्वश्रेष्ठ मठों में की जाती है। देवी भागवत पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इस क्षेत्र में दो राक्षसों ने अपना दबदबा बना दिया था। जो शुम्भ निशुम्भ के नाम से जाने जाते थे। ये दोनों असुर बहुत ही बडे बलशाली थे। इस कारण बडे उन्मत्त होकर वहां की जनता का उत्पीड़न करते रहते थे। धीरे-धीरे अपनी निरंकुशता के चलते इन्होंने देवताओं को भी कष्ट देना शुरू कर दिया। इनका प्रभाव इतना बड गया कि देवता भी इन्हें देखकर घवराने लगे। अन्ततः सभी उपायों से थककर ये देवी मां के शरण में गये। मां की घनघोर तपस्या करने लगे। मां भगवती ने उनकी कठोर तपस्या से देवताओं को साक्षात दर्शन देकर कहा- मै तुम्हारी तपस्या से खुश हूँ। जनकल्याण हेतु मुझसे वर मांगिये। देवताओं ने कहा-आपसे कोई भी बात छिपी हुई नहीं है। शुम्भ-निशुम्भ के आंतक से तीनों लोक भयभीत हैं ‘इससे मां हमारी रक्षा करो। मां भगवती ने कहा कि जनहित के लिए मैं इन असुरों का संहार अवश्य करूँगी। माँ ने शुम्भ-निशुम्भ का संहार करके उनके दोनों सिर कालीमठ मे कुन्डी में गाढ दिये। आज भी मन्दिर के अन्दर कुन्डी के रूप में पूजा की जाती है। अष्टमी की रात्रि को यह कुन्डी खोल दी जाती है। सुसज्जित सुंदर परिधान में मा भगवती का दिव्य स्वरूप भक्तों के दर्शन हेतु बाहर लाया जाता है। चारो ओर मां की किरणों का प्रकटीकरण होने लगता है। पूरे भारतवर्ष में कालीमठ ही इस तरह का मन्दिर है जहां माता लक्ष्मी और सरस्वती व काली माता की एक साथ पूजा अर्चना  की जाती है।

akhilesh

मान्यता है कि यहां पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा चौरासी हजार ऋषि मुनियों ने मां काली की आराधना की है। मान्यता यह भी है कि मा काली ने यहाँ पर रक्तबीज का भी बध किया। रक्तवीज को यह वरदान प्राप्त था कि रक्त की एक भी बूंद जमीन पर गिरने पर हजारों रक्तबीज पैदा होंगे। मां काली ने रक्तबीज के सम्पूर्ण रक्त का रसपान किया। इस कारण माँ भगवती को रक्तप्रिया भी कहा जाता है। रक्तबीज व असुरों का संहार करने के बाद माँ इसी काली मठ में अंतर्ध्यान हो गई। यह मां काली का सिद्घ क्षेत्र मना जाता है। यहां पर सच्ची श्रद्धा से मां काली का सामान्य उच्चारण करने मात्र से मनोकामना पूर्ण हो जाती है। शास्त्रों में कहा गया है-अनन्ताकाश में चतुर्भुज रूप में परिणत होकर वही विश्व का संसार करती है। इसी का प्रतीक भगवती की चार भुजायें हैं। संसार का प्रतीक खड्ग है। नष्ट हुए प्राणियों का प्रतीक कटा मस्तक है। अभय पद की प्राप्ति उसी की आराधना पर निर्भर है। इसी का प्रतीक अभय मुद्रा है। वही वर प्रदान करके साधक की इच्छा पूर्ण करती है। इसका प्रतीक वर मुद्रा है। इस भीषण युग में मां काली ही मानव का कल्याण करती है। नवरात्रि में यहाँ माँ के दर्शन करने के लिए देश विदेश के यात्रियों का तांता लगा रहता है। वैसे सामान्यतः भी भक्त जन अपनी मनोकामना हेतु मां की चौखट पर आते रहते हैं। कालीमठ के पास ही कविल्टा गाँव है।

कहा जाता है कि कालीदास ने भी यहाँ पर माँ काली की घनघोर तपस्या की थी। मां काली की कृपा से कालीदास कवि कुल गुरू व संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान के रूप में प्रसिद्ध हुए। इन्होंने यहाँ बैठ कर मेघदूत की रचना कर डाली। कालीमठ तन्त्र साधना के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल मना जाता है। यहां पर साधना का फल जल्दी मिल जाता है। माँ अपने भक्तों का सम्पूर्ण कष्ट निवारण कर देती है। यहां से लगभग 8 किलोमीटर की चढाई पर काली शिला स्थित है। जहां पर माँ भगवती के 64 यन्त्र हैं। मान्यता है कि इस चढाई पर चढ़ते हुए मां काली का ध्यान करके चढाई का पता नहीं चल पाता है। उत्साह का संचार पैदा होने के साथ ही सम्पूर्ण शरीर रोमांचित होने लगता है। इस शिला पर तीन दिन तक जो भी भक्त जागरण करता है। वह भय मुक्त होकर राजाओ की तरह जीवन यापन करता है। पुराणों में वर्णित है कि माँ काली ही महामाया है। यह जग उसी से संचालित हो रहा है। जो कि ज्ञानीजनों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर अपनी ओर आकर्षित करती है। यही वह अनन्त शक्ति है जिसका आलम्बन पाकर विद्वान व मूर्ख धनी व निर्धन, बलिष्ट व दुर्बल अपनी निश्चित दिशा की ओर प्रगति कर रहे हैं।

लेखक: अखिलेश चन्द्र चमोला हिन्दी अध्यापक राइका सुमाडी ।